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डॉ. घनश्याम सिंह महाविद्यालय में अष्ट दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम का शुभारंभ

डॉ. घनश्याम सिंह महाविद्यालय, सोयेपुर, लालपुर, वाराणसी में महाविद्यालय के बहुउद्देशीय सभागार में अष्ट दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम का उद्घाटन किया गया। कार्यक्रम की विषय- वस्तु “संस्कृति से संवाद : भारतीय प्रज्ञा और वैश्विक भविष्य” रखा गया है। कार्यक्रम के प्रथम सत्र का शुभारंभ माँ सरस्वती तथा डॉ. घनश्याम सिंह की प्रतिमा के समक्ष दीपप्रज्वलन एवं पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। तदुपरांत छात्र- छात्राओं ने सरस्वती वंदना एवं कुलगीत की प्रस्तुतियाँ दी।

सभी अतिथियों को माल्यार्पण कर तथा अंगवस्त्र, स्मृति चिन्ह भेट कर स्वागत एवं अभिनंदन किया गया।  प्रबंधक  नागेश्वर सिंह ने अपने वक्तव्य में में कहा कि एन. ई.पी. 2020 भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक बड़े बदलाव की तरह देखा जा रहा है। नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा को किस तरह से अपनाया जा सकता है इसके लिए हमे कोई व्यव्स्था बनानी होगी।

विषय-प्रवर्तन करते हुए  डॉ आनंद सिंह ने सभी आठ दिनों की विषय-वस्तु पर विस्तार से चर्चा की।  उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य अतीत से सीखना,वर्तमान को समझना व भविष्य को और अधिक मानवीय बनाना है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि प्रोफेसर वांगचुक दोरजे नेगी रहे जो भारतीय बौद्ध दर्शन के एक प्रख्यात विद्वान और वर्तमान में केंद्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान, सारनाथ, वाराणसी के कुलपति हैं । उन्होंने बौद्ध धर्म के श्रावण परंपरा की बात की औए कहा कि ज्ञान का उद्देश्य है सुख व शांति की प्राप्ति। राग, द्वेष, ईष्या के होते हुए सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है।  हमे चिंतन करने की आवश्यकता है कि हमने समाज और राष्ट्र को क्या दिया है? 

प्रथम सत्र के विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर सदानंद शाही, प्रख्यात लेखक और विचारक, कुलपति, श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, भिलाई, मध्यप्रदेश ने कहा कि जब हम ज्ञान की बात करते है तो साथ ही साथ अज्ञान व समाज में व्याप्त पाखंड की भी बात करनी चाहिए। 

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर राम सुधार सिंह, उदय प्रताप कॉलेज, वाराणासी ने भारत में नवजागरण का संदर्भ लेते हुए कहा कि एक बार पुनः हमे अपने सुसमृद्ध भारतीय ज्ञान परंपरा की ओर देखने की जरूरत है। 

द्वितीय सत्र में डॉ. अंकुर शुक्ला सी. ई.ओ. एक्स. बोट प्राइवेट लिमिटेड, ने कहा कि धर्म को केवल अनुष्ठान के अर्थ में देखना उचित नहीं है।  धर्म का व्यापक अर्थ है।  यह समग्र विकास की बात करता है और यही भारत की परम्परा रही है।

मंच का संचालन डॉ रचना पांडेय ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ.  विपुल शुक्ला द्वारा किया गया। एवीके न्यूज सर्विस

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