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सृष्टि संतुलन के लिये वनों की पुकार सुननी होगी

21 मार्च को प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस केवल एक प्रतीकात्मक उत्सव नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती की ओर संकेत करने वाला अवसर है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2012 में इस दिवस की घोषणा इस उद्देश्य से की गई थी कि विश्व समुदाय वनों के महत्व को समझे, उनके संरक्षण के लिए संगठित प्रयास करे और प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़े। आज जब पृथ्वी अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकटों से जूझ रही है, तब इस दिवस की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। वर्ष 2026 की थीम “वन और भोजन” यह स्पष्ट करती है कि वन केवल हरित आच्छादन नहीं, बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा के मूल स्तंभ हैं।

वर्तमान समय में पर्यावरणीय असंतुलन अपने चरम पर है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति ने मानव जीवन को संकटग्रस्त कर दिया है। इन परिस्थितियों में वन एक ऐसे प्राकृतिक तंत्र के रूप में सामने आते हैं, जो पृथ्वी के संतुलन को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वैश्विक तापवृद्धि को नियंत्रित करते हैं, जल चक्र को संतुलित रखते हैं और मृदा अपरदन को रोकते हैं। इसके बावजूद, विडंबना यह है कि मानव अपनी तात्कालिक आवश्यकताओं और आर्थिक विकास की अंधी दौड़ में वनों का अंधाधुंध दोहन कर रहा है। यही कारण है कि आज वन महोत्सव जैसे आयोजनों की आवश्यकता केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक जागरण के रूप में महसूस की जा रही है।

वनों की उपयोगिता का दायरा केवल पर्यावरणीय संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। 2026 में प्रस्तावित “वनों और अर्थव्यवस्था” थीम इस तथ्य को रेखांकित करती है कि वन सतत आर्थिक विकास के आधार हैं। लाखों लोगों की आजीविका सीधे तौर पर वनों पर निर्भर है। लघु वनोपज, औषधीय पौधे, रेजिन, गोंद, शहद और बांस जैसे उत्पाद न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इसके साथ ही, इको-टूरिज्म के माध्यम से भी रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। इस प्रकार वन एक ऐसे आर्थिक संसाधन के रूप में सामने आते हैं, जो विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं। वनों का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी कम नहीं है। विशेष रूप से स्वदेशी और आदिवासी समुदायों के लिए वन जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। उनकी परंपराएँ, आस्थाएँ और जीवनशैली वनों से ही संचालित होती हैं। वन उनके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार हैं। इसी कारण, वन संरक्षण केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक संरक्षण का भी विषय है। वन महोत्सव जैसे आयोजन समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाकर इस साझा जिम्मेदारी का बोध कराते हैं कि वनों की रक्षा केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है।

भारत के संदर्भ में वनों का महत्व और भी अधिक व्यापक और बहुआयामी है। यहाँ वन केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक हैं। भारतीय परंपरा में वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। पीपल, वट और नीम जैसे वृक्ष केवल जैविक इकाइयाँ नहीं, बल्कि जीवनदायी शक्ति के रूप में पूजे जाते हैं। भारत की समृद्ध जैव विविधता वनों पर ही निर्भर है, और इसका संरक्षण देश की पारिस्थितिक सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। वन देश की जलवायु को संतुलित रखने, वर्षा चक्र को नियंत्रित करने और कृषि उत्पादन को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत में वनों की उपयोगिता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वे ग्रामीण और आदिवासी जीवन की आधारशिला हैं। देश के लाखों लोग अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर हैं। भोजन, ईंधन, चारा और औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति वनों के माध्यम से होती है। इसके अतिरिक्त, वन जल संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे नदियों और जल स्रोतों का अस्तित्व बना रहता है। आज जब देश के कई हिस्सों में जल संकट गहराता जा रहा है, तब वन संरक्षण की आवश्यकता और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है।

वर्तमान शासनकाल में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वन संरक्षण और हरित विकास को लेकर कई महत्वपूर्ण पहलें की गई हैं। “हरित भारत मिशन” के तहत बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य देश के वन क्षेत्र को बढ़ाना और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना है। “नमामि गंगे” परियोजना के माध्यम से नदियों के किनारे वृक्षारोपण कर जल संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास किए गए हैं। इसके साथ ही, कैम्पा फंड के प्रभावी उपयोग से वन पुनर्स्थापन और संरक्षण कार्यों को गति मिली है। सरकार ने शहरी क्षेत्रों में भी हरित आवरण बढ़ाने के लिए मियावाकी पद्धति को प्रोत्साहित किया है, जिससे छोटे-छोटे स्थानों में घने वन विकसित किए जा रहे हैं। इन पहलों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान समय में विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ लेकर चलने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार की नीतियाँ यह दर्शाती हैं कि यदि सही दृष्टिकोण अपनाया जाए, तो आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। हालांकि, यह भी आवश्यक है कि इन प्रयासों में जनसहभागिता को और अधिक बढ़ाया जाए, क्योंकि वनों की सुरक्षा केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक प्रयासों से ही सुनिश्चित की जा सकती है।
अंततः वन महोत्सव और अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस हमें यह संदेश देते हैं कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना ही मानव सभ्यता की स्थिरता का आधार है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम वनों को केवल संसाधन के रूप में न देखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन का अभिन्न अंग मानें। जब तक यह दृष्टिकोण विकसित नहीं होगा, तब तक पर्यावरणीय संकटों का समाधान संभव नहीं है। यदि हम सचमुच अपने भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें वनों की रक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा। यही वन महोत्सव की वास्तविक सार्थकता है और यही अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस का मूल संदेश भी।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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