ज्येष्ठ मास की कृष्ण अमावस
वट सावित्री का त्योहार
अमर सुहाग की मंगल कामना
का भू से नभ तक विस्तार
अटल आस्था का प्रतीक यह
पूजित है विशाल वटवृक्ष
त्रिविध देव का वास है इसमें
वेदों द्वारा कथित ये सिद्ध
जड़ में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु,
शाखा में शिव रूप समाहित
दृढ़ निष्ठा,संकल्प,प्रेम से
सुहागिनों द्वारा ये पूजित
हाथों में ले सूत का धागा
परिक्रमा ये करती हैं
भीगे चने और श्रद्धा भक्ति से
अर्घ्य समर्पित करती हैं
सात फेरों के सात वचन को
फिर से ये दोहराती हैं
रहे अमर सिंदूर शीश का
मन में कामना करती हैं
जीत लिया ज्यों सावित्री ने
कालचक्र की गति को भी
मौन कर दिया था तर्कों से
यमराज की नीति को भी
उसी तपोबल की गाथा का
कण कण आज भी साक्षी है
देख पतिव्रता का पावन व्रत
धरा भी आशीष देती है
सजती रहे माथ पर बिंदी
बजता रहे हाथ का कंगन
युगों युगों तक रहे महकता
सुहागिनों का घर आंगन !!!


