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दोहरे कार्य वाले छिद्रयुक्त ग्राफीन आधारित नवीन सुपरकैपेसिटर से इलेक्ट्रिक वाहनों को मिल सकता है तेज त्वरण और अधिक रेंज

उन्नत ऊर्जा भंडारण प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज करते हुए वैज्ञानिकों ने दोहरे रूप से कार्य करने में सक्षम छिद्रयुक्त ग्राफीन कार्बन नैनोकम्पोजिट (पीजीसीएन) इलेक्ट्रोड पर आधारित एक उच्च वोल्टेज सुपरकैपेसिटर विकसित किया है। यह नवाचार न केवल इलेक्ट्रिक वाहनों को तेज त्वरण और बढ़ी हुई रेंज प्रदान करने की क्षमता रखता है, बल्कि सौर पैनल और ग्रिड स्तर के ऊर्जा भंडारण जैसे अनुप्रयोगों के लिए भी अधिक सुरक्षित और स्थिर समाधान प्रस्तुत करता है।

पीजीसीएन की छिद्रयुक्त संरचना के भीतर तीव्र इलेक्ट्रोलाइट अंतर्प्रवेश और प्रसार को सुगम बनाने के लिए योजनाबद्ध निरूपण

वर्तमान में वाणिज्यिक सुपरकैपेसिटर में प्रयुक्त पारंपरिक इलेक्ट्रोलाइट सामान्यतः 2.5 से 3.0 वोल्ट के बीच कार्य करते हैं। इससे अधिक वोल्टेज पर ये इलेक्ट्रोलाइट विघटित होने लगते हैं या ज्वलनशीलता जैसी सुरक्षा संबंधी समस्याएं उत्पन्न करते हैं। इस तकनीकी सीमा के कारण ऊर्जा घनत्व और प्रदर्शन में वृद्धि सीमित हो जाती है।

इस चुनौती का समाधान प्रस्तुत करते हुए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान इंटरनेशनल एडवांस्ड रिसर्च सेंटर फॉर पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मैटेरियल्स के शोधकर्ताओं ने दोहरे कार्यात्मक पीजीसीएन इलेक्ट्रोड का उपयोग कर 3.4 वोल्ट का अभूतपूर्व परिचालन वोल्टेज हासिल किया है। यह उपलब्धि पारंपरिक सुपरकैपेसिटर की 3.0 वोल्ट की सीमा को पार करते हुए ऊर्जा भंडारण क्षमता में उल्लेखनीय सुधार को दर्शाती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह नवाचार इलेक्ट्रोलाइट अस्थिरता की समस्या को प्रभावी रूप से संबोधित करता है। उच्च वोल्टेज पर स्थिरता बनाए रखते हुए यह तकनीक ऊर्जा घनत्व को लगभग दोगुना कर देती है, जिससे इलेक्ट्रिक वाहनों को अधिक दूरी तय करने और तीव्र त्वरण प्राप्त करने में सहायता मिलती है। इसके साथ ही कम सेल स्टैकिंग की आवश्यकता के कारण ऊर्जा भंडारण मॉड्यूल का डिजाइन अधिक सरल और सघन हो जाता है।

पीजीसीएन इलेक्ट्रोड का बेहतर प्रदर्शन इसकी विशेष रूप से विकसित सतह संरचना के कारण संभव हो पाया है। यह सामग्री एक ओर जल प्रतिरोधी है, जिससे नमी के कारण होने वाले क्षरण को रोका जा सकता है, वहीं दूसरी ओर यह कार्बनिक इलेक्ट्रोलाइट्स के साथ अत्यधिक अनुकूल है। यह दोहरी कार्यक्षमता छिद्रयुक्त संरचना में इलेक्ट्रोलाइट के तीव्र और समान प्रवेश को सक्षम बनाती है, जिससे आयन परिवहन तेज होता है और विद्युत रासायनिक दक्षता में स्पष्ट सुधार होता है।

पीजीसीएन की विशिष्ट धारिता और ऊर्जा घनत्व की तुलना वाणिज्यिक वाईपी-50एफ इलेक्ट्रोड से की गई है

परिणामस्वरूप, पीजीसीएन आधारित सुपरकैपेसिटर पारंपरिक उपकरणों की तुलना में लगभग 33 प्रतिशत अधिक ऊर्जा संग्रहित करने में सक्षम पाया गया है। यह उच्च शक्ति उत्पादन के साथ दीर्घकालिक स्थिरता भी प्रदान करता है। परीक्षणों में यह सुपरकैपेसिटर 15,000 चार्ज डिस्चार्ज चक्रों के बाद भी अपनी प्रारंभिक क्षमता का 96 प्रतिशत तक बनाए रखने में सफल रहा, जो इसकी असाधारण टिकाऊ क्षमता को दर्शाता है।

पीजीसीएन इलेक्ट्रोड का निर्माण पर्यावरण के अनुकूल हाइड्रोथर्मल कार्बोनाइजेशन प्रक्रिया द्वारा किया गया है, जिसमें 1,2 प्रोपेनेडियोल को पूर्ववर्ती पदार्थ के रूप में उपयोग किया गया। यह प्रक्रिया 300 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 25 घंटे तक एक सीलबंद पात्र में संचालित की जाती है। इस विधि की विशेषता यह है कि इसमें कठोर रसायनों या बाहरी गैसों की आवश्यकता नहीं होती, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव न्यूनतम रहता है। इसके साथ ही 20 प्रतिशत से अधिक की उपज प्राप्त होती है और यह प्रक्रिया प्रयोगशाला स्तर से औद्योगिक उत्पादन तक विस्तार योग्य है।

तैयार पीजीसीएन सामग्री में सूक्ष्म और मध्यम स्तर की छिद्रयुक्त संरचना पाई जाती है, जो तीव्र आयन परिवहन और उच्च ऊर्जा भंडारण को संभव बनाती है। इस संरचना के कारण सुपरकैपेसिटर 17,000 वाट प्रति किलोग्राम तक की शक्ति घनत्व प्राप्त करने में सक्षम है। संश्लेषण मापदंडों के सटीक नियंत्रण से निरंतर और विश्वसनीय प्रदर्शन सुनिश्चित किया गया है। व्यावसायिक कार्बन आधारित इलेक्ट्रोड की तुलना में पीजीसीएन इलेक्ट्रोड एक साथ परिचालन वोल्टेज और शक्ति उत्पादन दोनों में वृद्धि करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक इलेक्ट्रिक वाहनों, ग्रिड स्तर के ऊर्जा भंडारण और पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में व्यापक उपयोग की संभावनाएं रखती है। उच्च परिचालन वोल्टेज के कारण कई निम्न वोल्टेज सेल को श्रृंखला में जोड़ने की आवश्यकता कम हो जाती है, जिससे अधिक कॉम्पैक्ट, हल्के और कुशल ऊर्जा भंडारण मॉड्यूल विकसित किए जा सकते हैं।

यह शोध भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों और आत्मनिर्भर भारत अभियान के अनुरूप स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अध्ययन को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका केमिकल इंजीनियरिंग जर्नल में प्रकाशित किया गया है और इसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की तकनीकी अनुसंधान केंद्र पहल के तहत समर्थन प्रदान किया गया है।

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