बेंगलुरु: शरीर की प्राकृतिक गतिविधियों से ऊर्जा लेकर स्वयं संचालित होने वाले चिकित्सा उपकरणों के विकास की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। शोधकर्ताओं ने पेप्टाइड्स की आणविक व्यवस्था को नियंत्रित करने की ऐसी सरल रणनीति विकसित की है, जिससे जैव-अनुकूल पेप्टाइड सामग्री में मजबूत पीजोइलेक्ट्रिक गुण उत्पन्न किए जा सकते हैं। भविष्य में इस तकनीक का उपयोग ऐसे स्वास्थ्य उपकरणों में किया जा सकता है जो हृदय की धड़कन, सांस लेने या शरीर की गतिविधियों से स्वयं ऊर्जा प्राप्त कर सकें।
पीजोइलेक्ट्रिक सामग्री यांत्रिक दबाव, खिंचाव या मोड़ को विद्युत ऊर्जा में बदलने में सक्षम होती है। इस गुण के कारण इनका उपयोग प्रेशर सेंसर, चिकित्सीय अल्ट्रासाउंड, एक्चुएटर और ऊर्जा संचयन प्रणालियों में किया जाता है। वर्तमान में कई व्यावसायिक पीजोइलेक्ट्रिक सामग्रियां सिरेमिक आधारित हैं। हालांकि उनका प्रदर्शन प्रभावी होता है, लेकिन वे अपेक्षाकृत कठोर और भंगुर होती हैं तथा कुछ पारंपरिक सामग्रियां पर्यावरण और जैव-चिकित्सीय उपयोग के लिहाज से सीमित मानी जाती हैं।

इसी चुनौती को देखते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत कार्यरत बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (सीईएनएस) के वैज्ञानिकों ने पेप्टाइड आधारित जैवसामग्रियों पर शोध किया। इस अध्ययन में आईआईएसईआर कोलकाता और जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (जेएनसीएएसआर), बेंगलुरु के शोधकर्ताओं ने भी सहयोग किया।
रासायनिक संरचना बदले बिना बदला सामग्री का व्यवहार
पेप्टाइड प्रोटीन के प्राकृतिक निर्माण खंड हैं और अपनी जैव-अनुकूलता तथा जैव-अवक्रमणीयता के कारण चिकित्सा एवं जैवसामग्री अनुसंधान में विशेष महत्व रखते हैं। लेकिन पेप्टाइड आधारित सामग्रियों में मजबूत और स्थिर पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया हासिल करना अब तक चुनौतीपूर्ण रहा है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि इसके लिए पेप्टाइड की रासायनिक संरचना में बदलाव करना आवश्यक नहीं है। वास्तविक अंतर पेप्टाइड अणुओं के एक-दूसरे के साथ जुड़कर बनने वाली संरचना में पैदा किया जा सकता है।
एटॉमिक फोर्स माइक्रोस्कोपी (AFM) और फील्ड एमिशन स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (FESEM) जैसी उन्नत तकनीकों से किए गए अध्ययन में पाया गया कि पानी में पेप्टाइड अणु नैनोफाइबर का निर्माण करते हैं, लेकिन इस अवस्था में उल्लेखनीय पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई देती।
इसके बाद वैज्ञानिकों ने उपयुक्त सह-विलायक की मात्र लगभग एक प्रतिशत मात्रा मिलाई। इस छोटे से बदलाव ने पेप्टाइड अणुओं के स्व-संयोजन की प्रक्रिया को बदल दिया और वे एक अत्यधिक व्यवस्थित सुप्रामॉलिक्यूलर संरचना में पुनर्गठित हो गए। परिणामस्वरूप, बिना पेप्टाइड की रासायनिक संरचना बदले, उसमें मजबूत पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो गई।
आणविक स्तर पर ‘स्विच’ की तरह काम करता है बदलाव
इस परिवर्तन के पीछे नियंत्रित काइरल स्व-संयोजन की भूमिका सामने आई है। इस प्रक्रिया में आणविक द्विध्रुव एक ऐसी गैर-केंद्रसममितीय संरचना में व्यवस्थित होते हैं, जो पीजोइलेक्ट्रिसिटी के लिए आवश्यक है।
सरल शब्दों में, पेप्टाइड की रासायनिक पहचान वही रहती है, लेकिन उसके अणुओं के व्यवस्थित होने का तरीका बदल जाता है। यही छोटा आणविक परिवर्तन सामग्री के विद्युत व्यवहार को प्रभावी ढंग से सक्रिय कर देता है। यह निष्कर्ष इस संभावना को मजबूत करता है कि भविष्य में सुप्रामॉलिक्यूलर संरचनाओं को नियंत्रित करके जैवसामग्रियों के कार्यात्मक गुणों को आवश्यकता के अनुसार बदला जा सकता है।
तैयार किए गए पेप्टाइड नैनोमटीरियल्स में लगभग 30 pM V⁻¹ का पीजोइलेक्ट्रिक गुणांक दर्ज किया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, पेप्टाइड आधारित सामग्री के लिए यह उल्लेखनीय प्रदर्शन है और इससे लचीली, टिकाऊ तथा जैव-अनुकूल ऊर्जा संचयन तकनीकों के विकास की संभावनाएं बढ़ती हैं।
स्व-संचालित चिकित्सा उपकरणों की संभावना
इस खोज का संभावित उपयोग उन इलेक्ट्रॉनिक और चिकित्सा प्रणालियों में हो सकता है जिन्हें लगातार बाहरी बैटरी या बिजली स्रोत की आवश्यकता न हो। शरीर की गतिविधियों से उत्पन्न यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलकर भविष्य के उपकरणों को आंशिक या पूर्ण रूप से ऊर्जा उपलब्ध कराने की संभावना बनती है।
संभावित अनुप्रयोगों में शरीर के भीतर लगाए जाने वाले मेडिकल सेंसर, बायोसेंसर, इलेक्ट्रॉनिक स्किन, पहनने योग्य इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य स्वास्थ्य निगरानी प्रणालियां शामिल हैं। हालांकि इन अनुप्रयोगों तक पहुंचने के लिए आगे जैव-सुरक्षा, दीर्घकालिक स्थिरता, ऊर्जा उत्पादन क्षमता और वास्तविक चिकित्सा परिस्थितियों में प्रदर्शन का परीक्षण आवश्यक होगा।
इस तकनीक का महत्व केवल चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। पेप्टाइड आधारित पीजोइलेक्ट्रिक सामग्री पारंपरिक कठोर पीजोइलेक्ट्रिक सामग्रियों के मुकाबले अधिक लचीले और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों के विकास का आधार बन सकती है। इससे टिकाऊ सॉफ्ट इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा संचयन की नई तकनीकों को भी गति मिल सकती है।
सुप्रामॉलिक्यूलर केमिस्ट्री में भारतीय शोध की उपलब्धि
यह अध्ययन सुप्रामॉलिक्यूलर केमिस्ट्री के क्षेत्र में भारत की शोध क्षमता को भी सामने लाता है। इसमें आणविक डिजाइन, नैनोस्केल पर सामग्री की विशेषताओं के अध्ययन और कंप्यूटेशनल सिमुलेशन जैसी विभिन्न वैज्ञानिक विधियों का संयोजन किया गया।
शोध का नेतृत्व सीईएनएस के डॉ. गौतम घोष ने अपनी पीएचडी शोधार्थी अपर्णा रमेश के साथ किया। अध्ययन में सर्बजीत लायक, आईआईएसईआर कोलकाता की प्रो. नीलांजना सेनगुप्ता और जेएनसीएएसआर के तारक नाथ दास का भी योगदान रहा।
यह शोध Angewandte Chemie International Edition में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन का DOI: 10.1002/anie.3135255 है।