12 अगस्त हरियाली अमावस्या पर विशेष-
लोकजीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो किसी सरकारी सम्मान, पद अथवा पुरस्कार से नहीं, बल्कि अपनी असाधारण प्रतिभा और जनस्वीकृति से इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। छत्तीसगढ़ के लोकपर्व हरेली के संदर्भ में यदि नारियल फेंक प्रतियोगिता की चर्चा हो और स्वर्गीय ठाकुर अमर सिंह बैस का नाम न आए, तो वह चर्चा अधूरी मानी जाएगी। वे केवल एक प्रतिभागी नहीं थे, बल्कि इस लोककला के ऐसे सिद्धहस्त साधक थे, जिनकी शक्ति, तकनीक और आत्मविश्वास लोकस्मृतियों में आज भी जीवित हैं। हरेली का पर्व छत्तीसगढ़ में कृषि, प्रकृति और लोकजीवन का उत्सव है। इस अवसर पर गेड़ी, लोकगीत, पारंपरिक खेलों और नारियल फेंक प्रतियोगिताओं का विशेष महत्व रहा है। इन प्रतियोगिताओं में केवल शारीरिक बल ही नहीं, बल्कि हाथों की पकड़, शरीर का संतुलन, अभ्यास, एकाग्रता और फेंकने की विशिष्ट कला का भी परीक्षण होता था। इन्हीं प्रतियोगिताओं में स्वर्गीय ठाकुर अमर सिंह बैस ने ऐसी ख्याति अर्जित की कि उनका नाम लोककिंवदंती का हिस्सा बन गया।
उस दौर में हरेली के अवसर पर जब किसी गाँव या क्षेत्र में नारियल फेंक प्रतियोगिता होती और यह समाचार फैलता कि ठाकुर अमर सिंह बैस भी भाग लेने वाले हैं, तो प्रतियोगिता का वातावरण ही बदल जाता था। लोग उत्सुकता से उनके प्रदर्शन की प्रतीक्षा करते थे। बिलासपुर अंचल में यह सामान्य धारणा बन चुकी थी कि यदि ठाकुर अमर सिंह बैस मैदान में उतर गए, तो विजय लगभग निश्चित है। यह विश्वास किसी प्रचार का परिणाम नहीं था, बल्कि वर्षों के लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन से अर्जित प्रतिष्ठा थी।

स्व ठाकुर अमर सिंह बैस के बारे में यह जनश्रुति दूर-दूर तक प्रचलित थी कि नारियल फेंकने की शर्त पर वे कभी पराजित नहीं हुए। जिस प्रतियोगिता या शर्त में उन्होंने भाग लिया, वहाँ उनका कौशल ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया। यह केवल असाधारण शारीरिक शक्ति का परिणाम नहीं था। उनके हाथों की पकड़, शरीर की लय, फेंकने का कोण, गति और वर्षों का अभ्यास। इन सबका ऐसा समन्वय था कि उनके द्वारा फेंका गया नारियल आश्चर्यजनक दूरी तक पहुँचता था। लोग कहा करते थे कि “उनके बाजुओं में केवल ताकत नहीं, कला भी बसती थी।”
स्व ठाकुर अमर सिंह बैस का प्रदर्शन यह सिद्ध करता था कि किसी भी लोककला में सफलता केवल बल से नहीं मिलती। नारियल फेंकने की प्रतियोगिता में शरीर का संतुलन, हाथों की गति, सही समय पर छोड़ा गया प्रहार और मानसिक एकाग्रता। इन सभी का महत्वपूर्ण योगदान होता है। वे इस कला को सहजता से निभाते थे। देखने वालों को यह सब सरल लगता था, किंतु उसके पीछे वर्षों का अभ्यास और अनुशासन छिपा था। इसी कारण उनकी प्रतिभा केवल प्रशंसा का विषय नहीं रही, बल्कि नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा भी बनी।
लोकस्मृतियों में आज भी यह बात बड़े गर्व से कही जाती है कि स्वर्गीय ठाकुर अमर सिंह बैस के विरुद्ध नारियल फेंकने की शर्त लगाने से लोग हिचकिचाते थे। यह हिचक किसी भय की नहीं, बल्कि उनकी सिद्ध प्रतिभा के प्रति सम्मान की थी। लोगों को विश्वास था कि उनके सामने जीतना अत्यंत कठिन है। इसलिए अनेक बार प्रतियोगिता प्रारंभ होने से पहले ही चर्चा होने लगती थी कि “यदि ठाकुर अमर सिंह बैस मैदान में हैं, तो परिणाम क्या होगा।” यह किसी व्यक्ति की लोकप्रियता नहीं, बल्कि उसकी अर्जित विश्वसनीयता का प्रमाण था।
स्व ठाकुर अमर सिंह बैस के लिए नारियल फेंकना केवल प्रतियोगिता नहीं था। यह हरेली की उस लोकपरंपरा का हिस्सा था, जिसमें शक्ति का प्रदर्शन अहंकार के लिए नहीं, बल्कि उत्सव और सामूहिक आनंद के लिए होता था। प्रतियोगिता समाप्त होने के बाद भी उनके व्यवहार में विनम्रता बनी रहती थी। यही कारण था कि लोग उन्हें केवल विजेता के रूप में नहीं, बल्कि एक सच्चे लोकनायक के रूप में सम्मान देते थे।

समय बदल गया। हरेली का स्वरूप भी बदल रहा है। अनेक पारंपरिक प्रतियोगिताएँ अब विरल होती जा रही हैं। किंतु स्वर्गीय ठाकुर अमर सिंह बैस जैसे लोकनायकों की स्मृतियाँ आज भी गाँवों की चौपालों और बुजुर्गों की बातचीत में जीवित हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि लोकप्रतिभाएँ केवल इतिहास की घटनाएँ नहीं होतीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पूँजी होती हैं। उन्हें संरक्षित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
स्व ठाकुर अमर सिंह बैस की नारियल फेंकने की अद्वितीय कला केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी। वह छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा, ग्रामीण खेल संस्कृति और हरेली पर्व की गौरवशाली विरासत का एक उज्ज्वल अध्याय थी। आज आवश्यकता इस बात की है कि हरेली के अवसर पर नारियल फेंक जैसी पारंपरिक प्रतियोगिताओं को पुनर्जीवित किया जाए। साथ ही, उन लोकप्रतिभाओं को भी सम्मानपूर्वक स्मरण किया जाए, जिन्होंने अपनी कला से इन परंपराओं को जीवंत बनाए रखा। स्व ठाकुर अमर सिंह बैस ऐसे ही लोकपुरुष थे, जिनके सशक्त बाजुओं ने केवल नारियल को दूर तक नहीं पहुँचाया, बल्कि अपनी प्रतिभा से लोकपरंपरा की प्रतिष्ठा को भी दूर-दूर तक पहुँचाया। यही उनकी सबसे बड़ी और अमर पहचान है।
बाँहों की शक्ति में बसता था
हरेली का स्वाभिमान,
नारियल संग उड़ता था
उनका अद्भुत आत्मसम्मान।
माटी की महक, लोक की वाणी
जिनसे पाई पहचान,
बाँहों का बल ही नहीं,
था संस्कृति का भी सम्मान।
जब तक हरेली साँस लेगी,
गूंजता रहेगा उनका नाम,
ठाकुर अमर सिंह बैस रहेंगे,
लोकहृदय में सदा अविराम।
आज भी लोककथाएँ उनकी
गौरव-गाथा गुनगुनाती हैं,
ऐसे लोकनायक युगों-युगों तक
जन-मन में अमर कहलाते हैं।।
