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शिक्षा कोरी नियुक्ति ही नहीं, मुक्ति का माध्यम बने

शिक्षक दिवस- 5 सितम्बर, 2026

शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों के सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि भारत की शिक्षा-दृष्टि, शिक्षक की भूमिका और भावी पीढ़ी के निर्माण पर गंभीर आत्ममंथन का दिन है। किसी राष्ट्र का भविष्य केवल उसके विद्यालयों की संख्या, भवनों की भव्यता, पुस्तकों की उपलब्धता या परीक्षाओं के परिणामों से निर्धारित नहीं होता, बल्कि इस बात से तय होता है कि उसके विद्यालयों से निकलने वाला मनुष्य कितना ज्ञानवान, विवेकशील, संवेदनशील, चरित्रवान और उत्तरदायी है। इसलिए आज देश में केवल शिक्षा क्रांति की नहीं, बल्कि शिक्षक क्रांति की भी आवश्यकता है। यदि शिक्षा का स्वरूप बदलना है तो शिक्षा देने वाले व्यक्ति की चेतना, दृष्टि और कार्यशैली में भी परिवर्तन लाना होगा। पूरे देश में समान गुणवत्ता वाली शिक्षा की दिशा में प्रयास तभी सफल होंगे, जब प्रत्येक बच्चे को समान अवसर के साथ योग्य, संस्कारवान और प्रतिबद्ध शिक्षक मिलें। भारत की परंपरा में शिक्षा का अर्थ कभी केवल सूचना और रोजगार प्राप्त करना नहीं रहा। हमारी ज्ञान-परंपरा में गुरु वह था जो अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता था। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ भारतीय शिक्षा-दृष्टि की मूल चेतना को भी व्यक्त करता है। विद्या वह है जो मनुष्य के भीतर विवेक जगाए, उसके आचरण को परिष्कृत करे, उसे आत्मसंयम सिखाए और समाज एवं राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी बनाए। आज यदि शिक्षा का अर्थ केवल नौकरी, पद, वेतन और प्रतिस्पर्धा तक सीमित होता जा रहा है तो हमें शिक्षा की आत्मा को पुनः खोजने की आवश्यकता है।
शिक्षा के बदलते स्वरूप के साथ शिक्षक की भूमिका भी बदल रही है। कभी शिक्षा को ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात् मुक्ति और आत्मविकास का माध्यम माना गया था, लेकिन आज अनेक बार उसका लक्ष्य केवल ‘नियुक्ति’ प्राप्त करने तक सिमटता दिखाई देता है। ज्ञान का मूल्य इस आधार पर तय होने लगा है कि उससे कितनी आय और कितना ऊंचा पद प्राप्त किया जा सकता है। शिक्षित होने की आकांक्षा बढ़ी है, लेकिन सुशिक्षित और संस्कारित होने की आकांक्षा उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। यह स्थिति केवल शिक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि पूरे समाज की चिंता का विषय है। आज शिक्षा के व्यवसायीकरण ने इस संकट को और गहरा किया है। शिक्षा जहां मिशन और सामाजिक दायित्व होनी चाहिए थी, वहां कई स्थानों पर वह व्यवसाय का रूप लेती दिखाई देती है। जब ज्ञान की कीमत बाजार तय करने लगे और शिक्षक की सफलता केवल परिणाम तथा वेतन से मापी जाने लगे, तब शिक्षा के मानवीय और संस्कारात्मक पक्ष का कमजोर होना स्वाभाविक है। इसके साथ गुरु-शिष्य संबंधों में भी अनेक स्तरों पर दूरी दिखाई दे रही है। शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच दुर्व्यवहार, अनुशासनहीनता और हिंसा की घटनाएं हमें चेताती हैं कि केवल पाठ्यक्रम बदलने से शिक्षा का संकट समाप्त नहीं होगा। हमें संबंधों की संस्कृति, संवाद की परंपरा और पारस्परिक सम्मान को भी पुनर्जीवित करना होगा।

महान दार्शनिक और शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन इस बात का उदाहरण है कि शिक्षक केवल पेशा नहीं, एक जीवन-दृष्टि हो सकता है। उन्होंने अपने जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाए जाने की इच्छा व्यक्त की थी। तभी से 5 सितंबर देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि शिक्षक का सम्मान केवल इसलिए नहीं कि वह पढ़ाता है, बल्कि इसलिए कि वह समाज की चेतना को दिशा देता है। वर्तमान समय में शिक्षक की भूमिका पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। विद्यार्थी के सामने आज पुस्तक के अतिरिक्त इंटरनेट, सामाजिक माध्यम, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और असंख्य डिजिटल स्रोत उपलब्ध हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षक की उपयोगिता कम नहीं हुई, बल्कि और बढ़ी है। अब शिक्षक को केवल जानकारी देने वाला नहीं, बल्कि सही जानकारी और गलत सूचना में अंतर समझाने वाला मार्गदर्शक बनना होगा। उसे विद्यार्थी को यह सिखाना होगा कि ज्ञान का उपयोग किस उद्देश्य से और किस जिम्मेदारी के साथ किया जाए। तकनीक शिक्षा का विकल्प नहीं, शिक्षक के हाथ में एक प्रभावी साधन बननी चाहिए।

महात्मा गांधी ने सर्वांगीण विकास में आत्मा, मस्तिष्क, वाणी और कर्म के संतुलन को महत्व दिया था। स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के भीतर निहित शक्तियों को जागृत करना है। इन दोनों दृष्टियों को आज की शिक्षा व्यवस्था से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है। विद्यार्थी का मस्तिष्क ज्ञान से समृद्ध हो, हाथ कौशल से सक्षम हों, हृदय करुणा से भरा हो और चरित्र सत्य तथा ईमानदारी पर आधारित हो-यही वास्तविक सर्वांगीण शिक्षा है। केवल प्रतिभाशाली मनुष्य नहीं, बल्कि श्रेष्ठ मनुष्य बनाना शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए। आचार्य महाप्रज्ञ ने व्यक्तित्व-निर्माण को अत्यंत कठिन कार्य माना और इसके लिए निःस्वार्थ तथा जागरूक शिक्षक की आवश्यकता बताई। वास्तव में शिक्षक का सबसे प्रभावी पाठ उसकी पुस्तक नहीं, उसका अपना जीवन होता है। विद्यार्थी शिक्षक की कही बात से अधिक उसके व्यवहार को ग्रहण करता है। शिक्षक सत्यनिष्ठ है तो सत्य का संस्कार देता है, समय का सम्मान करता है तो अनुशासन सिखाता है, विनम्र है तो विनम्रता पैदा करता है और अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित है तो समर्पण का उदाहरण बनता है। इसलिए शिक्षक प्रशिक्षण केवल नई शिक्षण पद्धतियों और तकनीकों तक सीमित नहीं होना चाहिएय उसमें चरित्र, संवेदनशीलता, संवाद-कौशल, मानसिक संतुलन, नैतिक नेतृत्व और भारतीय मूल्य-दृष्टि का भी प्रशिक्षण होना चाहिए।

शिक्षा को केवल परीक्षा और अंकों के दायरे से बाहर निकालना भी समय की मांग है। अच्छे अंक प्राप्त करना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन अच्छे अंक अच्छे मनुष्य होने की गारंटी नहीं हैं। राष्ट्र को कुशल वैज्ञानिक, चिकित्सक, अभियंता और प्रबंधक जितने चाहिए, उतने ही ईमानदार नागरिक, संवेदनशील परिवारजन, जिम्मेदार सामाजिक कार्यकर्ता और विवेकशील नेतृत्वकर्ता भी चाहिए। इसलिए मूल्यांकन में ज्ञान के साथ रचनात्मकता, समस्या-समाधान, सहयोग, सामाजिक संवेदना, नैतिक निर्णय क्षमता और व्यवहार को भी महत्व मिलना चाहिए। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने शिक्षा को अधिक समग्र, लचीला, कौशल-आधारित और भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण विचार सामने रखे हैं। लेकिन किसी नीति की वास्तविक सफलता उसके दस्तावेज में नहीं, उसके धरातलीय परिणामों में दिखाई देती है। छह वर्ष के अनुभव के बाद यह आवश्यक है कि सरकार, शिक्षाविद, शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर निष्पक्षता से समीक्षा करें कि नीति के कौन-से उद्देश्य विद्यालयों तक प्रभावी रूप से पहुंचे और कहां अभी दूरी बनी हुई है। केवल पाठ्यक्रम बदलना पर्याप्त नहीं है। शिक्षक, विद्यालयी संस्कृति, परीक्षा प्रणाली, अभिभावकीय अपेक्षाएं और शिक्षा के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण-इन सभी में परिवर्तन आवश्यक है। यदि देश में ‘एक जैसी शिक्षा’ की बात हो रही है तो उसका अर्थ सांस्कृतिक एकरूपता नहीं, बल्कि समान गुणवत्ता और समान अवसर होना चाहिए। भारत की विविधता उसकी शक्ति है। स्थानीय भाषा, लोकज्ञान, क्षेत्रीय संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करते हुए प्रत्येक बच्चे को आधुनिक विज्ञान, तकनीक, वैश्विक ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टि की समान सुविधा मिलनी चाहिए।

आज शिक्षक दिवस पर सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि हमारे विद्यालयों से कैसे मनुष्य निकल रहे हैं। यदि शिक्षा मनुष्य को अधिक विवेकशील, विनम्र, निर्भीक, करुणामय, सत्यनिष्ठ और उत्तरदायी बना रही है तो वह सफल शिक्षा है। भारत के पास दुनिया को देने के लिए केवल आधुनिक विज्ञान और तकनीकी प्रतिभा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की ज्ञान-संपदा, आध्यात्मिक दृष्टि और मानवीय मूल्यों की महान परंपरा भी है। यदि आधुनिक विज्ञान और तकनीक का समन्वय भारतीय जीवन-मूल्यों के साथ कर दिया जाए तो भारत की शिक्षा व्यवस्था विश्व के लिए मार्गदर्शक बन सकती है। केवल पाठ्यक्रम परिवर्तन की नहीं, चेतना परिवर्तन की है। केवल रोजगारपरक शिक्षा की नहीं, जीवनपरक शिक्षा की है। शिक्षक राष्ट्र का मौन शिल्पकार है। उसके हाथों में केवल एक विद्यार्थी का भविष्य नहीं, आने वाले भारत का चरित्र है। यदि शिक्षक जागेगा तो पीढ़ी जागेगी, पीढ़ी जागेगी तो समाज बदलेगा और समाज बदलेगा तो राष्ट्र नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा। यही शिक्षक दिवस का वास्तविक संदेश और विकसित, संस्कारित एवं विश्व का मार्गदर्शन करने वाले भारत की सबसे मजबूत आधारशिला हो सकती है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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