संस्मरण :
वह बिना नागा किए हर रोज़ आती थी—चुपचाप, शांत, संकोची-सी। उसके कदमों की आहट जैसे एक नियमित लय में बंधी हुई थी। वह आती, अपने काम को बड़ी नफ़ासत और तल्लीनता से करती, और बिना किसी हलचल के लौट जाती। जैसे वह अपने अस्तित्व को भी अपने काम के साथ ही समेट ले जाती हो।

मैं उसे तब से देख रहा था, जब शायद मैं पाँच-छह वर्ष का रहा होऊँगा। स्मृतियों की धुँधली परतों में भी उसकी छवि उतनी ही स्पष्ट है—जैसे समय ने उसे छुआ ही न हो। विवाह के बाद से ही उसने यह दायित्व अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था—लोगों के घरों के शौचालयों की सफाई करना, बीते दिनों का मैल अपने सिर पर ढोकर ले जाना। उस समय ऐसे लोगों को ‘जमादार’ और स्त्री होने पर ‘जमादारिन’ कहा जाता था।
यह कार्य समाज की दृष्टि में भले ही छोटा और घृणास्पद माना जाता रहा हो, पर उसकी कर्तव्यनिष्ठा और गरिमा ने उस काम को मेरे मन में एक अलग ही ऊँचाई दे दी थी। सच कहूँ, तो उसकी भद्रता और व्यक्तित्व के सामने कई सुसंस्कृत घरों की बहुएँ भी फीकी लगती थीं।
उसके आने की पहचान उसके पैरों की छन-छन से होती थी, जो हमारे घर के बगल की संकरी, कोलकी-सी गली से सुनाई देती थी। मैं अनायास ही उस दिशा में खिंच जाता और उसे निहारने लगता।
उसकी वेशभूषा अत्यंत सलीकेदार होती—साफ-सुथरी साड़ी, सधा हुआ ब्लाउज, और अक्सर एक ही रंग की साड़ी, कभी हरी, कभी नीली, तो कभी पीली। उसके बाल करीने से संवरे रहते, माँग में गाढ़ा सिंदूर उसकी गरिमा को और बढ़ा देता। कभी-कभी मोगरे के फूलों का गजरा भी उसकी जुल्फ़ों में सजा होता, जिसकी हल्की सुगंध जैसे उसके व्यक्तित्व का विस्तार बन जाती।
उसके होंठ पान की लाली से रंगे रहते, जो उसके चेहरे की सौम्यता में एक अनकही चमक जोड़ देते। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति, नम्रता और आत्मसम्मान झलकता था—जैसे वह अपने कर्म की कठोरता को अपने व्यक्तित्व की कोमलता से संतुलित कर रही हो।मैंने उसे कभी ऊँची आवाज़ में बोलते नहीं सुना, न ही किसी से उलझते देखा। वह अपने भीतर जैसे एक मौन संसार लिए चलती थी। आज सोचता हूँ, तो आश्चर्य होता है—इतनी गहराई, इतनी शालीनता… और मैं उससे कभी बात तक न कर सका।

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