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नए भारत के शिल्पकार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

125वीं जयंती (6 जुलाई 2026) पर विशेषः
भारत का इतिहास केवल उन व्यक्तियों को याद नहीं रखता जिन्होंने सत्ता संभाली, बल्कि उन महापुरुषों को भी स्मरण करता है जिन्होंने राष्ट्र के भविष्य की दिशा निर्धारित की। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही राष्ट्रपुरुष एवं राष्ट्र-निर्माता थे, जिनकी दृष्टि तत्कालीन राजनीति की सीमाओं से कहीं आगे जाकर एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर, सांस्कृतिक रूप से जागृत और अखण्ड भारत के निर्माण पर केन्द्रित थी। उनकी 125वीं जयंती ऐसे समय में मनाई जा रही है जब भारत ‘विकसित भारत-2047’ के राष्ट्रीय संकल्प के साथ विश्व की अग्रणी शक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह केवल एक संयोग नहीं, बल्कि इतिहास का वह बिंदु है जहाँ डॉ. मुखर्जी के विचार और वर्तमान भारत की विकास यात्रा एक-दूसरे से मिलते दिखाई देते हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन केवल एक राजनेता का जीवन नहीं था, वे एक विलक्षण शिक्षाविद्, दूरदर्शी चिंतक, निर्भीक राष्ट्रवादी, कुशल प्रशासक और लोकतांत्रिक मूल्यों के सजग प्रहरी थे। उन्होंने राष्ट्रवाद को कभी संकीर्ण राजनीतिक विचारधारा नहीं माना, बल्कि उसे भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता और जनकल्याण का आधार बताया। उनका मानना था कि भारत केवल भौगोलिक सीमाओं का नाम नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना से निर्मित एक जीवंत राष्ट्र है।

आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘विकसित भारत-2047’ और ‘विश्वगुरु भारत’ की परिकल्पना को मूर्त रूप देने में जुटे हैं, तब डॉ. मुखर्जी की वैचारिक विरासत और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी अनेक अवसरों पर उन्हें आधुनिक भारत के महान निर्माताओं में स्थान दे चुके हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का ऐतिहासिक निर्णय केवल एक संवैधानिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि डॉ. मुखर्जी के उस अधूरे संकल्प की ऐतिहासिक पूर्णता थी जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन तक न्योछावर कर दिया था। डॉ. मुखर्जी ने स्पष्ट कहा था‘ ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।’ यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि भारत की अखण्ड राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राष्ट्रीय एकता किसी समझौते का विषय नहीं हो सकती। आज जम्मू-कश्मीर का पूर्ण संवैधानिक एकीकरण उनके बलिदान का जीवंत स्मारक है।

डॉ. मुखर्जी का व्यक्तित्व जितना राजनीतिक था, उससे कहीं अधिक बौद्धिक और शैक्षणिक था। मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बनना उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण था। उन्होंने शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार माना। उनका विश्वास था कि ऐसी शिक्षा, जिसमें विज्ञान की आधुनिकता और अध्यात्म की संवेदनशीलता का समन्वय हो, वही भारत को पुनः विश्वगुरु बना सकती है। आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परम्परा, मातृभाषा, अनुसंधान और नवाचार पर जो बल दिया जा रहा है, उसमें भी कहीं न कहीं डॉ. मुखर्जी की शिक्षा-दृष्टि की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को भी आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और उत्पादन-आधारित विकास से जोड़कर देखा। उनका मानना था कि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है। आज भारत विनिर्माण, डिजिटल तकनीक, स्टार्टअप, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, रक्षा उत्पादन और वैश्विक निवेश के क्षेत्र में जो नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कर रहा है, वह उसी आत्मनिर्भर भारत की भावना को सशक्त करता है जिसका बीजारोपण स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में अनेक राष्ट्रनिर्माताओं ने किया था।

डॉ. मुखर्जी लोकतंत्र को केवल चुनावों तक सीमित नहीं मानते थे। उनके लिए लोकतंत्र का अर्थ था- नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, समान अधिकार और राष्ट्रहित सर्वोपरि। उन्होंने सत्ता के विरोध में भी वही कहा जिसे वे राष्ट्रहित में उचित मानते थे। नेहरू मंत्रिमंडल से उनका त्यागपत्र सिद्धांतों की राजनीति का उत्कृष्ट उदाहरण है। आज जब राजनीति में मूल्य, नैतिकता और वैचारिक प्रतिबद्धता की चर्चा होती है, तब उनका जीवन आदर्श प्रेरणा बनकर सामने आता है। भारत के विभाजन के समय उन्होंने बंगाल के हिंदू-बहुल क्षेत्रों को भारत में बनाए रखने के लिए जो संघर्ष किया, वह उनके दूरदर्शी नेतृत्व का प्रमाण था। यदि उनका हस्तक्षेप न होता तो आज का पश्चिम बंगाल भी भारत का हिस्सा न होता। उन्होंने विभाजन को ऐतिहासिक विवशता माना, लेकिन सांस्कृतिक भारत की एकता को कभी खंडित नहीं माना। उनका अखण्ड भारत का विचार किसी भू-राजनीतिक विस्तार का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समरसता, साझा विरासत और सभ्यतागत एकात्मता का विचार था। डॉ. मुखर्जी भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। उन्होंने ऐसी राजनीतिक संस्कृति की नींव रखी जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि हो, शासन पारदर्शी हो और राजनीति सेवा का माध्यम बने। आज भारतीय लोकतंत्र जिस परिपक्वता के साथ विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था के रूप में प्रतिष्ठित है, उसमें उनके योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। उन्होंने वैचारिक विपक्ष को लोकतंत्र की आवश्यक शक्ति माना और स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद का समर्थन किया।

आज भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का राष्ट्रीय लक्ष्य केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, तकनीकी नेतृत्व, पर्यावरणीय संतुलन, सुशासन और वैश्विक उत्तरदायित्व का समेकित संकल्प है। इस संकल्प की वैचारिक भूमि पर यदि किसी राष्ट्रपुरुष की छाप स्पष्ट दिखाई देती है, तो उनमें डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका विश्वास था कि भारत अपनी सांस्कृतिक आत्मा को सुरक्षित रखते हुए ही आधुनिकता का नेतृत्व कर सकता है। यही आज के नए भारत की मूल पहचान भी बन रही है। भारत की युवा पीढ़ी के लिए डॉ. मुखर्जी का जीवन विशेष प्रेरणा है। उन्होंने सिद्ध किया कि आयु नहीं, दृष्टि राष्ट्र निर्माण करती है। युवा कुलपति, युवा सांसद, युवा केंद्रीय मंत्री और एक नए राजनीतिक आंदोलन के संस्थापक के रूप में उन्होंने युवाओं को नेतृत्व, साहस और राष्ट्रभक्ति का संदेश दिया। आज जब भारत विश्व का सबसे युवा राष्ट्र है, तब उनके विचार युवाओं को केवल सफल नहीं, बल्कि उत्तरदायी नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं।

डॉ. मुखर्जी का राष्ट्रवाद समावेशी था। वे भारत की विविधता को उसकी शक्ति मानते थे। उनका आग्रह था कि भाषा, क्षेत्र, जाति और पंथ की विविधताओं के बावजूद भारत की राष्ट्रीय पहचान एक ही है। आज ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ का अभियान इसी राष्ट्रीय एकात्मता को नई ऊर्जा प्रदान कर रहा है। उनका जीवन यह भी सिखाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों का कार्य नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। यदि भारत को 2047 तक विकसित, समृद्ध और विश्वगुरु बनाना है तो केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं होगा। हमें चरित्रवान नागरिक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सामाजिक समरसता, वैज्ञानिक सोच, सांस्कृतिक आत्मगौरव, नैतिक राजनीति और उत्तरदायी लोकतंत्र का भी निर्माण करना होगा। यही डॉ. मुखर्जी का वास्तविक संदेश था।

आज आवश्यकता केवल उनकी जयंती मनाने की नहीं, बल्कि उनके विचारों को राष्ट्रीय जीवन में उतारने की है। जब भारत वैश्विक मंच पर नई भूमिका निभाने के लिए तैयार हो रहा है, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन हमें यह विश्वास दिलाता है कि जो राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है, वही आधुनिकता के शिखर तक पहुँचता है। उनकी 125वीं जयंती पर यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उनके राष्ट्रप्रेम, लोकतांत्रिक मूल्यों, शिक्षा-दृष्टि, आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक चेतना और अखण्ड भारत के संकल्प को अपने राष्ट्रीय चरित्र का अंग बनाएं। यदि हम ऐसा कर सके, तो वर्ष 2047 का विकसित, समृद्ध, आत्मविश्वासी और विश्वगुरु भारत केवल एक सपना नहीं रहेगा, बल्कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की दूरदृष्टि और करोड़ों भारतीयों के सामूहिक पुरुषार्थ से साकार होने वाला ऐतिहासिक यथार्थ बनेगा। उनके विचार आज भी नए भारत की यात्रा के पथप्रदर्शक हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बने रहेंगे।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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