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अंगदान की संस्कृति ही मानवता को नई दिशा दे सकती है

विश्व अंगदान दिवस (13 अगस्त 2026) पर विशेषः

मनुष्य जीवनभर अपने लिए बहुत कुछ अर्जित करता है-धन, संपत्ति, प्रतिष्ठा, संबंध और सुविधाएँ। लेकिन जीवन की अंतिम घड़ी में इन सबका महत्व समाप्त हो जाता है। तब यदि हमारे शरीर का कोई अंग किसी दूसरे मनुष्य की धड़कन बन जाए, हमारी आँखें किसी अंधेरे जीवन में रोशनी भर दें, हमारा यकृत या गुर्दा किसी परिवार के बुझते चिराग को फिर से जला दे, तो इससे बड़ी जीवन-सार्थकता और क्या हो सकती है? अंगदान मृत्यु के बाद भी जीवन को जारी रखने की वह मानवीय संभावना है, जो मनुष्य को केवल अपने लिए जीने वाले प्राणी से उठाकर मानवता के लिए जीने वाला बना देती है। विश्व अंगदान दिवस हमें इसी महान विचार से जोड़ता है। आज आवश्यकता केवल अंगदान के बारे में जानकारी देने की नहीं, बल्कि हमारी सोच बदलने की है। हमें यह प्रश्न अपने आप से पूछना होगा कि जिस शरीर को मृत्यु के बाद पंचतत्व में विलीन होना है, उसके उपयोगी अंग यदि किसी दूसरे व्यक्ति को जीवन दे सकते हैं तो उन्हें अपने साथ मिट्टी में मिला देना अधिक सार्थक है या किसी की सांसों का हिस्सा बना देना? मृत्यु निश्चित है, लेकिन मृत्यु के बाद भी किसी के जीवन का कारण बनना हमारे हाथ में है।

भारत की सांस्कृतिक स्मृति में शरीर और जीवन के महान त्याग की परंपरा बहुत पुरानी है। महर्षि दधीचि की कथा इसका सबसे प्रभावशाली उदाहरण है। पौराणिक परंपरा के अनुसार जब देवताओं को असुरों से संघर्ष के लिए ऐसे अस्त्र की आवश्यकता हुई जिसे दधीचि की अस्थियों से बनाया जा सके, तब महर्षि दधीचि ने लोककल्याण के लिए अपना शरीर ही त्याग दिया। उनकी अस्थियों से वज्र बनाया गया और उससे जनकल्याण की रक्षा हुई। यह कथा आधुनिक अर्थों में अंगदान की चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं है, लेकिन अपने शरीर को भी समाज और सृष्टि के कल्याण के लिए समर्पित कर देने की भारतीय त्याग-चेतना का अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक अवश्य है। भारत के राष्ट्रपति सचिवालय ने भी अंग एवं देहदान की भारतीय परंपरा को समझाते हुए महर्षि दधीचि के इस प्रसंग का उल्लेख किया है। हमारी परंपरा में राजा शिवि की कथा भी त्याग और जीव-दया की अद्भुत मिसाल है। एक कबूतर की रक्षा के लिए उन्होंने अपने शरीर का मांस तक देने की तत्परता दिखाई।

चाहे ये प्रसंग धार्मिक आख्यान हों, लेकिन इनके भीतर छिपा संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है-अपने जीवन और शरीर को केवल अपनी निजी संपत्ति न समझना, बल्कि उसे व्यापक जीवन के कल्याण से जोड़ना। जैन दर्शन का सूत्र “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” भी यही बताता है कि जीव एक-दूसरे के उपकार के लिए हैं। अंगदान इस विचार का आधुनिक वैज्ञानिक रूप कहा जा सकता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने इस मानवीय भावना को वास्तविक जीवन बचाने की शक्ति प्रदान कर दी है। वर्ष 1954 में दुनिया का पहला सफल मानव किडनी प्रत्यारोपण हुआ। रोनाल्ड ली हेरिक ने अपनी एक किडनी अपने जुड़वां भाई रिचर्ड को दान की थी। यह घटना चिकित्सा इतिहास में एक ऐसी क्रांति की शुरुआत बनी, जिसने आगे चलकर अंग प्रत्यारोपण को लाखों लोगों के लिए जीवन की आशा बना दिया। इसके बाद 1967 में मानव हृदय प्रत्यारोपण की सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि चिकित्सा विज्ञान मनुष्य की मृत्यु और जीवन के बीच खड़ी कई दीवारों को तोड़ सकता है। भारत ने भी इस क्षेत्र में उल्लेखनीय यात्रा की है। देश में पहला सफल किडनी प्रत्यारोपण 1 दिसंबर 1971 को चेन्नई के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर में हुआ था। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन भारत में हजारों लोगों के लिए अंग प्रत्यारोपण जीवन का नया द्वार बनेगा। आज चिकित्सा तकनीक इतनी आगे बढ़ चुकी है कि किडनी, लिवर, हृदय, फेफड़े, अग्न्याशय और आंत जैसे अंगों के साथ कॉर्निया, त्वचा, हड्डी और हृदय वाल्व जैसे ऊतकों का भी प्रत्यारोपण संभव है।

लेकिन विज्ञान की क्षमता जितनी बढ़ी है, हमारी सामाजिक चेतना उस गति से नहीं बढ़ पाई। यही सबसे बड़ी चुनौती है। भारत में आज भी प्रत्यारोपण की आवश्यकता और उपलब्ध अंगों के बीच बड़ा अंतर है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2024 में देश में अंग प्रत्यारोपण की गतिविधि व्यापक रही, लेकिन मृतक दाताओं की संख्या अभी भी आवश्यकता की तुलना में बहुत कम है। इसका अर्थ साफ है-हमारे अस्पतालों में तकनीक है, डॉक्टर हैं, सर्जरी की क्षमता है, लेकिन जीवन बचाने के लिए पर्याप्त अंग नहीं हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए हमें अंगदान को मृत्यु की चर्चा नहीं, जीवन की चर्चा बनाना होगा। परिवारों में इस विषय पर समय रहते बातचीत होनी चाहिए। स्कूलों, विश्वविद्यालयों, धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और मीडिया को मिलकर ऐसी वातावरण-निर्मिति करनी होगी जिसमें अंगदान सुनते ही भय नहीं, बल्कि करुणा और जीवन बचाने का भाव पैदा हो।
आज भी अनेक लोग सोचते हैं कि मृत्यु के बाद शरीर को क्षति पहुँचाना धर्म के विरुद्ध है। कुछ लोगों को अगले जन्म की चिंता होती है, कुछ को शरीर के साथ होने वाली चिकित्सा प्रक्रिया का भय होता है और कुछ परिवार अंतिम समय में मानसिक रूप से इतने टूट जाते हैं कि अंगदान का निर्णय नहीं ले पाते। इन भ्रमों का समाधान टकराव से नहीं, संवाद, संवेदना और वैज्ञानिक जानकारी से होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझनी होगी कि अंगदान किसी पर थोपा जाने वाला धार्मिक या सामाजिक कर्तव्य नहीं है। यह एक स्वैच्छिक, नैतिक और मानवीय निर्णय है, जिसे व्यक्ति को विश्वसनीय चिकित्सा एवं कानूनी जानकारी के आधार पर लेना चाहिए। लेकिन यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से यह संकल्प करता है कि मृत्यु के बाद उसके उपयोगी अंग किसी जरूरतमंद को मिलें, तो वह अपने जीवन की अंतिम घड़ी को भी मानवता के उत्सव में बदल सकता है।
भारत में अंगदान की प्रेरक घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। हाल ही में नागपुर में 52 वर्षीय शिक्षक कोंडबा दत्तात्रेय मडावी मृतक अंगदान करने वाले 200वें दाता बने, उनके अंगों से तीन लोगों को नया जीवन मिला। ऐसी घटनाएँ हमें बताती हैं कि अंगदान कोई दूर की आदर्शवादी कल्पना नहीं, बल्कि हमारे आसपास घटने वाली वास्तविक जीवन-बचाने वाली प्रक्रिया है। दिल्ली में 70 वर्षीय मृत महिला के गुर्दों का सफल उपयोग कर एक 56 वर्षीय महिला को जीवन की नई उम्मीद मिली-यह घटना यह भी बताती है कि केवल उम्र के आधार पर किसी संभावित दाता के अंगों को अनुपयोगी मान लेना उचित नहीं है, अंतिम निर्णय चिकित्सा स्थिति पर निर्भर करता है। भारत के कुछ राज्यों ने इस दिशा में उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। तेलंगाना में 2024 में मृतक अंगदान की दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक रही और उसके ‘जीवदान’ कार्यक्रम के माध्यम से हजारों प्रत्यारोपण संभव हुए। तमिलनाडु में भी मृतक अंगदान की व्यवस्था ने अनेक परिवारों को प्रेरित किया हैय 2026 में एक परिवार ने भाषा की बाधा के बावजूद डिजिटल अनुवाद की मदद से अपने प्रियजन के अंगदान का निर्णय लिया और अनेक मरीजों को जीवन मिला। ये घटनाएँ बताती हैं कि जहाँ संवेदना, व्यवस्था और जागरूकता मिलती हैं, वहाँ मृत्यु भी कई जीवनों को बचाने का माध्यम बन सकती है।
अंगदान की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यह रक्तदान से भी आगे की परोपकार-चेतना है। रक्तदान में हम अपने शरीर की ऐसी चीज देते हैं जिसे शरीर फिर बना लेता है, अंगदान में हम मृत्यु के बाद ऐसी अमूल्य संपदा देते हैं जिसका उपयोग किसी दूसरे शरीर को जीवन देने के लिए हो सकता है। इसलिए अंगदान को केवल चिकित्सा की भाषा में नहीं, मानवीय रिश्तों और करुणा की भाषा में समझना होगा। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि किसी एक दाता का निर्णय कई लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अंगदान केवल एक व्यक्ति की मदद नहीं, बल्कि कई परिवारों में आशा का संचार है। किसी की आँखों में रोशनी, किसी की छाती में धड़कता हृदय, किसी की सांसों में फेफड़ों की शक्ति और किसी के शरीर में काम करता हुआ नया अंग-यह सब किसी अनजान व्यक्ति की उदारता का परिणाम हो सकता है।
इसलिए अंगदान को मृत्यु के बाद शरीर का अंत मानने वाली सोच से बाहर निकालकर “मृत्यु के बाद भी जीवन देने” की अवधारणा से जोड़ना होगा। मृत्यु अंधेरा है, लेकिन अंगदान उस अंधेरे में जलाया गया दीपक है। एक दीपक स्वयं जलता है, लेकिन उसका प्रकाश दूसरों को दिखाई देता है। इसी तरह दाता संसार से चला जाता है, लेकिन उसके अंग किसी और की सांस, धड़कन या दृष्टि बनकर जीवन को रोशन करते रहते हैं। हमारी सबसे बड़ी संपत्ति वह नहीं जो बैंक में जमा है, न वह जो तिजोरी में बंद है और न वह जो हमारे नाम पर दर्ज है। हमारी सबसे बड़ी संपत्ति वह है जिसका उपयोग हमारे बाद भी किसी जीवन को बचाने में हो सके।
इस विश्व अंगदान दिवस पर हमें केवल यह संकल्प नहीं लेना चाहिए कि “अंगदान करेंगे”, बल्कि इससे एक कदम आगे बढ़कर यह संकल्प लेना चाहिए कि अंगदान के बारे में अपने परिवार से बात करेंगे, भ्रम दूर करेंगे और समाज में जीवन बचाने वाली इस चेतना को फैलाएँगे। क्योंकि जीवन का अंतिम अध्याय मृत्यु नहीं होना चाहिए। वह किसी दूसरे के जीवन की नई शुरुआत भी बन सकता है। आइए अपने जीवन की अंतिम विरासत मानवता के नाम करें। अंगदान का दीप जलाएँ, ताकि किसी की बुझती जिंदगी में उजाला हो। अपनी मृत्यु को किसी दूसरे की जिंदगी का कारण बनाएँ-क्योंकि इससे सुंदर मृत्यु और इससे सार्थक जीवन शायद ही कोई हो।
“शरीर चला जाए, पर उसकी करुणा जीवित रहे।
सांसें रुक जाएं, पर किसी और की सांसें चलती रहें।
यही अंगदान है, यही मानवता का महादान है।”

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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