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समय पर पहचान और जागरूकता से कैंसर पर नियंत्रण संभव

04 फरवरी विश्व कैंसर दिवस

कैंसर एक ऐसी गंभीर बीमारी है, जिसका नाम सुनते ही अधिकांश लोगों के मन में भय और अनिश्चितता का भाव उत्पन्न हो जाता है। हालांकि चिकित्सा विज्ञान में हुई निरंतर प्रगति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कैंसर की पहचान शुरुआती अवस्था में कर ली जाए तो इसके सफल उपचार और नियंत्रण की संभावना काफी बढ़ जाती है। आज यह मान्यता मजबूत हो चुकी है कि कैंसर कोई एकाएक होने वाली बीमारी नहीं है, बल्कि इसके संकेत और लक्षण धीरे धीरे शरीर में उभरते हैं, जिन्हें समय रहते समझा और पहचाना जाए तो जान बचाई जा सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार कैंसर के मामलों में अनुवांशिक भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। यदि परिवार में किसी सदस्य को पहले कैंसर रहा हो, तो आने वाली पीढ़ियों में इस बीमारी का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे मामलों में युवावस्था से ही नियमित जांच और सतर्कता अत्यंत आवश्यक मानी जाती है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी महिला की मां, मौसी या नजदीकी रिश्तेदार को ब्रेस्ट या ओवेरियन कैंसर रहा हो, तो उसे अपेक्षाकृत कम उम्र में ही चिकित्सकीय जांच शुरू कर देनी चाहिए। आधुनिक तकनीकों की मदद से शरीर के ऊतकों में होने वाले शुरुआती बदलावों का पता लगाया जा सकता है, जिससे जोखिम का आकलन कर समय रहते उचित कदम उठाए जा सकते हैं।

अनुवांशिक कैंसर मुख्य रूप से जीन में होने वाले परिवर्तनों या म्यूटेशन के कारण विकसित होता है। ऐसे जीन परिवर्तन माता या पिता किसी से भी संतान में स्थानांतरित हो सकते हैं। ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर के संदर्भ में बीआरसीए1 और बीआरसीए 2 जीन में म्यूटेशन को विशेष रूप से खतरनाक माना जाता है। इन जीन में बदलाव होने पर सामान्य जनसंख्या की तुलना में कैंसर विकसित होने की संभावना कहीं अधिक हो जाती है और कई बार यह बीमारी अपेक्षाकृत कम उम्र में ही सामने आ सकती है। इसके अतिरिक्त कैंसर के अनेक मामले ऐसे भी होते हैं जिनका संबंध जीवनशैली और पर्यावरणीय कारकों से होता है। असंतुलित आहार, तंबाकू और शराब का सेवन, शारीरिक निष्क्रियता, मोटापा और हानिकारक रसायनों के लंबे समय तक संपर्क में रहना कैंसर के जोखिम को बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

कैंसर के लक्षण अक्सर सामान्य बीमारियों जैसे प्रतीत हो सकते हैं, इसलिए लोग उन्हें गंभीरता से नहीं लेते। शरीर के किसी हिस्से में असामान्य गांठ या सूजन का महसूस होना एक महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत हो सकता है। बिना किसी स्पष्ट कारण के अचानक वजन कम होना, लगातार बनी रहने वाली थकान या कमजोरी, त्वचा में बदलाव, तिल का आकार या रंग बदलना अथवा ऐसे घाव जो लंबे समय तक ठीक न हों, इन सभी संकेतों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। इसी तरह लंबे समय तक बिना कारण बुखार रहना, पेशाब या मल में खून आना, खांसी के साथ रक्तस्राव, भोजन निगलने में कठिनाई, आवाज में बदलाव, लगातार खांसी, आंत या मूत्र संबंधी आदतों में परिवर्तन और लंबे समय तक बना रहने वाला दर्द भी कैंसर की ओर इशारा कर सकता है।

चिकित्सकों का कहना है कि इन लक्षणों का मतलब हमेशा कैंसर ही हो, यह आवश्यक नहीं है, लेकिन यदि ये समस्याएं लंबे समय तक बनी रहें तो डॉक्टर से परामर्श लेना बेहद जरूरी हो जाता है। समय पर की गई जांच न केवल बीमारी की पहचान में मदद करती है, बल्कि उपचार को सरल और प्रभावी भी बनाती है।

जहां तक जांच की बात है, विशेषज्ञ बताते हैं कि अनुवांशिक कैंसर के कुल मामले लगभग दस प्रतिशत ही होते हैं, लेकिन यदि परिवार में कैंसर का इतिहास रहा हो तो सतर्कता कई गुना बढ़ जाती है। सामान्य परिस्थितियों में कैंसर का जोखिम पचास वर्ष की उम्र के बाद बढ़ता है, किंतु पारिवारिक इतिहास वाले लोगों को तीस वर्ष की उम्र से ही नियमित स्क्रीनिंग शुरू कर देनी चाहिए। यह कदम भविष्य में होने वाली गंभीर जटिलताओं से बचाव में सहायक सिद्ध हो सकता है।

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कैंसर की रोकथाम और जोखिम को कम करने के लिए आधुनिक चिकित्सा में कई विकल्प उपलब्ध हैं। कुछ मामलों में केमोप्रीवेंशन की सलाह दी जाती है, जिसमें ऐसी दवाओं का उपयोग किया जाता है जो हार्मोनल प्रभाव को नियंत्रित कर कैंसर की संभावना को कम करती हैं। उच्च जोखिम वाली महिलाओं के लिए बाइलैटरल प्रोफाइलेक्टिक मास्टेक्टॉमी जैसी सर्जिकल प्रक्रिया भी अपनाई जाती है, जिसमें दोनों स्तनों को हटाकर ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसी तरह बीआरसीए जीन म्यूटेशन वाली महिलाओं में प्रोफाइलेक्टिक ऊफोरेक्टॉमी के माध्यम से अंडाशय को हटाकर ओवेरियन कैंसर के जोखिम को बहुत हद तक घटाया जा सकता है।

शुरुआती दौर में कैंसर की पहचान के लिए विभिन्न आधुनिक जांच विधियां उपलब्ध हैं। मैमोग्राफी को ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए प्रभावी माना जाता है। क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जाम के माध्यम से डॉक्टर शारीरिक परीक्षण कर संभावित गांठ या असामान्यताओं का पता लगाते हैं। मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग से शरीर के अंदरूनी हिस्सों की विस्तृत तस्वीर प्राप्त होती है, जबकि पॉजिट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी शरीर में फैले कैंसर को पहचानने और उसकी स्थिति जानने में मदद करती है। फाइन नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी जैसी बायोप्सी तकनीक संदिग्ध कोशिकाओं की जांच के लिए उपयोग में लाई जाती है।

कैंसर के खतरे को कम करने में जीवनशैली की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। संतुलित और पौष्टिक आहार, जिसमें फल, सब्जियां और संपूर्ण अनाज शामिल हों, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है। तंबाकू और शराब से दूरी बनाना कैंसर से बचाव की दिशा में सबसे प्रभावी कदम माना जाता है। नियमित व्यायाम न केवल वजन नियंत्रित रखने में मदद करता है, बल्कि शरीर को सक्रिय और स्वस्थ भी रखता है। मोटापा कई प्रकार के कैंसर से जुड़ा हुआ है, इसलिए वजन संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इसके अलावा हानिकारक रसायनों और अनावश्यक रेडिएशन के संपर्क से बचना और समय समय पर मेडिकल चेकअप कराना भी आवश्यक है।

कैंसर का समय पर पता लगाना और उससे बचाव पूरी तरह संभव है, बशर्ते हम इसके लक्षणों को गंभीरता से लें और जांच में लापरवाही न बरतें। अनुवांशिक और गैर अनुवांशिक दोनों प्रकार के कैंसर में जागरूकता, सतर्कता और सही समय पर उपचार जीवनरक्षक सिद्ध हो सकता है। यदि कोई भी लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं, तो बिना देरी किए विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना ही समझदारी है।

हर वर्ष चार फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाना और लोगों को इस बीमारी के खिलाफ एकजुट करना है। यह दिवस इस बात पर जोर देता है कि उचित रोकथाम, समय पर पहचान और प्रभावी उपचार के माध्यम से कैंसर से होने वाली बीमारी और मृत्यु दर को कम किया जा सकता है। विश्व कैंसर दिवस की शुरुआत यूनियन फॉर इंटरनेशनल कैंसर कंट्रोल के प्रयासों से हुई, जिसका लक्ष्य लोगों को इस घातक बीमारी के प्रति जागरूक करना और शीघ्र निदान के महत्व को समझाना है।

विश्व कैंसर दिवस पहली बार चार फरवरी दो हजार को मनाया गया था, जब पेरिस में कैंसर के खिलाफ पहला विश्व शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इस अवसर पर पेरिस अगेंस्ट कैंसर चार्टर पर हस्ताक्षर किए गए, जो वैश्विक स्तर पर कैंसर से निपटने की प्रतिबद्धता का प्रतीक बना। आज के समय में कैंसर के शुरुआती निदान, उपचार और उपचार के बाद की देखभाल के प्रति लोगों को जागरूक करना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

इस दिवस के अवसर पर दुनिया भर में विभिन्न कार्यक्रम, सेमिनार, जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाते हैं। कई प्रमुख इमारतों और स्मारकों को नीली और नारंगी रोशनी से सजाया जाता है, ताकि कैंसर के प्रति वैश्विक एकजुटता का संदेश दिया जा सके। समाचार पत्र और मीडिया मंच कैंसर से जंग जीतने वाले व्यक्तियों की प्रेरक कहानियों को प्रकाशित कर समाज में सकारात्मक संदेश फैलाते हैं। इन सभी प्रयासों का एक ही उद्देश्य है, लोगों को यह समझाना कि जागरूकता, समय पर जांच और सही उपचार के माध्यम से कैंसर जैसी बीमारी को भी हराया जा सकता है।

यह लेख सिर्फ जानकारी के लिए है डॉक्टर से सलाह अवश्य ले।

उमेश कुमार सिंह
उमेश कुमार सिंह
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