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आजादी का मंत्र : वंदे मातरम (150 वर्ष की यात्रा)

राष्ट्र भाव का शोध पूर्ण दस्तावेज

डॉ. संदीप कुमार शर्मा
डॉ. संदीप कुमार शर्मा

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में यदि किसी एक गीत ने मंत्र, उद्धोष और प्रतिरोध—तीनों की भूमिका निभाई, तो वह है “वंदे मातरम्”। डॉ. संदीप कुमार शर्मा की पुस्तक “आजादी का मंत्र : वंदे मातरम” (150 वर्ष की यात्रा) इसी अमर गीत की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैचारिक यात्रा का गंभीर, शोधपरक और भावनात्मक दस्तावेज है – “आजादी का मंत्र : वंदे मातरम” (150 वर्ष की यात्रा)।

इस पुस्तक में लेखक ने 19वीं शताब्दी से लेकर 21वीं सदी तक “वंदे मातरम” के उद्भव, विकास, विवाद और पुनर्पाठ की क्रमबद्ध पड़ताल की है। गीत के रचनाकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत मूलतः उपन्यास आनंद मठ में प्रकाशित हुआ, किंतु शीघ्र ही वह साहित्यिक सीमा लांघकर स्वतंत्रता संग्राम का उद्घोष बन गया। डॉ. शर्मा ने इस रूपांतरण को ऐतिहासिक साक्ष्यों, डाक टिकटों, संसदीय चर्चाओं, कांग्रेस अधिवेशनों और समकालीन संदर्भों के माध्यम से प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत किया है।

पुस्तक की विशेषता इसका विस्तृत विषय-विन्यास है। मूल पाठ, हिंदी अनुवाद, भावार्थ, ध्वज, डाक टिकट, कांग्रेस और वंदे मातरम, प्रतिबंध, विवाद, स्वातंत्र्योत्तर परिप्रेक्ष्य—हर आयाम को अलग अध्याय में व्यवस्थित किया गया है। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान “वंदे मातरम” किसी एक धर्म या वर्ग का नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र का मंत्र था। संन्यासी से लेकर विद्यार्थी, कृषक से लेकर बुद्धिजीवी—सभी ने इसे आत्मसात किया।

डॉ. शर्मा स्वयं आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़े हुए हैं, इसलिए पुस्तक में प्रसारण माध्यमों की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है। सन् 1997 ईस्वी में स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर किए गए उनके शोध से लेकर 2025 में आकाशवाणी कार्यक्रम तक की यात्रा पुस्तक को आत्मकथात्मक विश्वसनीयता प्रदान करती है। यह शोध-यात्रा केवल भावुक स्मरण नहीं, बल्कि दस्तावेजी प्रमाणों पर आधारित गंभीर अध्ययन है।

विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि लेखक ने “वंदे मातरम” के आधुनिक रूपांतरणों को भी समाहित किया है—चाहे वह युवा पीढ़ी में इसकी पुनर्स्थापना हो या समकालीन राजनीतिक विमर्श में इसकी उपस्थिति। इस संदर्भ में ए आर रहमान द्वारा प्रस्तुत संस्करण का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह गीत समय के साथ नए अर्थ और नई ऊर्जा ग्रहण करता रहा है।

पुस्तक का भाषा-शिल्प सरल, प्रवाह पूर्ण और प्रभावकारी है। शोध की गंभीरता के बावजूद शैली बोझिल नहीं होती। यही कारण है कि यह कृति शोधार्थियों, विद्यार्थियों, इतिहास-प्रेमियों और सामान्य पाठकों—सभी के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होती है। लेखक ने विवादों और मतभेदों को भी संतुलित दृष्टि से प्रस्तुत किया है, जिससे पुस्तक एकपक्षीय न होकर विमर्शपरक बनती है।

डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित यह कृति संपादन और प्रस्तुति की दृष्टि से भी सुसंगठित है। संदर्भ सूची और परिशिष्ट इसे शोधग्रंथ का स्वरूप प्रदान करते हैं।

समग्रतः “आजादी का मंत्र : वंदे मातरम” (150 वर्ष की यात्रा) केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि राष्ट्रभाव की ऐतिहासिक चेतना का पुनर्स्मरण है। यह कृति पाठकों को स्मरण कराती है कि “वंदे मातरम” केवल शब्द नहीं, बल्कि त्याग, एकता और स्वाधीनता की सामूहिक चेतना का प्रतीक है।

पुस्तक : आजादी का मंत्र : वंदे मातरम (150 वर्ष की यात्रा)

लेखक : डॉ. संदीप कुमार शर्मा

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स

उमेश कुमार सिंह
उमेश कुमार सिंह
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