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निफ्ट के 18 परिसरों के संयुक्त दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संदेश: वैश्विक सोच, भारतीय जड़ों और संधारणीय फैशन का संकल्प

भारत का वस्त्र और परिधान क्षेत्र केवल आर्थिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं है, बल्कि यह देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। सदियों से भारत के बुनकरों, हस्तशिल्पियों और पारंपरिक कारीगरों ने अपनी कला, कौशल और रचनात्मकता के माध्यम से देश की विशिष्ट पहचान को विश्व के सामने प्रस्तुत किया है। बदलती तकनीक, वैश्विक बाजार और फैशन उद्योग की नई आवश्यकताओं के बीच इस विरासत को आधुनिक अवसरों से जोड़ना आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है।

राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र की इसी व्यापक भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि यह क्षेत्र केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत का अंग नहीं है, बल्कि करोड़ों देशवासियों की आजीविका का आधार भी रहा है। उनके विचारों में परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनका संदेश यह है कि यदि पारंपरिक कारीगरों को समय के अनुरूप सहयोग, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाए, तो न केवल वर्तमान पीढ़ी के कौशल को संरक्षित किया जा सकता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी आत्मविश्वास और गौरव के साथ इस व्यवसाय से जुड़ी रह सकती हैं।

यह दृष्टिकोण विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज वैश्विक फैशन उद्योग तेजी से बदल रहा है। डिजाइन, तकनीक, उत्पादन प्रणाली, उपभोक्ता व्यवहार और बाजार की प्राथमिकताओं में लगातार परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे समय में भारत के पारंपरिक वस्त्रों और हस्तशिल्प को केवल विरासत के रूप में संरक्षित करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें आधुनिक डिजाइन, नई तकनीकों, बेहतर गुणवत्ता, ब्रांडिंग और वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना भी जरूरी है।

क्राफ्ट क्लस्टर पहल से पारंपरिक कौशल को आधुनिक बाजार से जोड़ने की कोशिश

राष्ट्रपति ने विभिन्न निफ्ट केंद्रों द्वारा ‘क्राफ्ट क्लस्टर पहल’ जैसे कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर प्रसन्नता व्यक्त की। इस प्रकार की पहल का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि इनके माध्यम से स्थानीय स्तर पर कार्य कर रहे बुनकरों और कारीगरों को वस्त्र एवं परिधान उद्योग में विकसित हो रही आधुनिक तकनीकों से परिचित कराने के साथ-साथ उन्हें बाजारों से जोड़ने का अवसर मिलता है।

भारत के अनेक हिस्सों में आज भी बड़ी संख्या में कारीगर पारंपरिक तकनीकों और पीढ़ियों से चले आ रहे कौशल के आधार पर काम करते हैं। उनके पास उत्कृष्ट हस्तकौशल और स्थानीय सामग्री की गहरी समझ होती है, लेकिन डिजाइन के बदलते रुझानों, आधुनिक उत्पादन प्रक्रियाओं, डिजिटल बाजार, ब्रांड निर्माण और उपभोक्ता मांग की जानकारी सीमित हो सकती है। ऐसे में शैक्षणिक संस्थानों और पारंपरिक कारीगर समुदायों के बीच सहयोग एक प्रभावी सेतु का काम कर सकता है।

निफ्ट जैसे संस्थानों की भूमिका इसी संदर्भ में व्यापक हो जाती है। फैशन शिक्षा को केवल डिजाइन तैयार करने तक सीमित रखने के बजाय यदि उसे स्थानीय कारीगरों, क्षेत्रीय शिल्प, पारंपरिक वस्त्र और आधुनिक बाजार व्यवस्था से जोड़ा जाए, तो इससे एक ऐसी उत्पादन और डिजाइन प्रणाली विकसित की जा सकती है जिसमें आर्थिक अवसरों के साथ सांस्कृतिक संरक्षण भी सुनिश्चित हो।

क्राफ्ट क्लस्टर आधारित पहलें स्थानीय कारीगरों के कौशल को नए डिजाइन विचारों और तकनीकी ज्ञान से जोड़ने में मदद कर सकती हैं। इससे पारंपरिक उत्पादों में आधुनिक उपयोगिता विकसित की जा सकती है और उन्हें नए उपभोक्ता वर्ग तक पहुंचाया जा सकता है। इसका सीधा लाभ कारीगरों की आय, उनके व्यवसाय की स्थिरता और पारंपरिक ज्ञान की निरंतरता पर पड़ सकता है।

वैश्विक सोच के साथ भारतीय जड़ों से जुड़ने का संदेश

राष्ट्रपति ने विद्यार्थियों से कहा कि भारत आज पहले की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ विश्व पटल पर अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है। फैशन टेक्नोलॉजी ऐसा क्षेत्र है जिसमें वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को और मजबूत करने की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।

फैशन अब केवल कपड़ों और परिधानों की डिजाइनिंग तक सीमित क्षेत्र नहीं रह गया है। यह तकनीक, नवाचार, सामग्री विज्ञान, डिजिटल डिजाइन, विनिर्माण, विपणन, ब्रांडिंग और उपभोक्ता व्यवहार जैसे अनेक क्षेत्रों के साथ जुड़ चुका है। वैश्विक फैशन बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए रचनात्मकता के साथ तकनीकी दक्षता और बाजार की समझ भी आवश्यक है।

ऐसे परिवेश में फैशन शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों के सामने अवसरों का व्यापक क्षेत्र खुल रहा है। वे डिजाइनर, टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ, उद्यमी, शोधकर्ता और ब्रांड रणनीतिकार के रूप में अपनी भूमिका स्थापित कर सकते हैं। लेकिन इस वैश्विक अवसर के साथ अपनी भारतीय पहचान को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

राष्ट्रपति का विद्यार्थियों के लिए यह संदेश विशेष महत्व रखता है कि उनकी सोच वैश्विक हो, लेकिन उनकी जड़ें अपनी मिट्टी और देश के सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी रहें। वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सफल होने का अर्थ अपनी स्थानीय पहचान को पीछे छोड़ना नहीं है। इसके विपरीत भारतीय परंपराओं, शिल्प और सांस्कृतिक विविधता को आधुनिक डिजाइन और तकनीक के माध्यम से दुनिया के सामने प्रस्तुत करना भारत के लिए एक विशिष्ट प्रतिस्पर्धात्मक ताकत बन सकता है।

भारत के पास वस्त्रों और शिल्प की असाधारण विविधता है। विभिन्न क्षेत्रों की बुनाई, रंगाई, कढ़ाई, प्रिंटिंग और हस्तनिर्मित वस्त्र परंपराएं देश की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। यदि इस विरासत को आधुनिक डिजाइन और तकनीकी नवाचार से जोड़ा जाए, तो भारतीय फैशन को वैश्विक बाजार में अलग पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की जा सकती है।

विश्वस्तरीय उत्पादों के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी जरूरी

फैशन उद्योग के विस्तार के साथ पर्यावरणीय प्रभाव का प्रश्न भी लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। तेजी से बदलते फैशन रुझानों, उत्पादन और उपभोग की बढ़ती गति के बीच संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और अपशिष्ट प्रबंधन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

राष्ट्रपति ने विद्यार्थियों को विश्वस्तरीय उत्पाद और ब्रांड बनाने के साथ यह सुनिश्चित करने की सलाह दी कि उनके उत्पाद पर्यावरण के अनुकूल हों। यह विचार भविष्य के फैशन उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा निर्धारित करता है। किसी उत्पाद की सफलता केवल उसकी सुंदरता, गुणवत्ता या बाजार मूल्य से तय नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों और उसके पर्यावरणीय प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए।

स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चे माल का उपयोग इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। स्थानीय संसाधनों के उपयोग से उत्पादन प्रक्रिया को क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सकता है और कई परिस्थितियों में लंबी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता कम की जा सकती है। साथ ही स्थानीय सामग्री और पारंपरिक तकनीकों के इस्तेमाल से ऐसे उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं जिनमें भारतीय क्षेत्रों की विशिष्ट पहचान भी दिखाई दे।

यह दृष्टिकोण कारीगरों के लिए भी नए अवसर पैदा कर सकता है। यदि स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक कौशल और आधुनिक डिजाइन को एक साथ जोड़ा जाए, तो क्षेत्र विशेष की विशिष्टता पर आधारित नए उत्पाद विकसित किए जा सकते हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ पारंपरिक ज्ञान को भी व्यावसायिक रूप से उपयोगी बनाया जा सकता है।

अपशिष्ट को संसाधन में बदलने की जरूरत

फैशन और वस्त्र उद्योग में उत्पादन के दौरान बचने वाले कपड़े और अन्य सामग्री को अक्सर अपशिष्ट मान लिया जाता है। राष्ट्रपति ने इस सोच में बदलाव की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि बचे हुए अंश को बेकार समझकर फेंकने के बजाय उसे नया रूप, नई उपयोगिता और नया मूल्य दिया जा सकता है।

यही सोच सर्कुलर इकोनॉमी की बुनियादी अवधारणा से जुड़ती है। रैखिक अर्थव्यवस्था में संसाधन से उत्पाद, उत्पाद से उपभोग और अंततः अपशिष्ट की प्रक्रिया चलती है। इसके विपरीत सर्कुलर इकोनॉमी में उत्पाद और संसाधनों को अधिक समय तक उपयोग में बनाए रखने, पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और नए मूल्य सृजन पर जोर दिया जाता है।

वस्त्र क्षेत्र में यह अवधारणा अनेक स्तरों पर लागू की जा सकती है। कपड़े के बचे हुए टुकड़ों से नए उत्पाद तैयार करना, पुराने परिधानों को नए डिजाइन में बदलना, पुनर्चक्रित सामग्री का इस्तेमाल करना और उत्पादन प्रक्रिया में अपशिष्ट को कम करना इसके कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण हो सकते हैं।

इस तरह की सोच केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रहती। यह डिजाइनरों और विद्यार्थियों के लिए रचनात्मकता का नया क्षेत्र भी खोलती है। किसी ऐसी सामग्री को नया उपयोग देना जिसे पहले अनुपयोगी समझा जाता था, डिजाइन नवाचार का आधार बन सकता है। इससे एक ओर संसाधनों की बर्बादी कम होती है और दूसरी ओर उत्पाद को विशिष्ट पहचान मिल सकती है।

निफ्ट की भूमिका केवल शिक्षा तक सीमित नहीं

राष्ट्रपति ने निफ्ट के नीति-निर्माताओं द्वारा संधारणीयता और सामाजिक दायित्व को संस्थान की कार्ययोजना में महत्वपूर्ण स्थान दिए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की। यह संकेत करता है कि फैशन शिक्षा की भूमिका अब केवल विद्यार्थियों को पेशेवर कौशल प्रदान करने तक सीमित नहीं रह सकती।

एक आधुनिक फैशन संस्थान को डिजाइन और तकनीक के साथ-साथ पर्यावरण, सामाजिक दायित्व, कारीगर समुदाय, स्थानीय अर्थव्यवस्था और संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल जैसे मुद्दों को भी शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा। विद्यार्थियों को यह समझना आवश्यक है कि वे जो डिजाइन तैयार कर रहे हैं, उसका प्रभाव उत्पादन से लेकर उपभोग और उपयोग के बाद के चरण तक पड़ता है।

संधारणीय फैशन की अवधारणा इसी व्यापक जिम्मेदारी को सामने रखती है। इसका उद्देश्य ऐसे उत्पादों और प्रक्रियाओं को बढ़ावा देना है जिनमें संसाधनों का बेहतर उपयोग हो, अपशिष्ट कम हो और सामाजिक तथा पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में रखा जाए।

यदि फैशन संस्थान अनुसंधान, उद्योग, कारीगर समुदाय और स्थानीय संसाधनों के साथ लगातार संवाद स्थापित करें, तो नई डिजाइन अवधारणाओं और उत्पादन तकनीकों के विकास की संभावनाएं और बढ़ सकती हैं। इससे विद्यार्थियों को वास्तविक समस्याओं पर काम करने का अवसर मिलेगा और कारीगरों तथा उद्योग को भी नई तकनीकी एवं डिजाइन सहायता प्राप्त हो सकती है।

भारतीय फैशन उद्योग के सामने बड़ा वैश्विक अवसर

विश्व स्तर पर भारत की पहचान केवल एक बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक संभावनाशील डिजाइन और उत्पादन केंद्र के रूप में भी मजबूत हो रही है। भारतीय परंपराओं, विविध वस्त्र तकनीकों, हस्तशिल्प और प्राकृतिक संसाधनों की विविधता देश को वैश्विक फैशन उद्योग में एक विशिष्ट स्थान दिला सकती है।

इसके लिए आवश्यक है कि भारतीय फैशन उद्योग अपनी विरासत को आधुनिकता के साथ जोड़े। केवल पारंपरिक डिजाइन को दोहराना पर्याप्त नहीं होगा। उसे नए उपभोक्ताओं की जरूरतों, आधुनिक जीवनशैली, तकनीकी परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप विकसित करना होगा।

युवा डिजाइनरों और फैशन टेक्नोलॉजी के विद्यार्थियों की भूमिका यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। उनके पास पारंपरिक ज्ञान को नई दृष्टि से देखने और उसे आधुनिक बाजार के अनुरूप प्रस्तुत करने की क्षमता है। यदि उनकी शिक्षा में स्थानीय शिल्प और कारीगर समुदायों के साथ प्रत्यक्ष संवाद को स्थान दिया जाए, तो कई ऐसे नए उत्पाद और ब्रांड विकसित हो सकते हैं जो भारतीय पहचान को वैश्विक बाजार में स्थापित करें।

कारीगरों के सशक्तीकरण से विरासत का भविष्य सुरक्षित होगा

भारत की पारंपरिक वस्त्र और हस्तशिल्प विरासत का भविष्य केवल संग्रहालयों या दस्तावेजों में सुरक्षित नहीं रह सकता। यह तभी जीवित रह सकती है जब इससे जुड़े कारीगरों और उनके परिवारों को आर्थिक रूप से टिकाऊ अवसर मिलें।

कारीगरों को आधुनिक डिजाइन, बाजार की जानकारी, तकनीकी प्रशिक्षण, गुणवत्ता सुधार और नए व्यापारिक अवसर उपलब्ध कराना इस दिशा में महत्वपूर्ण है। जब पारंपरिक कौशल आर्थिक रूप से व्यवहार्य व्यवसाय में बदलता है, तब नई पीढ़ी के लिए भी उस पेशे को अपनाने की संभावना बढ़ती है।

राष्ट्रपति का यह विचार कि कारीगरों को सहयोग और मार्गदर्शन मिलने से आने वाली पीढ़ियां भी गर्व और विश्वास के साथ इस व्यवसाय से जुड़ सकती हैं, वस्त्र क्षेत्र की दीर्घकालिक नीति के लिए महत्वपूर्ण संदेश है। यह केवल रोजगार का प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक निरंतरता का भी विषय है।

परंपरा, तकनीक और संधारणीयता से बनेगा भविष्य

भारत के वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र के सामने आज एक साथ कई अवसर और चुनौतियां मौजूद हैं। एक ओर वैश्विक फैशन बाजार में विस्तार की संभावना है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरणीय जिम्मेदारी, संसाधनों का संरक्षण और पारंपरिक कारीगरों की आजीविका जैसे मुद्दे भी सामने हैं।

इन सभी पहलुओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। पारंपरिक कारीगरों के कौशल को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए, विद्यार्थियों को वैश्विक बाजार की समझ के साथ भारतीय संस्कृति की गहरी जानकारी दी जाए, स्थानीय कच्चे माल के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए और उत्पादन से निकलने वाले अपशिष्ट को नए उत्पादों में बदलने की दिशा में काम किया जाए।

सर्कुलर इकोनॉमी को फैशन उद्योग का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना भी इसी परिवर्तन का एक प्रमुख आधार हो सकता है। इससे संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के साथ नए व्यावसायिक मॉडल और रोजगार के अवसर विकसित हो सकते हैं।

भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता और उसकी परंपराओं में निहित है। यदि इस विरासत को आधुनिक तकनीक, डिजाइन नवाचार और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ जोड़ा जाए, तो भारतीय वस्त्र एवं फैशन उद्योग वैश्विक मंच पर अपनी अलग और मजबूत पहचान स्थापित कर सकता है।

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