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डिजिटल युग में मातृभाषाओं को बचाना बड़ी चुनौती

-अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस- 21 फरवरी,  2026-

21 फरवरी को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस केवल मातृभाषा संस्कृति को बचाने का अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि मानवता की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव है। वर्ष 2026 में इसकी मुख्य थीम “बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की आवाज़” है, जो यह संकेत देती है कि भविष्य की भाषाई दिशा युवा पीढ़ी तय करेगी। यह वर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस दिवस की 25वीं वर्षगांठ-रजत जयंती का प्रतीक है। वर्ष 1999 में यूनेस्को द्वारा इसकी घोषणा की गई और 2000 से इसे वैश्विक स्तर पर मनाया जा रहा है। इस वर्ष का फोकस 13 से 18 वर्ष के युवाओं को भाषाई विविधता के संरक्षण, मातृभाषा में शिक्षा के विस्तार और डिजिटल युग में भाषाओं की भूमिका पर सक्रिय संवाद के लिए प्रेरित करना है।

मातृभाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती, वह मनुष्य के मन, मस्तिष्क और संवेदनाओं की प्रथम अभिव्यक्ति है। बच्चा जब जन्म लेता है तो वह किसी औपचारिक शिक्षा से पहले अपनी माँ की ध्वनियों, लोरियों और संवादों के माध्यम से भाषा का संस्कार ग्रहण करता है। यही भाषा उसकी सोच, उसकी रचनात्मकता और उसकी पहचान का आधार बनती है। शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने पर बच्चों की समझ, विश्लेषण क्षमता और आत्मविश्वास में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। फिर भी वैश्विक स्तर पर लगभग 40 प्रतिशत बच्चों को उस भाषा में शिक्षा नहीं मिलती जिसे वे बोलते या समझते हैं।

इस दिवस का ऐतिहासिक संदर्भ हमें 21 फरवरी 1952 की उस त्रासदी की याद दिलाता है जब पूर्वी पाकिस्तान में अपनी मातृभाषा बांग्ला के सम्मान के लिए छात्रों ने आंदोलन किया और गोलीबारी में अनेक युवा शहीद हो गए। बाद में यही पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र होकर बांग्लादेश बना। उन शहीदों की स्मृति में यह दिवस भाषाई अधिकारों और अस्मिता का प्रतीक बन गया। यह हमें सिखाता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता का आधार है। वर्ष 2026 की थीम युवाओं की भागीदारी को केंद्र में रखती है। आज का युवा डिजिटल संसार में जी रहा है। सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऑनलाइन शिक्षा उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मातृभाषाओं के लिए पर्याप्त स्थान है? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक ओर तो विलुप्तप्राय भाषाओं के शब्दकोश, ध्वनि-संग्रह और अनुवाद प्रणाली विकसित कर उन्हें पुनर्जीवित कर सकता है, वहीं दूसरी ओर यदि तकनीक कुछ सीमित भाषाओं तक सिमट जाए तो भाषाई असमानता और गहरी हो सकती है। इसलिए युवाओं को तकनीक का उपयोग मातृभाषा सशक्तिकरण के लिए करना होगा-ऐप, ब्लॉग, पॉडकास्ट, यूट्यूब चैनल और डिजिटल पुस्तकालयों के माध्यम से अपनी भाषाओं को वैश्विक मंच देना होगा।

यूनेस्को का मानना है कि स्थायी समाज के लिए सांस्कृतिक और भाषाई विविधता बहुत जरूरी है। शांति के लिए अपने जनादेश के तहत यह संस्कृतियों और भाषाओं में अंतर को बनाए रखने के लिए काम करता है जो दूसरों के लिए सहिष्णुता और सम्मान को बढ़ावा देते हैं। बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक समाज अपनी भाषाओं के माध्यम से अस्तित्व में रहते हैं जो पारंपरिक ज्ञान और संस्कृतियों को स्थायी तरीके से प्रसारित और संरक्षित करते हैं। भाषाई विविधता लगातार खतरे में पड़ती जा रही है क्योंकि अधिकाधिक भाषाएं लुप्त होती जा रही हैं। मातृभाषा जीवन का आधार है, यह एक ऐसी भाषा होती है जिसे सीखने के लिए उसे किसी कक्षा की जरूरत नहीं पड़ती। जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं, वही व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है। लेकिन मानव समाज में कई दफा हमें मानवाधिकारों के हनन के साथ-साथ मातृभाषा के उपयोग को गलत भी बताया जाता रहा है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में यह चुनौती और अवसर दोनों है। पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार पिछले कुछ दशकों में सैकड़ों भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। यह केवल शब्दों का खो जाना नहीं, बल्कि परंपराओं, लोककथाओं, लोकगीतों और जीवनदृष्टि का विलुप्त होना है। यदि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से विमुख हो जाएगी तो सांस्कृतिक जड़ों से उसका संबंध कमजोर हो जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहन मिले, स्थानीय साहित्य और लोकसंस्कृति को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाए, और युवाओं को अपनी भाषा में अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान किए जाएँ। आज एक बड़ा भ्रम यह है कि केवल विदेशी भाषा ही विकास का मार्ग है। निस्संदेह वैश्विक संपर्क के लिए अन्य भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी मातृभाषा की उपेक्षा करें। मातृभाषा में शिक्षा से ही मौलिक चिंतन और नवाचार संभव है। भारत की नई शिक्षा नीति 2020 ने भी प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने पर बल दिया है। यह निर्णय वैज्ञानिक दृष्टि से भी उचित है, क्योंकि जब विद्यार्थी अपनी सहज भाषा में सीखता है तो वह केवल जानकारी ग्रहण नहीं करता, बल्कि उसे आत्मसात करता है।

हमारे देश में मातृभाषाओं के प्रति अनेक प्रकार के भ्रम फैले हैं, जिनमें एक भ्रम है कि अंग्रेजी विकास और ज्ञान की भाषा है। जबकि इस बात से यूनेस्को सहित अनेक संस्थानों के अनुसंधान यह सिद्ध कर चुके हैं कि अपनी भाषा में शिक्षा से ही बच्चे का सही एवं सर्वांगीण मायने में विकास हो पाता है। इस दृष्टि से मातृभाषा में शिक्षा पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। युवाओं में मातृभाषा के प्रति आकर्षण कैसे बढ़ाया जाए? पहला उपाय है-भाषा को बोझ नहीं, गौरव के रूप में प्रस्तुत करना। जब हम अपने साहित्यकारों, वैज्ञानिकों और महापुरुषों की उपलब्धियों को मातृभाषा से जोड़कर बताते हैं, तो युवाओं में स्वाभिमान जागृत होता है। दूसरा उपाय है-रचनात्मक मंच उपलब्ध कराना। कविता-पाठ, नाटक, वाद-विवाद, ब्लॉग लेखन और डिजिटल कंटेंट निर्माण के माध्यम से युवा अपनी भाषा में सृजन करें। तीसरा उपाय है-परिवार की भूमिका।

घर में यदि संवाद मातृभाषा में होगा तो बच्चे में स्वाभाविक अनुराग उत्पन्न होगा। भाषाई विविधता के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। भारत में सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ हैं; प्रत्येक भाषा अपने साथ एक विशिष्ट जीवनदर्शन लेकर आती है। हमें यह समझाना होगा कि किसी भी भाषा को छोटा या बड़ा कहना अनुचित है। सभी भाषाएँ समान रूप से सम्माननीय हैं। हिन्दी राजभाषा है, परंतु अन्य भारतीय भाषाएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। संस्कृत हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपरा की धरोहर है, तो तमिल, बांग्ला, मराठी, गुजराती, उड़िया, असमिया, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी, कश्मीरी और अन्य भाषाएँ अपनी-अपनी सांस्कृतिक संपदा से राष्ट्र को समृद्ध करती हैं।

डिजिटल युग में युवाओं को यह संकल्प लेना चाहिए कि वे अपनी मातृभाषा में कम से कम एक रचनात्मक कार्य अवश्य करेंगे-चाहे वह एक ब्लॉग हो, एक कहानी, एक गीत या एक शैक्षिक वीडियो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद उपकरणों और भाषा मॉडल्स का उपयोग करके वे अपनी भाषा की सामग्री को वैश्विक पाठकों तक पहुँचा सकते हैं। इससे न केवल भाषा का संरक्षण होगा, बल्कि आर्थिक अवसर भी बढ़ेंगे। स्थानीय भाषाओं में स्टार्टअप, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल प्रकाशन नए रोजगार के द्वार खोल सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026 हमें यह संदेश देता है कि भाषाई विविधता ही मानवता की वास्तविक समृद्धि है।

यदि हम सतत विकास का लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं तो समावेशी शिक्षा आवश्यक है, और समावेशी शिक्षा का आधार मातृभाषा है। युवाओं की आवाज़ जब बहुभाषी शिक्षा के समर्थन में उठेगी, तभी समाज में व्यापक परिवर्तन संभव होगा। आज आवश्यकता है एक सामूहिक संकल्प की-हम अपनी मातृभाषा का सम्मान करेंगे, उसे डिजिटल मंचों पर प्रतिष्ठित करेंगे और आने वाली पीढ़ियों तक उसकी विरासत पहुँचाएँगे। भाषा हमारी आत्मा है; उसे जीवित रखना हमारा दायित्व है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर यही संदेश गूंजना चाहिए कि युवा ही भाषाई भविष्य के प्रहरी हैं। जब युवा अपनी जड़ों से जुड़ेंगे, तभी विश्व अधिक समावेशी, सहिष्णु और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनेगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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