भारतीय सभ्यता और संस्कृति के इतिहास में काशी या बनारस का स्थान अद्वितीय है। यह केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन, आस्था, ज्ञान और परम्परा का जीवंत प्रतीक है। गंगा तट पर बसी यह प्राचीन नगरी सदियों से धर्म, दर्शन, साहित्य, संगीत और लोकसंस्कृति का प्रमुख केन्द्र रही है। ऐसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगर को समझने का प्रयास प्रख्यात शिक्षाविद्, मनोवैज्ञानिक और साहित्यकार डॉ. मंजू देवी ने अपनी पुस्तक ‘गलियों का शहर बनारस’ में किया है। डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक बनारस की आत्मा को समझने का एक सार्थक प्रयास है।

डॉ. मंजू देवी का शैक्षणिक और सामाजिक अनुभव इस पुस्तक को विशेष विश्वसनीयता प्रदान करता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए. और पीएच.डी. करने वाली लेखिका ने मनोविज्ञान की अध्यापिका, शोधकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में लंबे समय तक कार्य किया है। यही कारण है कि पुस्तक केवल संस्मरणात्मक वर्णन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक अध्ययन का रूप भी ग्रहण कर लेती है।
पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि लेखिका ने बनारस को केवल धार्मिक नगरी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलुओं को भी समान महत्व दिया है। बनारस की गलियाँ यहाँ केवल रास्ते नहीं हैं, बल्कि वे स्मृतियों, परम्पराओं और मानवीय अनुभवों की वाहक बनकर सामने आती हैं। लेखिका इन गलियों में बसने वाले जीवन, संस्कृति और बदलते समय की चुनौतियों को संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती हैं।
पुस्तक में बनारस के प्रसिद्ध लकड़ी के खिलौना उद्योग का उल्लेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लेखिका बताती हैं कि कैसे पीढ़ियों से चली आ रही यह पारम्परिक कला आज आधुनिक बाजार और विदेशी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है। इसी प्रकार बनारसी साड़ी उद्योग पर किया गया विश्लेषण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बनारसी साड़ी भारत की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, लेकिन मशीनों से बनने वाली नकली साड़ियों और विपणन संबंधी समस्याओं ने बुनकरों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। इन विषयों पर लेखिका का दृष्टिकोण पुस्तक को सामाजिक और आर्थिक अध्ययन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है।
लोकजीवन का चित्रण पुस्तक की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। सावन के गीत, कार्तिक मास के धार्मिक अनुष्ठान, मोहल्लों की चहल-पहल, महिलाओं की लोक परम्पराएँ और गलियों का जीवंत वातावरण पाठक को उस बनारस से परिचित कराते हैं जो आधुनिकता की दौड़ में धीरे-धीरे बदल रहा है। इन प्रसंगों में लेखिका का आत्मीय जुड़ाव स्पष्ट दिखाई देता है।
स्वतंत्रता संग्राम में बनारस की भूमिका का वर्णन भी पुस्तक को विशेष महत्व प्रदान करता है। क्रांतिकारियों की गतिविधियाँ, स्थानीय प्रकाशनों का योगदान तथा दालमंडी क्षेत्र की ऐतिहासिक भूमिका जैसे प्रसंग इतिहास के अपेक्षाकृत कम चर्चित पक्षों को सामने लाते हैं। लेखिका ने अपने अनुभवों और स्थानीय स्मृतियों को जोड़कर इन घटनाओं को अधिक जीवंत बना दिया है।
दालमंडी पर आधारित अध्याय पुस्तक के सबसे रोचक हिस्सों में से एक है। आज जिसे मुख्यतः व्यापारिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, उसका सांस्कृतिक और संगीतपरक इतिहास लेखिका ने विस्तार से प्रस्तुत किया है। इससे पाठक बनारस के बहुआयामी स्वरूप को समझ पाता है।
पुस्तक की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता इसकी समावेशी दृष्टि है। लेखिका ने काशी को केवल एक धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं किया, बल्कि चर्च, गुरुद्वारे, मस्जिद, जैन और बौद्ध तीर्थस्थलों का उल्लेख करते हुए इसकी बहुधार्मिक और समन्वयवादी संस्कृति को रेखांकित किया है। इससे काशी के वास्तविक स्वरूप की व्यापक झलक मिलती है।
भारत माता मंदिर, रामनगर किला तथा प्राचीन हवेलियों का वर्णन पुस्तक को विरासत संरक्षण के विमर्श से भी जोड़ता है। लेखिका ने ऐतिहासिक धरोहरों की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त करते हुए उनके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया है। इसी प्रकार बनारस में रहने वाली विधवा महिलाओं के जीवन और संघर्ष का वर्णन अत्यंत संवेदनशीलता के साथ किया गया है, जो समाज के एक महत्वपूर्ण लेकिन उपेक्षित पक्ष को सामने लाता है।
भाषा की दृष्टि से पुस्तक सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है। संस्मरणात्मक शैली और शोधपरक दृष्टिकोण का संतुलन इसे रोचक और गंभीर दोनों बनाता है। यद्यपि कुछ विषयों पर और अधिक विस्तार किया जा सकता था तथा संदर्भ स्रोतों का उल्लेख पुस्तक को और सशक्त बनाता, फिर भी समग्र रूप से यह एक महत्वपूर्ण कृति है।
‘गलियों का शहर बनारस’ केवल बनारस की गलियों का वर्णन नहीं करती, बल्कि वहाँ की संस्कृति, स्मृतियों, संघर्षों, परम्पराओं और मानवीय संवेदनाओं का व्यापक चित्र प्रस्तुत करती है। इतिहास, संस्कृति, समाजशास्त्र और लोकजीवन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। काशी को समझने की इच्छा रखने वाला प्रत्येक पाठक इस पुस्तक के माध्यम से बनारस की आत्मा के और निकट पहुँच सकता है।
पुस्तक: गलियों का शहर बनारस
लेखक: डॉ. मंजू देवी
प्रकाशक: डायमंड पॉकेट बुक्स


