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शिक्षा को हिंसक नहीं, संवेदनशील बनाना होगा

देश में इन दिनों बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं और सामान्य परीक्षाएं भी शुरू होने वाली हैं। हर साल की तरह इस बार भी परीक्षा का मौसम केवल प्रश्नपत्रों और परिणामों का नहीं, बल्कि मानसिक दबाव, चिंता और असुरक्षा का मौसम बनता जा रहा है। छात्रों के चेहरों पर भविष्य की चिंता साफ पढ़ी जा सकती है। यह चिंता केवल अच्छे अंक लाने की नहीं, बल्कि अपेक्षाओं के बोझ को ढोने की है। दुर्भाग्य यह है कि यह दबाव कई बार इतना असहनीय हो जाता है कि वह आत्मघाती या हिंसक रूप ले लेता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े एक भयावह सच उजागर करते हैं। वर्ष 2013 से 2023 के बीच छात्रों की आत्महत्या की दर में लगभग 65 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के टूटने की कहानी है। इन आत्महत्याओं के पीछे पढ़ाई का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं, सामाजिक तुलना और आर्थिक तनाव प्रमुख कारण बताए जाते हैं। लेकिन हाल में लखनऊ में जो घटना सामने आई, उसने इस संकट को एक और खतरनाक दिशा में मोड़ दिया है।

शिक्षा को हिंसक नहीं, संवेदनशील बनाना होगा

लखनऊ की घटना केवल परीक्षा दबाव की कहानी नहीं है, बल्कि परिवारों में बढ़ती संवेदनहीनता, संवादहीनता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा का दर्पण है। पुलिस जांच के अनुसार एक पैथोलॉजी लैब संचालक पिता अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहते थे और उस पर नीट जैसी परीक्षा पास करने का लगातार दबाव बना रहे थे। घटना वाले दिन भी दोनों के बीच बहस हुई और 21 वर्षीय युवक ने पिता की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद उसने अपराध छिपाने के लिए शव के टुकड़े किए, कुछ बाहर फेंके, कुछ घर में छिपाए, छोटी बहन को धमकाया और पुलिस को गुमराह करने के लिए पहले लापता होने और फिर आत्महत्या की कहानी गढ़ी। यह सब बताता है कि यह क्षणिक आवेश नहीं था, बल्कि भीतर लंबे समय से पल रही कुंठा, आक्रोश और मानसिक विघटन का परिणाम था। प्रश्न यह है कि एक बेटे के भीतर इतनी नफरत कैसे पनप सकती है? क्या ‘कुछ बनने’ का दबाव इतना भारी हो सकता है कि वह रिश्तों को भी तार-तार कर दे? हर माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान सफल हो, प्रतिष्ठित करियर बनाए, समाज में सम्मान पाए। लेकिन जब यह चाहत संवाद और सहयोग की जगह नियंत्रण और दबाव का रूप ले लेती है, तब वह प्रेरणा नहीं, मानसिक उत्पीड़न बन जाती है। जब शिक्षा जीवन-निर्माण का माध्यम न होकर, विनाश का कारण बन जाती है।

भारत में नीट और जी जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों युवाओं के लिए उम्मीद का प्रतीक हैं। नीट में पिछले वर्ष 23 लाख से अधिक छात्रों ने पंजीकरण कराया, जबकि ज्वाइंट एन्टरेंस एक्जामिनेशन (जेईई) के एक सत्र में 13 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने आवेदन किया। इन लाखों विद्यार्थियों में से केवल कुछ हजार ही शीर्ष संस्थानों तक पहुंच पाते हैं। शेष विद्यार्थियों के हिस्से अक्सर निराशा, आत्मग्लानि और सामाजिक तुलना का दंश आता है। जब सफलता का पैमाना केवल रैंक और अंक बन जाए, तो असफलता जीवन का अंत प्रतीत होने लगती है। कोटा जैसे कोचिंग केंद्रों में हर वर्ष आत्महत्या की खबरें सामने आती हैं। कोटा देश की कोचिंग राजधानी कही जाती है, जहां हजारों छात्र सपने लेकर पहुंचते हैं। लेकिन उन्हीं सपनों का बोझ कई बार उनके जीवन से भारी पड़ जाता है। यह केवल व्यक्तिगत कमजोरी का मामला नहीं है, बल्कि एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का परिणाम है जिसमें प्रतियोगिता सहयोग से अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है।

लखनऊ की घटना में एक और तथ्य उल्लेखनीय है-आरोपी छात्र की मां का निधन हो चुका था। घर में चाचा-चाची मौजूद थे, लेकिन क्या उस युवक की मनःस्थिति को समझने का प्रयास किया गया? क्या उसके भीतर के तनाव, अकेलेपन और भय को किसी ने सुना? यदि परिवार में नियमित संवाद होता, यदि मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही गंभीरता से लिया जाता जितनी अंकों को, तो शायद यह भयावह वारदात टाली जा सकती थी। आज समस्या केवल आत्महत्या तक सीमित नहीं है। बच्चे हिंसक भी हो रहे हैं। यह हिंसा बाहरी नहीं, भीतर से उपज रही है-कुंठा, अपमानबोध, तुलना और असफलता के भय से। जब बच्चे को यह महसूस होने लगे कि वह केवल एक ‘प्रोजेक्ट’ है, एक ‘इन्वेस्टमेंट’ है, जिसे किसी निश्चित पेशे में ढालना है, तब उसकी स्वतंत्र पहचान कुचल जाती है। वह या तो भीतर ही भीतर टूट जाता है या विस्फोट कर देता है।

शिक्षा का उद्देश्य जीवनदायिनी होना चाहिए-विवेक, संवेदना और आत्मविश्वास का विकास करना चाहिए। लेकिन जब शिक्षा केवल प्रतिस्पर्धा और रैंकिंग का माध्यम बन जाए, तो वह तनाव और हिंसा को जन्म देती है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता, और न ही बनना चाहिए। विविध प्रतिभाओं को सम्मान देने वाली सामाजिक मानसिकता विकसित किए बिना यह संकट कम नहीं होगा। इस संदर्भ में तीन स्तरों पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। पहला, परिवार। माता-पिता को यह समझना होगा कि अपेक्षा और दबाव में अंतर है। अपेक्षा प्रेरणा देती है, दबाव भय पैदा करता है।

बच्चों के साथ खुला संवाद, उनकी रुचियों को समझना, असफलता को स्वीकार्य बनाना और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। ‘तुम्हें डॉक्टर बनना ही है’ की जगह ‘तुम जो बनना चाहो, हम साथ हैं’ जैसी सोच विकसित करनी होगी। दूसरा, शिक्षा संस्थान। स्कूल और कोचिंग संस्थानों को केवल परिणाम देने वाली मशीन नहीं, बल्कि संवेदनशील संस्थान बनना होगा। नियमित काउंसलिंग, तनाव प्रबंधन कार्यशालाएं और परीक्षा को जीवन-मरण का प्रश्न न बनाने की संस्कृति विकसित करनी होगी। शिक्षकों को भी विद्यार्थियों की मानसिक दशा पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। तीसरा, सरकार और समाज। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और कलंकमुक्त बनाना होगा। परीक्षा प्रणाली में सुधार, वैकल्पिक करियर मार्गों को बढ़ावा, और कौशल आधारित शिक्षा पर जोर देना समय की मांग है। मीडिया को भी सनसनी की बजाय संवेदनशील रिपोर्टिंग करनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम इन घटनाओं को सामान्य न मानें। हर आत्महत्या और हर हिंसक घटना हमारे सामाजिक ताने-बाने में दरार का संकेत है। यदि हम इसे केवल ‘व्यक्तिगत मामला’ कहकर टाल देंगे, तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी। लखनऊ की घटना हमें झकझोरती है। यह बताती है कि शिक्षा का दबाव, पारिवारिक संवादहीनता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा मिलकर कितनी भयावह परिणति ला सकती है। अब समय है कि हम सामूहिक आत्ममंथन करें। शिक्षा को जीवन का उत्सव बनाएं, न कि भय का कारण। बच्चों को लक्ष्य दें, लेकिन उनके पंख न काटें। सपने दिखाएं, पर उन्हें सांस लेने की जगह भी दें। जब तक हम सफलता की परिभाषा को व्यापक नहीं करेंगे और बच्चों को अंक से अधिक मनुष्य मानना नहीं सीखेंगे, तब तक यह संकट बना रहेगा। परीक्षा का मौसम हर साल आएगा, लेकिन यदि हम संवेदनशील समाज बन सके, तो शायद अगली पीढ़ी के लिए यह मौसम भय का नहीं, आत्मविश्वास का प्रतीक बन सकेगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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