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सत्य निकेतन हादसा: जिम्मेदार अधिकारियों पर हो ठोस कार्रवाई

दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को पांच मंजिला छात्र-पीजी भवन का भरभराकर गिर जाना केवल एक दर्दनाक हादसा नहीं है। यह उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जो भवन बनने देती है, उसमें अनधिकृत निर्माण होने देती है, उसमें विद्यार्थियों को रहने देती है, उसकी कमजोरियों को वर्षों तक नजरअंदाज करती है और फिर उसके ढह जाने के बाद जागती है। इस हादसे में अब तक छह लोगों की मौत की सूचना है और कई लोग घायल हुए हैं। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार भवन में बेसमेंट और कई ऊपरी मंजिलों में मरम्मत या निर्माण संबंधी काम चल रहा था। प्रशासन ने मजिस्ट्रेट जांच और भवन मालिक के खिलाफ एफआईआर के आदेश दिए हैं। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि हादसे के बाद किसके खिलाफ एफआईआर होगी? असली सवाल यह है कि हादसे से पहले जिम्मेदार अधिकारी कहां थे? यदि निर्माण नियमों का उल्लंघन था, यदि भवन का स्वीकृत नक्शा नहीं था, यदि अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं, यदि बेसमेंट में निर्माण चल रहा था, यदि भवन छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल हो रहा था और यदि वह संरचनात्मक रूप से जोखिमपूर्ण था, तो इन सबका पता प्रशासन को तब क्यों नहीं चला जब वहां निर्माण हो रहा था?

सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के आसपास विद्यार्थियों का प्रमुख इलाका है। देश के विभिन्न राज्यों से हजारों युवा यहां अपने भविष्य के सपने लेकर आते हैं। वे छोटे-छोटे कमरों, पीजी और किराये के मकानों में रहकर पढ़ते हैं। उनके माता-पिता अपनी जीवनभर की कमाई का बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर लगाते हैं और यह विश्वास करते हैं कि राजधानी में उनका बच्चा सुरक्षित रहेगा। लेकिन जब शिक्षा की तलाश में निकला युवा एक ऐसी इमारत में पहुंचता है, जिसकी नींव ही नियमों और सुरक्षा के साथ समझौते पर टिकी हो, तो विकास की हमारी पूरी अवधारणा कटघरे में खड़ी हो जाती है और यह कोई पहली चेतावनी नहीं है। 2022 में भी सत्य निकेतन में निर्माणाधीन चार मंजिला इमारत ढहने से दो मजदूरों की मौत हुई थी और चार लोग घायल हुए थे। उस समय भी निर्माण कार्य, सुरक्षा और भवन की निगरानी पर सवाल उठे थे। लगभग चार साल बाद उसी इलाके में फिर एक बड़ी इमारत ढह गई। इसका अर्थ है कि हमने घटना से सबक लेने के बजाय घटना को एक समाचार की तरह देखा और आगे बढ़ गए।

यहां भ्रष्टाचार की बात करते समय एक सावधानी भी जरूरी है। किसी अधिकारी या व्यवसायी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं। लेकिन यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि नियमों के विरुद्ध निर्माण को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया, निरीक्षण में लापरवाही हुई या किसी प्रकार की मिलीभगत रही, तो जिम्मेदारी केवल भवन मालिक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिसने नियम तोड़े और जिसने नियम तोड़ने दिए-दोनों को जवाबदेह बनाना होगा। सत्य निकेतन की त्रासदी को जुलाई 2024 के पुराने राजेंद्र नगर हादसे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। वहां राव आईएएस स्टडी सर्किल के बेसमेंट में पानी भर जाने से तीन सिविल सेवा अभ्यर्थियों-तनीया सोनी, श्रेया यादव और नवीन डालविन की मृत्यु हुई थी। सबसे भयावह तथ्य यह था कि बेसमेंट का उपयोग लाइब्रेरी के रूप में हो रहा था, जबकि उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उसे पार्किंग और स्टोरेज के लिए इस्तेमाल किया जाना था। इससे भी अधिक चिंताजनक बात सामने आई-हादसे से लगभग एक महीने पहले एक विद्यार्थी ने एमसीडी में शिकायत की थी।

भारत में भवन निर्माण के लिए नियमों की कमी नहीं है। नक्शा स्वीकृति, भवन उपविधियां, अग्नि सुरक्षा, संरचनात्मक सुरक्षा, अधिभोग प्रमाणपत्र, पार्किंग, बेसमेंट के उपयोग-हर क्षेत्र के लिए नियम हैं। लेकिन समस्या नियमों की संख्या नहीं, उनके पालन की ईमानदारी है। जब किसी भवन में एक मंजिल की अनुमति हो और चार-पांच मंजिलें खड़ी हो जाएं, जब बेसमेंट स्टोरेज के लिए स्वीकृत हो और वहां लाइब्रेरी या व्यावसायिक गतिविधि चलने लगे, जब सड़क की जलनिकासी बाधित हो और फिर भी निर्माण चलता रहे-तो सवाल केवल नागरिक की मनमानी का नहीं है। सवाल उस पूरी निगरानी व्यवस्था का है, जो आंखों के सामने होने वाले बदलाव को देखने के बावजूद समय पर कार्रवाई नहीं करती। भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने का नाम नहीं है। भ्रष्टाचार वह भी है जब कोई जिम्मेदार व्यक्ति अपने कर्तव्य को जानबूझकर न निभाए। किसी अवैध निर्माण को देखकर आंखें बंद कर लेना भी व्यवस्था के प्रति अपराध है। किसी भवन को जोखिमपूर्ण जानते हुए कार्रवाई न करना भी भ्रष्ट प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा है।

सरकारी भवन भी सुरक्षित नहीं तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? मई 2024 में दिल्ली के आईटीओ स्थित सेंट्रल रेवेन्यू बिल्डिंग में आग लगी थी। 46 वर्षीय ऑफिस सुपरिंटेंडेंट की धुएं में दम घुटने से मृत्यु हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार भवन पुराना था और उसमें आधुनिक फायर-स्प्रिंकलर व्यवस्था भी नहीं थी। यह घटना एक और सवाल सामने रखती है-जब सरकारी भवनों में भी सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है, तो निजी और अनधिकृत भवनों की निगरानी की स्थिति क्या होगी? मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, बेंगलुरु और देश के अन्य महानगरों में अनियोजित शहरी विस्तार लगातार बढ़ रहा है। जमीन सीमित है, जनसंख्या बढ़ रही है, किराये की मांग बढ़ रही है और व्यावसायिक हित अधिकतम जगह का अधिकतम उपयोग चाहते हैं। ऐसे में यदि शासन मजबूत नियमन और वैज्ञानिक शहरी नियोजन नहीं करेगा तो शहर ऊपर की ओर बढ़ेंगे, लेकिन उनकी सुरक्षा नीचे गिरती जाएगी। दुर्घटना के बाद वही परिचित दृश्य सामने आता है-मंत्री घटनास्थल पर पहुंचते हैं, अधिकारी बैठक करते हैं, मुआवजे की घोषणा होती है, जांच समिति बनती है, कुछ भवन सील होते हैं, कुछ गिरफ्तारियां होती हैं और कुछ दिनों तक प्रशासन सक्रिय दिखाई देता है। फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाता है। लेकिन किसी मृत विद्यार्थी के माता-पिता के लिए कुछ भी सामान्य नहीं होता। उनके लिए वह एक जांच समिति नहीं, जीवनभर का खालीपन है। उनके लिए मुआवजे की राशि उनके बेटे या बेटी का विकल्प नहीं है। वे यह जानना चाहते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित क्यों नहीं था? किसने सुरक्षा की गारंटी दी थी? किसने निगरानी की थी? किसने खतरे को नजरअंदाज किया था? इसलिए जांच का उद्देश्य केवल दोषी व्यक्ति ढूंढना नहीं होना चाहिए। जांच को यह भी पता लगाना चाहिए कि किस स्तर पर सिस्टम विफल हुआ। फाइल कहां रुकी? निरीक्षण किसने किया? शिकायत किसने दबाई? नक्शा किस आधार पर स्वीकार हुआ? अवैध निर्माण वर्षों तक कैसे चलता रहा? भवन में रहने वालों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? और सबसे महत्वपूर्ण-क्या उन अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी जिनकी जिम्मेदारी ही ऐसे हादसों को रोकना थी?
सत्य निकेतन के मलबे से आज देश को केवल छह मौतों का आंकड़ा नहीं देखना चाहिए। वहां दबे हुए सपनों को देखना चाहिए। उन माता-पिताओं की आंखों को देखना चाहिए जिन्होंने अपने बच्चों को दिल्ली भेजते समय यह सोचा होगा कि वे पढ़ेंगे, आगे बढ़ेंगे और परिवार का नाम रोशन करेंगे। उन सपनों की मौत केवल एक इमारत के गिरने से नहीं हुई है, वे उस मानसिकता के नीचे दबे हैं जिसमें नियमों से अधिक प्रभावशाली पैसा, सुविधा और ‘सब चलता है’ की संस्कृति बन जाती है। अब समय है कि सरकारें हादसों के बाद जागने की आदत छोड़ें। भवन गिरने से पहले निरीक्षण हो, पानी भरने से पहले जलनिकासी सुधरे, शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई हो और भ्रष्टाचार होने से पहले ही उसकी गुंजाइश बंद हो। क्योंकि देश को केवल नया भारत नहीं बनाना है-उसे सुरक्षित, जिम्मेदार, ईमानदार और संवेदनशील भारत भी बनाना है। सत्य निकेतन का मलबा हमसे यही पूछ रहा है-अगली इमारत गिरने का इंतजार करेंगे या अब व्यवस्था को सचमुच जगाएंगे?

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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