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उपेक्षित संवेदनाओं और अनदेखें संघर्षों का सच

-अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस- 19 नवम्बर, 2025-

महिला दिवस की तर्ज पर ही पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस भी मनाया जाने लगा है। पहला अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस 1999 में 19 नवंबर को डॉ. जेरोम टीलकसिंह ने त्रिनिदाद और टोबैगो में मनाया था। दुनिया के 30 से अधिक देशों में यह दिवस मनाया जा रहा है। यह केवल पुरुषों का उत्सव नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक परिदृश्य में उनकी स्थिति, संघर्षों और मनोभावों को समझने का मौक़ा है। जैसे स्त्रियाँ वर्षों से असमानता, उपेक्षा और अन्याय के बोझ से जूझती रही हैं, वैसे ही आज पुरुष भी कई स्तरों पर अपने शोषण एवं उत्पीडित होने की बात उठा रहे हैं। महिलाओं की ही भांति अब पुरुषों पर भी उपेक्षा, उत्पीड़न एवं अन्याय की घटनाएं पनपने की बात की जा रही है। वे भी दबाव, अवसाद और सामाजिक पूर्वाग्रहों का सामना कर रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि पुरुषों की पीड़ा, उनके संघर्ष और उनकी संवेदनाएँ उतनी चर्चा का विषय नहीं बनते, जितना कि वे बनना चाहिए। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि समाज केवल स्त्रियों से ही नहीं, पुरुषों से भी बनता है और किसी एक की उपेक्षा पूरे संतुलन को बिगाड़ देती है। 2025 के लिए इस दिवस की थीम ‘पुरुषों और लड़कों का उत्सव’ है।

उपेक्षित संवेदनाओं और अनदेखें संघर्षों का सच

आज का पुरुष बदलते समय के साथ एक दोहरी चुनौती से जूझ रहा है-एक ओर उससे पारंपरिक भूमिकाओं को निभाने की अपेक्षा की जाती है, दूसरी ओर नये सामाजिक ढाँचों में भावनात्मक रूप से अधिक संवेदनशील, सहयोगी और सहचर होने का दबाव है। संघर्ष यह है कि इस परिवर्तन में उसकी पीड़ा, द्वंद्व और टूटन को गंभीरता से नहीं सुना जाता। उसे मजबूत, कठोर और समस्यारहित मान लेने का भ्रम उसकी वास्तविक जरूरतों को छिपा देता है। यही कारण है कि आधुनिक पुरुष स्वयं को कई बार दोयम दर्जे की स्थिति में पाता है-एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसे समाज ज़िम्मेदारी तो देता है, पर अधिकार और संवेदना नहीं। पुरुषों पर हो रहे अत्याचारों की अनदेखी भी चिंताजनक है।

घरेलू हिंसा, झूठे मुक़दमे, अभिभावकत्व के अधिकारों से वंचित होना, मानसिक प्रताड़ना, कार्यस्थलों पर उत्पीड़न-ये सब वास्तविक समस्याएँ हैं, जिन्हें अक्सर मज़ाक या अतिशयोक्ति कहकर टाल दिया जाता है। पुरुष के दर्द को ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ जैसी रूढ़ि निगल जाती है। जबकि सच यह है कि भारत में पुरुष भी आत्महत्या, अवसाद और मानसिक दबाव के शिकार बन रहे हैं। कई रिपोर्टों में यह तथ्य सामने आया है कि अवसाद और आत्महत्या के मामलों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में अधिक है, पर इस पर चर्चा समाज की प्राथमिकता नहीं बनती। यह उपेक्षा न केवल अमानवीय है, बल्कि समाज के संतुलन को खतरे में डालने वाली भी है।

कुछ वर्ष पूर्व भारत में सक्रिय अखिल भारतीय पुरुष एशोसिएशन ने भारत सरकार से एक खास मांग की कि महिला विकास मंत्रालय की भांति पुरुष विकास मंत्रालय का भी गठन किया जाये। इसी तरह यूपी में भारतीय जनता पार्टी के कुछ सांसदों ने यह मांग उठाई थी कि राष्ट्रीय महिला आयोग की तर्ज पर राष्ट्रीय पुरुष आयोग जैसी भी एक संवैधानिक संस्था बननी चाहिए। इन सांसदों ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा था। पत्र लिखने वाले एक सांसद हरिनारायण राजभर ने उस वक्त यह दावा किया था कि पत्नी प्रताड़ित कई पुरुष जेलों में बंद हैं, लेकिन कानून के एकतरफा रुख और समाज में हंसी के डर से वे खुद के ऊपर होने वाले घरेलू अत्याचारों के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं। प्रश्न है कि आखिर पुरुष इस तरह की अपेक्षाएं क्यों महसूस कर रहे हैं? लगता है पुरुष अब अपने ऊपर आघातों एवं उपेक्षाओं से निजात चाहता है। तरह-तरह के कानूनों ने उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को धुंधलाया है। जबकि आज बदलते वक्त के साथ पुरुष अब अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील हो चुका है। कई युवा पुरुष समाज-निर्माण की बड़ी जिम्मेदारियों को उठा रहे हैं और अपनी काबिलीयत व जुनून से यह साबित भी कर रहे हैं।

समाज हमेशा पुरुष से अपेक्षा करता है कि वह परिवार की रीढ़ बने, आर्थिक व भावनात्मक उत्तरदायित्व निभाए, कठिनाई में ढाल की तरह खड़ा रहे। लेकिन जब वही पुरुष कमज़ोर पड़ता है, टूटता है, या न्याय चाहता है, तो वह उपेक्षित कर दिया जाता है। पुरुष को यह अधिकार मिलना ही चाहिए कि वह अपनी पीड़ा कह सके, अपने अधिकारों की रक्षा कर सके और गलत आरोपों से मुक्त हो सके। जैसे महिलाओं के लिए सुरक्षा और न्याय के तंत्र बनाए गए, वैसे ही पुरुषों के लिए भी कुछ संवेदनशील और न्यायपूर्ण व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है। यह समझना आवश्यक है कि पुरुष समाज के निर्माण का अभिन्न हिस्सा है-वह पिता है, पति है, पुत्र है, भाई है, मित्र है। उसकी उपस्थिति के बिना किसी भी परिवार या समाज की कल्पना अधूरी है। वह जिम्मेदारियों से भरा हुआ व्यक्ति है, लेकिन इसी वजह से वह सबसे अधिक दबाव और अपेक्षाओं का भार उठाता है। यह भी सच है कि पुरुष ही समाज के विकास, विज्ञान, कला, परिश्रम और संरचना के बड़े हिस्से का वाहक रहा है। लेकिन इस योगदान के बावजूद, आज पुरुषों की समस्याओं के प्रति संवेदना बढ़ाने की आवश्यकता है।

अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस का संदेश यही है कि महिलाओं के समान ही पुरुषों की भी गरिमा, सुरक्षा, सम्मान और संवेदनाओं की रक्षा की जानी चाहिए। लैंगिक समानता का अर्थ केवल महिलाओं को सशक्त बनाना नहीं, बल्कि पुरुषों पर बने अनुचित पूर्वाग्रहों को भी तोड़ना है। एक स्वस्थ, संतुलित समाज वही है जिसमें दोनों लिंगों की समस्याओं को समान रूप से सुना और समझा जाए। पुरुषों को कठोरता की बेड़ियों से मुक्त कर, उनके भावनात्मक अस्तित्व को स्वीकार करना समय की मांग है। पुरुष दिवस हमें जागरूक करता है कि सह-अस्तित्व, सहयोग, संवाद और करुणा ही पुरुष-स्त्री के संबंधों का वास्तविक आधार हैं। पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं। इसलिए उनकी समस्याओं, अधिकारों और जिम्मेदारियों को भी पूरक दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए। जब समाज पुरुष की पीड़ा को भी उतनी ही गंभीरता से सुनेगा, जितनी वह स्त्री के आर्तनाद पर देता है, तभी हम सच्चे अर्थों में संतुलित और मानवीय समाज का निर्माण कर पाएँगे।

महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को रोकने के लिए कठोर कानून भी बने हैं, लेकिन पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं। भारत में अभी तक ऐसा कोई सरकारी अध्ययन या सर्वेक्षण नहीं हुआ है जिससे इस बात का पता लग सके कि घरेलू हिंसा में शिकार पुरुषों की तादाद कितनी है लेकिन कुछ गैर सरकारी संस्थान इस दिशा में जरूर काम कर रहे हैं। ‘सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन‘ और ‘माई नेशन‘ नाम की गैर सरकारी संस्थाओं के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि भारत में नब्बे फीसद से ज्यादा पति तीन साल की रिलेशनशिप में कम से कम एक बार घरेलू हिंसा का सामना कर चुके होते हैं। वे भी अपने अस्तित्व की सुरक्षा एवं सम्मान के लिये आवाज उठाना चाहते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यह पुरुष को उसके वास्तविक स्वरूप में देखने, समझने और सम्मान देने का अवसर देता है-एक ऐसे मानव के रूप में, जो जिम्मेदार भी है, संवेदनशील भी; जो मजबूत भी है, पर टूट भी सकता है; जो देता ही नहीं, पाने की भी अपेक्षा रखता है। पुरुष की इस नई समझ के बिना मानवीय समाज की कल्पना संभव नहीं है। यह ऐसा एक वैश्विक उत्सव है जो पुरुषों के सकारात्मक योगदान और उपलब्धियों का जश्न मनाता है, साथ ही पुरुषों के स्वास्थ्य, कल्याण और लैंगिक समानता को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है। यह दिन पुरुषों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का समर्थन करने वाली चर्चाओं और कार्यों को बढ़ावा देने, सकारात्मक रोल मॉडल को प्रोत्साहित करने और अधिक समावेशी समाज की वकालत करने का अवसर प्रदान करता है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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