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पर्यावरण संतुलन खत्म होगा तो दुनिया का सर्वनाश निश्चित 

विश्व की सभी महाशक्तियाँ और ताकतवर देश संयुक्त राष्ट्र संघ एवं सुरक्षा परिषद द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करते हैं, पर प्रकृति के नियमों का उल्लंघन और अवहेलना भी हो रही है। इन राष्ट्रों के लगातार किए जा रहे परमाणु परीक्षणों और विस्फोटों के कारण अतिवृष्टि, अनावृष्टि तथा दूषित वायुमंडल जैसी समस्याएँ हमें चेतावनी दे रही हैं। ये देश उल्टे दुनिया को तबाह करने वाले परमाणु हतियारों का विशाल भंडार रखकर दुनिया को धमका रहे हैं और मनमानी कर रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण रूस-यूक्रेन युद्ध है, जिसकी तबाही तीन वर्षों से अधिक समय से जारी है। ऊपर से इसराइल और फिलिस्तीन, लेबनान, ईरान और अभी इजरायल अमेरिका ईरान के बीच भयंकर युद्ध चल रहा है जो कभी स्थगित होता है तो कभी फिर आसन्न युद्ध खतरा मंडराने लगता है। इन देशों म युद्धों का गहरा दुष्प्रभाव दुनिया भर के पर्यावरण पर पड़ रहा है। इन दुष्प्रभावों से पूरी दुनिया प्रभावित हो चुकी है।

पर्यावरण प्रदूषण को हम निम्न प्रकार से देखेंगे

वायुमंडलीय प्रदूषण: स्वच्छ हवा प्राणिमात्र के लिए पहली आवश्यकता है। इस दृष्टि से आज हमारे वातावरण में काफी जहर घुल चुका है। कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला धुआँ प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है, वहीं वाहनों द्वारा छोड़ी जाने वाली गैसें और धुआँ भी जिम्मेदार हैं। वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड एवं कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी विषैले गैसों की मात्रा बढ़ रही है। यदि इनकी मात्रा बढ़ती रही तो तेजाबी वर्षा हो सकती है और कई घातक बीमारियाँ फैल सकती हैं।

जल प्रदूषण: हवा के बाद पानी जीवन की दूसरी मूलभूत आवश्यकता है। कारखानों में रसायनिक प्रक्रियाओं के बाद निकला जल विषैला हो जाता है, जिसे हम कभी-कभी ही पीने योग्य बनाए बिना उपयोग कर लेते हैं। शहरी क्षेत्रों में मल-मूत्र और सीवेज नालों के जरिये नदियों में पहुंच जाता है। इस विषैले और प्रदूषित जल में घातक कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ होते हैं, साथ ही रोगजनक कीटाणु भी होते हैं जो महामारियों का कारण बनते हैं। प्रदूषित जल के कारण कुछ वर्ष पूर्व बिलासपुर शहर और आसपास के क्षेत्रों में आंत्रशोध, हैजा, डायरिया जैसी बीमारियों का प्रकोप देखा गया था। इस वर्ष भी बरसात का मौसम आने वाला है; अतः शासन, प्रशासन और निगम सहित हम सभी को बचाव उपाय अभी से पूरा कर लेना आवश्यक है।

भूमि प्रदूषण: – कीटनाशकों, फफूंदनाशकों और रासायनिक खादों के अधिक प्रयोग से मिट्टी प्रदूषित हो रही है। इससे जमीन की उर्वर शक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। वर्षा के पानी के साथ ये विनाशक पदार्थ नदियों और तालाबों में पहुँचते हैं, जिससे भूमि प्रदूषण अप्रत्यक्ष रूप से जल को भी दूषित करता है। पर्यावरण की सुरक्षा में पेड़ों और पौधों का विशेष महत्व है। मनुष्य के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन से वृक्ष अटूट रूप से जुड़े हैं। पर्यावरण जब भी बिगड़ेगा, उसका सबसे बड़ा खामियाजा मानव को भुगतना होगा। यह उतना ही सत्य है जितना कि हम धरती को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण फैलाने का पहला और अंतिम कारण स्वयं मनुष्य ही है। अतः मानव के हित के लिए जितनी जल्दी पर्यावरण सुधार के प्रति सजग हुए उतना ही अच्छा होगा। 

पर्यावरण प्रदूषण का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि पर्यावरण किसे कहते हैं। हमारे चारों ओर की जलवायु, वनस्पति, जल और जीवधारियाँ आपसी सामंजस्य में मिलकर पर्यावरण बनाती हैं। इन सबके आपसी संतुलन से जैविक विविधता और स्वच्छ पर्यावरण का निर्माण होता है। प्राकृतिक उथल-पुथल से कभी-कभी यह संतुलन बिगड़ जाता है; तब पर्यावरण को संतुलित करने की जिम्मेदारी सबसे अधिक बुद्धिमान प्राणी मानव पर आती है। यही नैतिक दायित्व भी है।

जीवधारियों के लिए आवश्यक स्वच्छ पर्यावरण अब काफी हद तक प्रदूषित हो चुका है। जीवन की प्रथम संजीवनी प्राणवायु भी हर सांस के साथ हमें जोखिम के करीब ले जा रही है। मानव जीवन सरल होने के बजाय जटिल और कठिन होता जा रहा है। भारत में तीव्र गति से बढ़ती आबादी और निरंतर हो रहे औद्योगिकीकरण ने आवश्यकताओं को और बढ़ा दिया है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बढ़ते बड़े- बड़े उद्योग वायु, जल और धूल को जहरीले धुएँ, खतरनाक रसायन और अवशिष्ट कूड़े करकट से प्रतिदिन प्रदूषित कर रहे हैं। पवित्र नदियों का स्वच्छ जल अब अमृत तुल्य नहीं रह गया है; यह मानव और अन्य जीवों के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। पर्यावरण प्रदूषण के लिए केवल उद्योग ही दोषी नहीं हैं; समाज का प्रत्येक वर्ग उत्तरदायी है।     

सरकार कितने भी स्वच्छता व पर्यावरण सुधारक कार्यक्रम चला ले, जब तक हम तन-मन-धन से उनके सहयोग में आगे नहीं आएंगे, तब तक परिणाम सीमित रहेंगे। आज मनुष्य जिस तेजी से प्रगति और अत्याधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से वह पर्यावरण को भी गंदा कर रहा है। हालांकि प्रकृति के प्रति हमारी परंपरा में श्रद्धा और आदर रहा है; वनों और वृक्षों को समाज में पूजा का स्थान मिला है। पौधे वायुमंडल की हानिकारक गैसों को अवशोषित करते हैं और जीवन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन देते हैं; वे वातावरण में ताजगी बनाए रखते हैं। अतः वृक्षों की अवैध कटाई रोकना, हरे वृक्षों की रक्षा और वृक्षारोपण अत्यावश्यक है।

प्रदूषण की रोकथाम के लिए सबसे पहली आवश्यकता जन-जागरण है। नए उद्योगों को तब तक अनुमति नहीं दी जानी चाहिए जब तक उनमें प्रदूषण निवारण के समुचित इंतजाम न हों। कानूनी तौर पर प्रदूषण फैलाने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई भी आवश्यक है।

यदि विभिन्न प्रकार के बढ़ते प्रदूषण की रोकथाम शीघ्र न की गई तो आने वाली पीढ़ियों के लिए स्थिति बहुत भयावह हो जाएगी। समाज के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह सरकार द्वारा चलाए जा रहे जन-जागरण या सफाई अभियानों के निर्देशों का पालन कर सहयोग करे। अन्यथा जीवन एक अभिशाप बन कर रह जाएगा। आवश्यक है कि हम एकजुट होकर ऐसा समाज बनाएँ जहाँ प्रकृति और पर्यावरण के साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से अपनी उपलब्धियों को आगे बढ़ाया जा सके और आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श छोड़ा जा सके।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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