NEW English Version

समानता का अधूरा सफर और नए संकल्प

-8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस-

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 20वीं सदी के श्रमिक आंदोलनों से जुड़ी है, और 1975 में यूनाइटेड नेशन ने इसे औपचारिक मान्यता प्रदान की। तब से यह दिवस महिलाओं के अधिकार, सम्मान, समान अवसर और लैंगिक न्याय के प्रश्न को विश्व पटल पर केंद्र में रखता आया है।

आज की महिला चाहे  विज्ञान, राजनीति, साहित्य, खेल, प्रशासन और उद्यमिता हो,हर क्षेत्र में उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज करा रही है। भारत में महिलाओं ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, अंतरिक्ष यात्री, वैज्ञानिक और सैन्य अधिकारी के रूप में नई ऊँचाइयाँ छुई हैं। शिक्षा का विस्तार, विधिक संरक्षण और सामाजिक जागरूकता ने महिलाओं की स्थिति को मजबूत किया है। कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न विरोधी कानून, मातृत्व लाभ, और पंचायतों में आरक्षण जैसे कदम सकारात्मक परिवर्तन के संकेत हैं। किन्तु इन उपलब्धियों के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि समानता का सफर अभी अधूरा है।

लैंगिक असमानता केवल अवसरों की कमी का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता से जुड़ा विषय है। वेतन असमानता,घरेलू हिंसा, बाल विवाह, शिक्षा और स्वास्थ्य में भेदभाव, निर्णय प्रक्रिया में सीमित भागीदारी।ये समस्याएँ आज भी व्यापक रूप से मौजूद हैं।ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है, जहाँ परंपरागत सोच और आर्थिक निर्भरता उनके अधिकारों को सीमित कर देती है।

आँकड़े कहते हैं कि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना लैंगिक समानता का सबसे प्रभावी मार्ग है। स्वरोजगार, कौशल विकास और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं, किंतु कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँची है।यदि आधी आबादी आर्थिक रूप से सक्रिय और आत्मनिर्भर बने, तो राष्ट्र की विकास दर और सामाजिक प्रगति दोनों में गुणात्मक वृद्धि संभव है।

डिजिटल क्रांति ने महिलाओं को शिक्षा, उद्यमिता और अभिव्यक्ति के नए मंच प्रदान किए हैं। ऑनलाइन शिक्षा, ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया ने अनेक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है। परंतु साइबर उत्पीड़न और ऑनलाइन हिंसा भी नई चुनौतियाँ लेकर आई हैं। डिजिटल सुरक्षा और जागरूकता अब महिला सशक्तिकरण का अनिवार्य हिस्सा है।

कानून और नीतियाँ तभी प्रभावी होती हैं जब समाज की सोच बदले। पुत्र और पुत्री में समानता, घरेलू कार्यों का साझा दायित्व, और निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की सहभागिता,ये छोटे कदम बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।महिला दिवस केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है। यह पुरुषों और महिलाओं दोनों से अपेक्षा करता है कि वे समानता को व्यवहार में उतारें।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हम सचमुच एक समतामूलक समाज की ओर बढ़ रहे हैं? महिला सशक्तिकरण कोई दान नहीं, बल्कि अधिकार है। समानता केवल अवसर की नहीं, सम्मान और गरिमा की भी होनी चाहिए। जब तक हर महिला भयमुक्त होकर शिक्षा, रोजगार और अभिव्यक्ति के अवसरों का लाभ नहीं उठा पाती, तब तक यह दिवस अधूरा है।8 मार्च का संदेश स्पष्ट है,समानता केवल लक्ष्य नहीं, बल्कि सतत प्रयास का मार्ग है।और यह मार्ग तभी सफल होगा, जब समाज का हर वर्ग इसे अपना संकल्प बनाए।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »