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नवा खाई : नई फसल, नई आशा और अन्न के प्रति कृतज्ञता का लोकपर्व

18 सितंबर नवा खाई पर विशेष-

      छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी वह परंपरा, जो अन्न को केवल भोजन नहीं, जीवन का आधार मानती है। छत्तीसगढ़ को यदि धान का कटोरा कहा जाता है तो इसके पीछे केवल यहां की कृषि संपन्नता नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही वह लोकसंस्कृति भी है, जिसमें अन्न, किसान, धरती और प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा दिखाई देती है। यहां का जनजीवन ऋतुओं और कृषि चक्र के साथ चलता है। खेत में धान की बालियां लहराती हैं तो किसान के चेहरे पर उम्मीद की चमक दिखाई देती है और जब नई फसल घर आती है तो वह केवल उपज नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार और समाज के लिए आनंद का अवसर बन जाती है। इसी कृषि संस्कृति का अत्यंत आत्मीय लोकपर्व है, नवा खाई। ‘नवा खाई’ अर्थात नया अन्न खाना। नई फसल के घर आने के बाद उसके अन्न को पहले इष्टदेव, देवी-देवताओं और पूर्वजों को अर्पित कर फिर परिवार और समाज द्वारा ग्रहण करने की परंपरा इस पर्व को विशिष्ट बनाती है। यह परंपरा बताती है कि हमारे पूर्वज अन्न को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि ईश्वर का प्रसाद और जीवन का आधार मानते थे।

किसान के लिए नई फसल का आगमन वर्षभर की मेहनत का फल होता है। बीज बोने से लेकर खेत तैयार करने, रोपाई, निराई-गुड़ाई और फसल की देखभाल तक वह प्रकृति के साथ कदम मिलाकर चलता है। बारिश समय पर हो, फसल को पर्याप्त पानी मिले, कीट और रोग से बचाव हो तथा अंततः खेतों में सुनहरी बालियां लहराएं, इन सबके पीछे किसान की मेहनत के साथ प्रकृति की अनुकंपा भी होती है।

नई फसल के अन्न को सबसे पहले देवताओं को अर्पित करने की परंपरा वस्तुतः यह स्वीकार करने का संस्कार है कि अन्न केवल किसान की मेहनत से नहीं, धरती, जल, वायु, सूर्य और प्रकृति के सहयोग से पैदा होता है। नवा खाई की सबसे सुंदर भावना है। पहले अर्पण और फिर ग्रहण। आज की उपभोक्तावादी जीवनशैली में हम अक्सर वस्तुओं को उनका मूल्य चुकाकर प्राप्त अधिकार के रूप में देखते हैं। लेकिन हमारी लोकसंस्कृति हमें सिखाती है कि अन्न के हर दाने के पीछे किसी का श्रम और प्रकृति का योगदान है। इसलिए नया अन्न खाने से पहले उसे अपने आराध्य को अर्पित करना केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि कृतज्ञता का संस्कार है। यह भाव यदि हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाए तो भोजन की बर्बादी भी कम हो सकती है और अन्न के प्रति सम्मान भी बढ़ सकता है।

नवा खाई का सबसे महत्वपूर्ण संदेश किसान के श्रम के सम्मान से जुड़ा है। हमारी थाली में पहुंचने वाला अन्न खेत से बाजार और बाजार से घर तक लंबी यात्रा तय करता है। लेकिन इस पूरी यात्रा की शुरुआत किसान के हाथों से होती है। किसान धूप, बारिश और मौसम की कठिन परिस्थितियों के बीच खेत में मेहनत करता है। उसके परिश्रम से ही समाज का पेट भरता है। इसलिए नवा खाई केवल नई फसल का स्वागत नहीं, बल्कि अन्नदाता के श्रम के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी है।

यदि समाज किसान के श्रम का वास्तविक सम्मान करे, कृषि को सम्मानजनक और लाभकारी व्यवसाय बनाए तथा नई पीढ़ी को खेती से जोड़ने के प्रयास करे, तभी ऐसे लोकपर्वों की भावना सार्थक होगी। नवा खाई का स्वरूप केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। परिवार और समुदाय के लोग एक साथ मिलकर नई फसल का स्वागत करते हैं। घरों में पारंपरिक भोजन तैयार होता है और लोकजीवन में उत्साह का वातावरण दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में सामूहिकता का विशेष महत्व है। यहां त्योहार केवल व्यक्ति के नहीं, पूरे समाज के होते हैं। नवा खाई भी इसी सामुदायिक चेतना को मजबूत करता है। इसमें अपनापन, साझेदारी और एक-दूसरे के सुख में सहभागी बनने की भावना दिखाई देती है।

आज जब मनुष्य प्रकृति से लगातार दूर होता जा रहा है, नवा खाई जैसे पर्व हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देते हैं। नई फसल के पीछे मिट्टी है, मिट्टी के लिए पानी है, पानी के लिए वर्षा और वर्षा के लिए प्रकृति का संतुलन। अर्थात अन्न का एक दाना भी प्रकृति के असंख्य घटकों के सहयोग का परिणाम है। यदि हम खेत चाहते हैं तो उपजाऊ मिट्टी बचानी होगी। यदि खेती चाहते हैं तो जलस्रोत बचाने होंगे। यदि वर्षा चाहते हैं तो जंगल और पर्यावरण की रक्षा करनी होगी। इस दृष्टि से नवा खाई को पर्यावरण चेतना से जोड़ना समय की आवश्यकता है।

आज शहरों में पली-बढ़ी नई पीढ़ी खेत, फसल और कृषि प्रक्रिया से पहले की अपेक्षा कम परिचित है। उसे बाजार में पैक होकर आने वाला खाद्यान्न तो दिखाई देता है, लेकिन उस अन्न के पीछे किसान का संघर्ष और प्रकृति का योगदान दिखाई नहीं देता।नवा खाई जैसे पर्व बच्चों को यह समझाने का अवसर देते हैं कि भोजन की शुरुआत किसी दुकान से नहीं, बल्कि मिट्टी में पड़े एक छोटे से बीज से होती है।

यदि हम बच्चों को खेतों तक ले जाएं, उन्हें फसल की प्रक्रिया समझाएं और नवा खाई जैसे पर्वों का सांस्कृतिक अर्थ बताएं, तो उनमें अन्न और किसान के प्रति सम्मान की भावना विकसित होगी। लोकपर्वों का संरक्षण क्यों जरूरी है? आधुनिकता आवश्यक है और समय के साथ परंपराओं में परिवर्तन भी स्वाभाविक है। लेकिन विकास की दौड़ में अपनी लोकसंस्कृति को भूल जाना समाज को अपनी जड़ों से काट सकता है।

लोकपर्व किसी समाज की सामूहिक स्मृति होते हैं। उनमें हमारे पूर्वजों का जीवन-दर्शन, प्रकृति के साथ उनका संबंध और सामाजिक व्यवस्था की झलक मिलती है। इसलिए नवा खाई को केवल एक स्थानीय परंपरा मानकर उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए। यह छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति और लोकचेतना की अमूल्य धरोहर है।

आज जब एक ओर किसान अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है और दूसरी ओर समाज खाद्य सुरक्षा तथा पर्यावरणीय संकटों से जूझ रहा है, तब नवा खाई का संदेश पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यह हमें चार संकल्प लेने की प्रेरणा दे सकता है – अन्न की बर्बादी नहीं करेंगे। किसान के श्रम का सम्मान करेंगे। जल, जंगल और जमीन की रक्षा करेंगे। स्थानीय कृषि और लोक परंपराओं को प्रोत्साहित करेंगे। यही चार भाव इस लोकपर्व को आधुनिक संदर्भ में भी जीवंत बना सकते हैं।

अन्न का एक दाना अपने भीतर पूरी सभ्यता की कहानी समेटे होता है। उसमें किसान का पसीना है, मिट्टी की उर्वरता है, वर्षा की बूंदें हैं, सूर्य का प्रकाश है और प्रकृति का अनंत सहयोग है। इसलिए नवा खाई का पर्व हमें यह विनम्रता सिखाता है कि हमारी थाली में जो कुछ है, वह केवल हमारा अधिकार नहीं, बल्कि अनेक हाथों और प्रकृति के योगदान का परिणाम है।

 नवा खाई केवल नया अन्न खाने का पर्व नहीं है। यह नई आशा, नई ऊर्जा और कृतज्ञता की संस्कृति का उत्सव है। नई फसल किसान के घर खुशहाली लाए, हर परिवार की थाली अन्न से भरी रहे और कोई व्यक्ति भूखा न सोए यही इस पर्व की सबसे बड़ी कामना होनी चाहिए। आइए, नवा खाई के अवसर पर हम अन्न के प्रत्येक दाने का सम्मान करने, किसान के श्रम को प्रणाम करने और प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लें। क्योंकि जिस समाज को अन्न के एक दाने का मूल्य समझ में आ जाता है, वह न केवल समृद्ध होता है, बल्कि संवेदनशील भी बनता है। यही नवा खाई की आत्मा है।यही छत्तीसगढ़ की माटी का संदेश है। और यही हमारी लोक संस्कृति की सबसे सुंदर पहचान है।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस

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