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‘अब बाज़ार से है ज़िंदगी’: बाज़ार की चकाचौंध में मनुष्य और रिश्तों की तलाश

‘पहले ज़िंदगी से बाज़ार था, अब बाज़ार से ज़िंदगी है।’ दयानंद पांडेय की पुस्तक ‘अब बाज़ार से है ज़िंदगी’ का यह कथ्य आज के बदलते सामाजिक जीवन की गहरी पड़ताल करता है। डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित यह लेख-संग्रह केवल लेखों का संकलन नहीं, बल्कि बदलती जीवन-शैली, टूटते पारिवारिक संबंधों, बढ़ते अकेलेपन, सामाजिक सरोकारों, स्त्री, साहित्य, संस्कृति, भाषा और मनुष्य की बदलती संवेदना का जीवंत दस्तावेज है। लेखक अपने अनुभवों और जीवन से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से पाठक को उस समय की तस्वीर दिखाते हैं, जहां सुविधाएं तो बढ़ी हैं, लेकिन आत्मीयता लगातार कम होती जा रही है।

दयानंद पांडेय हिंदी के चर्चित साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं। 30 जनवरी 1958 को गोरखपुर जिले के बैदौली गांव में जन्मे दयानंद पांडेय वर्ष 1978 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने रीडर्स डाइजेस्ट, जनसत्ता, स्वतंत्र भारत, नवभारत टाइम्स तथा राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादक और विशेष संवाददाता सहित विभिन्न पदों पर कार्य किया। उनकी 80 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 13 उपन्यास, 13 कहानी-संग्रह और 5 संस्मरण-संग्रह के अलावा कविता, ग़ज़ल, लेख, इंटरव्यू और सिनेमा से संबंधित पुस्तकें शामिल हैं। उनकी रचनाओं के अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं। उन्हें लोहिया साहित्य सम्मान, साहित्य भूषण, वीर सिंह देव राष्ट्रीय सम्मान, प्रेमचंद सम्मान, यशपाल सम्मान और अमृतलाल नागर सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

दयानंद पांडेय
दयानंद पांडेय

पुस्तक में शामिल लेखों के शीर्षक ही इसके व्यापक वैचारिक संसार का संकेत देते हैं। ‘यहां तो स्त्री कंधे से कंधा मिला कर चलती मिलती है’, ‘जीवन में प्रेम की पवित्रता’, ‘सरोकारनामा मतलब अब सारे सरोकार मेरे, सारा आकाश मेरा!’, ‘हिंसक भीड़ की भाड़ में जल जाने से बचा’, ‘डर गया हूं, लखनऊ के इस नि:शब्द विलाप से’, ‘संन्यासी, बिच्छू और कोरोना’, ‘कहां-कहां से तुलसी को मिटाएंगे?’, ‘मस्जिद में क्यों सोते थे तुलसीदास?’ और ‘2050 तक हिंदी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बनने जा रही है’ जैसे लेख इस संग्रह को सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और समकालीन विमर्श से जोड़ते हैं।

शीर्षक लेख पुस्तक की आत्मा है। लेखक संयुक्त परिवार के अपने अनुभवों को याद करते हुए उस दौर की तस्वीर खींचते हैं, जब परिवार में रिश्तों की पहचान कभी-कभी उलझ जाती थी, लेकिन संकट के समय पूरा परिवार एक साथ खड़ा होता था। बीमारी या विपत्ति किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं होती थी। अनेक कंधे उसे संभाल लेते थे। लेखक संयुक्त परिवार की कमियों से भी इनकार नहीं करते। विशेषकर स्त्रियों के बीच तनाव और जिम्मेदारियों के असमान बंटवारे ने संयुक्त परिवारों में दरारें पैदा कीं। धीरे-धीरे संयुक्त परिवार टूटे और एकल परिवार सामने आए। लेकिन आज एकल परिवार भी अकेलेपन और भावनात्मक दूरी की समस्या से जूझ रहे हैं।

अब बाज़ार से है ज़िंदगी
अब बाज़ार से है ज़िंदगी

लेखक आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना के रूप में उस दूरी को देखते हैं, जो करियर, भौतिक सफलता और तकनीक ने परिवारों के बीच पैदा कर दी है। बच्चे बेहतर शिक्षा और नौकरी के लिए दूसरे शहरों तथा विदेशों में चले जाते हैं और माता-पिता पीछे छूट जाते हैं। कई बार आर्थिक रूप से संपन्न होने के बावजूद वृद्ध माता-पिता भावनात्मक रूप से बेहद अकेले रह जाते हैं। पुस्तक में ऐसे अनेक मार्मिक प्रसंग हैं, जिनमें बुजुर्ग माता-पिता की पीड़ा सामने आती है। कहीं विदेश में रहने वाला बेटा पिता को समय नहीं दे पाता, कहीं बड़े पदों पर पहुंचे बेटे अपनी वृद्ध मां को भूल जाते हैं। ये प्रसंग पाठक को भीतर तक झकझोरते हैं।

तकनीक और सोशल मीडिया के प्रभाव पर भी लेखक की दृष्टि गंभीर है। मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दुनिया को जोड़ दिया है, लेकिन कई बार मनुष्य को उसके आसपास के लोगों से ही दूर कर दिया है। आज खुशियां और दुख सोशल मीडिया पर साझा हो जाते हैं, लेकिन आमने-सामने बैठकर संवाद करने की संस्कृति कमजोर हो रही है। विवाह के निमंत्रण से लेकर संवेदना तक, बहुत कुछ मोबाइल संदेशों तक सीमित हो गया है। लेखक की चिंता यह है कि बाजार और मॉल की भीड़ बढ़ती जा रही है, लेकिन मनुष्य के भीतर की आत्मीयता और संवेदना कम होती जा रही है।

‘यहां तो स्त्री कंधे से कंधा मिला कर चलती मिलती है’ लेख में स्त्री की साहित्यिक और सामाजिक भूमिका पर प्रभावशाली विमर्श मिलता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से जुड़े करुण रस के प्रसंग के माध्यम से लेखक साहित्य में संवेदना के महत्व को रेखांकित करते हैं। कालिदास, प्रेमचंद, शरतचंद्र और अन्य साहित्यकारों के संदर्भों से वह बताते हैं कि स्त्री केवल साहित्य की पात्र नहीं, बल्कि उसकी संवेदनात्मक धुरी रही है। धनिया के बिना गोदान और स्त्री की उपस्थिति के बिना अनेक कालजयी रचनाओं की कल्पना अधूरी है।

इतिहास, संस्कृति और भाषा से जुड़े लेख भी पुस्तक को व्यापक बनाते हैं। तुलसीदास, कबीर, गांधी, अयोध्या, गीता, प्रयागराज और हिंदी भाषा जैसे विषयों पर लेखक अपनी स्पष्ट और बेबाक दृष्टि रखते हैं। हिंदी के भविष्य पर लिखे लेख भाषा की जीवंतता और उसके निरंतर विस्तार की संभावनाओं को रेखांकित करते हैं।

दयानंद पांडेय की भाषा इस पुस्तक की बड़ी ताकत है। उनकी शैली में पत्रकारिता की स्पष्टता, साहित्य की संवेदना और व्यंग्य की धार दिखाई देती है। लोकभाषा, मुहावरों, साहित्यिक संदर्भों और वास्तविक जीवन के प्रसंगों के कारण लेख सीधे पाठक से संवाद करते हैं। कहीं करुणा है, कहीं व्यंग्य, कहीं आक्रोश और कहीं स्मृतियों की आत्मीय गर्माहट।

कुल मिलाकर ‘अब बाज़ार से है ज़िंदगी’ हमारे समय का ऐसा आईना है, जिसमें बाजार की चमक के साथ मनुष्य का अकेलापन भी साफ दिखाई देता है। यह पुस्तक पूछती है कि आधुनिकता और तकनीक के इस दौर में हमने सुविधाएं तो बहुत हासिल कर लीं, लेकिन क्या हमने जीवन को सचमुच बेहतर बनाया? बाजार हमारी जरूरतें पूरी कर सकता है, लेकिन प्रेम, आत्मीयता, करुणा और रिश्तों का विकल्प नहीं बन सकता।

‘अब बाज़ार से है ज़िंदगी’ इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह बाजार के बीच मनुष्य की तलाश करती है और पाठक को अपने भीतर बचे प्रेम, संवेदना और मानवीय रिश्तों की रोशनी पहचानने के लिए प्रेरित करती है।

पुस्तक: अब बाज़ार से है ज़िंदगी

लेखक: दयानंद पांडेय

प्रकाशक: डायमंड पॉकेट बुक्स

उमेश कुमार सिंह
समीक्षक: उमेश कुमार सिंह

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