भारत में खेलों को केवल प्रतियोगिता, मनोरंजन या पदक जीतने की गतिविधि के रूप में देखने की सोच तेजी से बदल रही है। खेल अब राष्ट्र निर्माण, युवा शक्ति, अनुशासन, नेतृत्व, स्वास्थ्य और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा से जुड़ा व्यापक विषय बन चुके हैं। इसी बदलती सोच को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार, 27 अगस्त 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से ‘खेलो इंडिया संवाद’ में देशभर के युवाओं और खिलाड़ियों को संबोधित किया।

राष्ट्रीय खेल दिवस 2026 के कार्यक्रमों के तहत आयोजित इस संवाद में देश के 5,000 से अधिक संस्थानों से जुड़े युवा, खिलाड़ी और खेलों से संबंधित प्रतिभागी शामिल हुए। प्रधानमंत्री का संबोधन ऐसे समय हुआ है जब भारत अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर अपनी उपस्थिति को व्यापक बनाने और 2036 के ओलंपिक खेलों को लेकर दीर्घकालिक तैयारियों को गति देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
राष्ट्रीय खेल दिवस प्रत्येक वर्ष 29 अगस्त को महान भारतीय हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। यह दिन भारतीय खेलों में उनके योगदान को स्मरण करने के साथ-साथ देश के युवाओं को खेलों के प्रति प्रेरित करने का अवसर भी प्रदान करता है।
खेल केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संबोधन में खेलों के व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि खेलों को केवल पदकों की संख्या के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार खेल भारत की खेल शक्ति और युवाशक्ति को एक साथ जोड़कर विकसित भारत के निर्माण का माध्यम हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा, “जब मैं खेलों की बात करता हूं, तो इसका मतलब सिर्फ पदक जीतना नहीं है; यह भारत की खेलशक्ति और युवाशक्ति को एक साथ जोड़कर एक विकसित भारत का निर्माण करने का अभियान है।”
उनका यह दृष्टिकोण भारतीय खेल नीति के उस व्यापक परिवर्तन को दर्शाता है जिसमें खेलों को युवाओं के व्यक्तित्व विकास और राष्ट्र की दीर्घकालिक क्षमता निर्माण के साथ जोड़ा जा रहा है। प्रधानमंत्री ने अपने चर्चित वाक्य “जो खेलेंगे, वे खिलेंगे” के माध्यम से खेलों को स्वस्थ और सक्रिय जीवनशैली का आधार बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
खेलों में भागीदारी बढ़ने का सीधा संबंध युवाओं के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक दृढ़ता और सामाजिक सहभागिता से है। प्रतिस्पर्धी खेल युवाओं में लक्ष्य निर्धारित करने, असफलता से सीखने, निरंतर अभ्यास करने और दबाव के बीच बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता विकसित करते हैं। यही गुण आगे चलकर राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक विकास में भी योगदान दे सकते हैं।
भारत को अधिक से अधिक खेल विधाओं में मजबूत बनाने की आवश्यकता
प्रधानमंत्री ने भारत की खेल रणनीति के एक महत्वपूर्ण पक्ष की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देश ऐसे खेलों में पदक जीत रहे हैं जिनमें भारत की भागीदारी अभी सीमित है। इसलिए केवल उन खेलों तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है जिनमें भारत की पारंपरिक मजबूत उपस्थिति रही है।
प्रधानमंत्री ने आह्वान किया कि भारत को अधिक से अधिक खेल विधाओं में अपनी क्षमता विकसित करनी होगी। उन्होंने कहा कि पदकों की संख्या बढ़ाने के लिए उन खेलों में भी महारत हासिल करना आवश्यक है जिनमें देश की वर्तमान भागीदारी अपेक्षाकृत कम है।
यह दृष्टिकोण भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में सफलता केवल कुछ चुनिंदा खेलों पर निर्भर रहने से व्यापक नहीं हो सकती। यदि भारत को वैश्विक खेल शक्ति के रूप में स्थापित होना है तो एथलेटिक्स, तैराकी, जिम्नास्टिक, साइकिलिंग, तलवारबाजी, निशानेबाजी, तीरंदाजी, कुश्ती, भारोत्तोलन, बैडमिंटन, टेबल टेनिस सहित विभिन्न खेलों में प्रतिभाओं की पहचान और उनका वैज्ञानिक प्रशिक्षण आवश्यक होगा।
इसके लिए जमीनी स्तर से प्रतिभा खोज, प्रशिक्षकों की गुणवत्ता, खेल विज्ञान, पोषण, खेल चिकित्सा, आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का अनुभव—इन सभी क्षेत्रों को एक साथ मजबूत करना होगा।
2036 ओलंपिक को लेकर दीर्घकालिक तैयारी
प्रधानमंत्री के संबोधन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष 2036 के ओलंपिक को लेकर भारत की दीर्घकालिक रणनीति रही। उन्होंने ऐसी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया जिसमें बड़ी संख्या में भारतीय खिलाड़ी ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर सकें और विभिन्न खेल विधाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने की क्षमता हासिल कर सकें।
2036 का लक्ष्य केवल एक आयोजन तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भारत की खेल व्यवस्था को लंबे समय तक मजबूत करने की आवश्यकता है। ओलंपिक स्तर के प्रदर्शन के लिए किसी खिलाड़ी को तैयार करने की प्रक्रिया वर्षों में विकसित होती है। प्रतिभा की पहचान बचपन में होने के बाद उसके प्रशिक्षण, प्रतियोगिता अनुभव, शारीरिक विकास, मानसिक तैयारी और उच्चस्तरीय कोचिंग की निरंतर व्यवस्था जरूरी होती है।
इसी कारण 2036 के लक्ष्य को एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय खेल परियोजना के रूप में देखा जा सकता है। इसका प्रभाव केवल ओलंपिक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के स्कूलों, खेल अकादमियों, विश्वविद्यालयों और स्थानीय खेल ढांचे तक पहुंच सकता है।
5 से 15 वर्ष के बच्चों पर विशेष ध्यान
प्रधानमंत्री ने युवा प्रतिभाओं की पहचान के लिए 5 से 15 वर्ष की आयु के बच्चों को लक्षित करते हुए एक बड़े राष्ट्रीय प्रतिभा खोज अभियान की जानकारी दी। यह पहल भारतीय खेलों के भविष्य के लिए विशेष महत्व रखती है।
खेल प्रतिभा अक्सर कम उम्र में दिखाई देने लगती है, लेकिन प्रतिभा और अंतरराष्ट्रीय स्तर की उपलब्धि के बीच लंबी तैयारी की प्रक्रिया होती है। यदि बच्चों की क्षमता की पहचान समय रहते हो जाए और उन्हें उपयुक्त खेल, प्रशिक्षण तथा सुविधाएं उपलब्ध हों तो देश के पास भविष्य के लिए मजबूत खिलाड़ी तैयार करने का बेहतर अवसर होता है।
प्रधानमंत्री ने इस अभियान में आवश्यक सरकारी सहयोग का भरोसा दिलाते हुए कहा कि सरकार इस प्रयास में सभी संबंधित पक्षों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेगी।
राष्ट्रीय प्रतिभा खोज अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसकी पहुंच महानगरों और स्थापित खेल केंद्रों तक सीमित न रहे। छोटे शहरों, कस्बों, ग्रामीण क्षेत्रों और ऐसे परिवारों के बच्चों तक भी अवसर पहुंचाना आवश्यक होगा, जहां आर्थिक या संसाधनों की सीमाओं के कारण प्रतिभा आगे नहीं बढ़ पाती।
खेल और सामाजिक समान अवसर
भारतीय खेल व्यवस्था के विकास का एक महत्वपूर्ण पहलू समान अवसर भी है। प्रतिभा किसी विशेष शहर, परिवार या आर्थिक वर्ग तक सीमित नहीं होती। अनेक बार अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी ऐसे क्षेत्रों से सामने आते हैं जहां खेल सुविधाएं सीमित रही हैं।
इसलिए राष्ट्रीय स्तर की प्रतिभा खोज का उद्देश्य केवल संभावित पदक विजेताओं की पहचान करना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी खेल व्यवस्था बनाना भी होना चाहिए जिसमें आर्थिक स्थिति, भौगोलिक क्षेत्र या सामाजिक परिस्थितियां किसी प्रतिभाशाली बच्चे के रास्ते में बाधा न बनें।
यहां स्कूलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि विद्यालयों में नियमित खेल गतिविधियां, प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा शिक्षक, बुनियादी खेल सुविधाएं और स्थानीय प्रतियोगिताओं की व्यवस्था मजबूत होती है तो प्रतिभा पहचान की प्रक्रिया अधिक व्यापक हो सकती है।
मनसुख मांडविया ने बताया खेलों को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने का प्रयास
केंद्रीय युवा कार्यक्रम और खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने आईआईटी गांधीनगर से प्रधानमंत्री का वर्चुअल माध्यम से स्वागत किया। उन्होंने कहा कि देश ने पहली बार खेलों को केवल एक गतिविधि के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
डॉ. मांडविया ने प्रधानमंत्री के खिलाड़ियों के साथ व्यक्तिगत जुड़ाव को उनकी खेल संबंधी सोच की महत्वपूर्ण ताकत बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने खिलाड़ियों की जीत का उत्सव मनाने के साथ-साथ कठिन समय में भी उनका समर्थन किया है।
खेल मंत्री ने मायभारत प्लेटफॉर्म की पहुंच का उल्लेख करते हुए बताया कि देशभर में 2.4 करोड़ से अधिक युवा इससे जुड़ चुके हैं। यह संख्या युवाओं की भागीदारी और उन्हें राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों से जोड़ने की दिशा में डिजिटल मंचों की बढ़ती भूमिका को भी दर्शाती है।
युवा-केंद्रित नीति और खेल प्रशासन में सुधार
डॉ. मांडविया ने युवा-केंद्रित नीति निर्माण की चर्चा करते हुए कहा कि युवाओं के विचारों को नीति प्रक्रिया में महत्व दिया जा रहा है। उनका कहना था कि युवा आज यह महसूस कर रहे हैं कि उनके विचारों को केवल सुना नहीं जा रहा, बल्कि उन्हें लागू करने का प्रयास भी किया जा रहा है।
खेल प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही का विषय भी कार्यक्रम में सामने आया। खेल मंत्री ने राष्ट्रीय खेल प्रशासन अधिनियम के माध्यम से पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्ष अवसर को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया।
किसी भी खेल व्यवस्था की सफलता केवल मैदान पर मौजूद खिलाड़ियों की क्षमता से तय नहीं होती। उसके पीछे प्रशासनिक ढांचा, चयन प्रक्रिया, संघों का संचालन, प्रशिक्षकों की व्यवस्था, वित्तीय प्रबंधन और खिलाड़ियों को उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं।
यदि खेल प्रशासन पारदर्शी और जवाबदेह हो तो खिलाड़ियों को अपने प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अधिक अनुकूल वातावरण मिल सकता है।
गगन नारंग ने साझा किया अंतरराष्ट्रीय सफलता का अनुभव
प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद ओलंपिक पदक विजेता गगन नारंग ने आईआईटी गांधीनगर में उपस्थित युवाओं के साथ अपनी खेल यात्रा साझा की। उन्होंने खेलों में हुए प्रशासनिक बदलावों और खिलाड़ियों को मिल रही बेहतर सुविधाओं का उल्लेख किया।
नारंग ने कहा कि वर्तमान समय में खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए बेहतर उपकरण उपलब्ध हो रहे हैं और इन बदलावों ने भारतीय खिलाड़ियों की तैयारी को मजबूत किया है।
एक ओलंपिक पदक विजेता के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि उच्चस्तरीय खेल प्रदर्शन केवल खिलाड़ी की व्यक्तिगत मेहनत का परिणाम नहीं होता। इसके पीछे प्रशिक्षण व्यवस्था, तकनीकी उपकरण, कोचिंग, प्रतिस्पर्धी अवसर और संस्थागत समर्थन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
भारत के लिए चुनौती अब इस व्यवस्था को कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों तक सीमित न रखकर व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराने की है।
शीतल देवी की कहानी ने बदली सोच को सामने रखा
कार्यक्रम में 2024 पैरालंपिक कांस्य पदक विजेता शीतल देवी ने भी युवाओं के साथ अपनी प्रेरणादायक यात्रा साझा की। उन्होंने कहा कि पैरा-एथलीटों को लेकर समाज की सोच में बड़ा बदलाव आया है।
उन्होंने बताया कि जो लोग पहले यह सवाल करते थे कि पैरा-एथलीट क्या हासिल कर सकते हैं, वही अब यह विश्वास व्यक्त करते हैं कि वे उपलब्धियां हासिल करेंगे और देश के लिए पदक जीतेंगे।
शीतल देवी की बात केवल पैरा-स्पोर्ट्स की उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। यह खेलों के माध्यम से सामाजिक दृष्टिकोण में आए परिवर्तन को भी रेखांकित करती है। दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए अवसर, प्रशिक्षण और प्रतियोगिता के बेहतर साधन उपलब्ध होने से खेल क्षेत्र में समावेशन की दिशा मजबूत होती है।
पैरा-स्पोर्ट्स में भारत की बढ़ती उपलब्धियां यह संदेश देती हैं कि उपयुक्त प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर शारीरिक चुनौतियां प्रतिभा और उपलब्धि के रास्ते में अंतिम बाधा नहीं होतीं।
खेल, युवा नेतृत्व और विकसित भारत का संबंध
आईआईटी गांधीनगर के छात्रों ने कार्यक्रम में पांच प्रमुख विषयों—खेल, ओलंपिक आकांक्षाएं, युवा नेतृत्व, विकसित भारत और नशा मुक्त युवा—पर आधारित प्रस्तुति भी दी।
इन पांच विषयों को एक साथ देखने पर खेलों की भूमिका का व्यापक स्वरूप सामने आता है। खेल केवल प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि नेतृत्व और जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का माध्यम भी हैं। एक खिलाड़ी को लक्ष्य तय करना, टीम के साथ काम करना, नियमों का पालन करना और हार के बाद दोबारा प्रयास करना सीखना पड़ता है।
यही गुण युवा नेतृत्व के निर्माण में भी उपयोगी हैं। किसी विकसित राष्ट्र को केवल आर्थिक विकास की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उसे स्वस्थ, अनुशासित, आत्मविश्वासी और जिम्मेदार युवा पीढ़ी की भी आवश्यकता होती है।
इस संदर्भ में खेलों को नशा मुक्त और स्वस्थ जीवनशैली से जोड़ना भी महत्वपूर्ण है। युवाओं के लिए खेल मैदान वैकल्पिक सकारात्मक ऊर्जा का माध्यम बन सकते हैं। नियमित शारीरिक गतिविधि, प्रतिस्पर्धात्मक भावना और टीम आधारित सहभागिता युवाओं को रचनात्मक दिशा प्रदान कर सकती है।
स्कूल से ओलंपिक तक की यात्रा को व्यवस्थित करने की चुनौती
भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि प्रतिभा खोज से लेकर ओलंपिक पोडियम तक की पूरी यात्रा को व्यवस्थित कैसे बनाया जाए।
किसी बच्चे में खेल प्रतिभा की पहचान होना पहला चरण है। इसके बाद उसे सही खेल विधा चुनने में सहायता, प्रशिक्षित कोच, नियमित प्रतियोगिताएं, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, पोषण, चोट प्रबंधन, मानसिक प्रशिक्षण और उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय अनुभव की आवश्यकता होती है।
यदि इन चरणों के बीच कहीं भी व्यवस्था कमजोर पड़ती है तो प्रतिभा के उच्चस्तर तक पहुंचने की संभावना कम हो जाती है। इसलिए 5 से 15 वर्ष के बच्चों के लिए प्रस्तावित प्रतिभा खोज अभियान को केवल चयन प्रक्रिया न बनाकर एक दीर्घकालिक खिलाड़ी विकास कार्यक्रम के रूप में विकसित करना अधिक प्रभावी होगा।
देश में खेल विज्ञान और डेटा आधारित प्रदर्शन विश्लेषण की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है। आधुनिक खेलों में खिलाड़ी की गति, सहनशक्ति, तकनीक, रिकवरी और मानसिक तैयारी का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाता है। भारत को भी अपने खेल विकास मॉडल में इन क्षेत्रों को अधिक व्यापक रूप से शामिल करना होगा।
2036 का लक्ष्य वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी
2036 का ओलंपिक लक्ष्य आज के बच्चों और युवाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ है। जिन बच्चों की प्रतिभा आज पहचानी जाएगी, उनमें से अनेक अगले दशक में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
इसलिए 2036 की तैयारी का अर्थ केवल भविष्य के ओलंपिक दल की तैयारी नहीं है। इसका अर्थ वर्तमान में स्कूल खेलों को मजबूत करना, प्रशिक्षकों का विकास करना, खेल बुनियादी ढांचे का विस्तार करना और खेलों को युवाओं की सामान्य जीवनशैली का हिस्सा बनाना भी है।
यदि भारत खेलों में व्यापक आधार तैयार करता है तो इसका लाभ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के अलावा समाज के स्वास्थ्य और युवा विकास पर भी दिखाई देगा।
भारत की खेल शक्ति को जन आंदोलन बनाने की जरूरत
प्रधानमंत्री द्वारा खेलों को युवाशक्ति के साथ जोड़ने की बात इस व्यापक विचार को सामने लाती है कि खेल केवल पेशेवर खिलाड़ियों का क्षेत्र नहीं है। एक मजबूत खेल संस्कृति तभी विकसित हो सकती है जब आम परिवार, स्कूल, विश्वविद्यालय, स्थानीय संस्थाएं और समुदाय खेलों में सक्रिय भूमिका निभाएं।
हर बच्चे का ओलंपियन बनना जरूरी नहीं है, लेकिन हर बच्चे को खेल का अवसर मिलना महत्वपूर्ण है। इसी आधार से भविष्य के खिलाड़ी भी निकलेंगे और एक स्वस्थ पीढ़ी भी तैयार होगी।
भारत में क्रिकेट सहित कुछ खेलों की लोकप्रियता अत्यधिक है, लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा अन्य खेल विधाओं में महारत हासिल करने पर दिया गया जोर इस बात की ओर संकेत करता है कि देश को अपनी खेल संस्कृति को अधिक विविध बनाना होगा।
नशा मुक्त युवा और खेल संस्कृति
युवा शक्ति को सकारात्मक दिशा देने में खेलों की भूमिका विशेष महत्व रखती है। नशे जैसी सामाजिक चुनौतियों के बीच खेल युवाओं को अनुशासन, लक्ष्य और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से जोड़ सकते हैं।
हालांकि केवल खेल गतिविधियां नशे की समस्या का समाधान नहीं हैं। इसके लिए परिवार, विद्यालय, समुदाय, प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं की संयुक्त भूमिका आवश्यक है। लेकिन खेल युवाओं को ऐसी गतिविधियों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हो सकते हैं जिनमें मेहनत, समय प्रबंधन और उपलब्धि की भावना विकसित होती है।