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पोला : अन्नदाता और उसके सहचर बैलों के सम्मान का पर्व

10 सितंबर भाद्र पक्ष अमावस्या व पोला पर विशेष

भाद्रपद अमावस्या पर जीवंत होती है छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति

 छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसकी हरियाली, नदियों, जंगलों और खनिज संपदा से नहीं है, बल्कि उसकी समृद्ध लोकपरंपराओं और तीज-त्योहारों से भी है। यहां के पर्व प्रकृति, कृषि, पशुधन और मानव जीवन के बीच गहरे संबंध को अभिव्यक्त करते हैं। इन्हीं लोकपर्वों में पोला अथवा पोरा तिहार का विशेष स्थान है। भाद्रपद अमावस्या के अवसर पर मनाया जाने वाला यह पर्व मूलतः किसान और उसके सबसे विश्वसनीय कृषि-सहचर बैल के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और आत्मीयता का पर्व है।    

परंपरागत कृषि व्यवस्था में बैल किसान के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। खेत की जुताई से लेकर बैलगाड़ी खींचने तक कृषि के अनेक कार्य उनके सहयोग से पूरे होते थे। किसान और बैल के बीच का संबंध केवल उपयोगिता का नहीं, बल्कि परिश्रम, विश्वास और आत्मीयता का रहा है।

इसी भावना को पोला पर्व अभिव्यक्त करता है। इस दिन बैलों को कृषि कार्य से विश्राम दिया जाता है। उन्हें स्नान कराया जाता है, हल्दी और तेल लगाया जाता है, सींगों को रंगा जाता है तथा फूल-मालाओं, घंटियों और आकर्षक वस्त्रों से सजाया जाता है। इसके बाद उनकी पूजा और आरती कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपरा में पोला को पशुधन के महत्व को रेखांकित करने वाला प्रमुख कृषि पर्व माना गया है।

पोला पर्व का संबंध केवल बैलों से ही नहीं, बल्कि खेत और फसल से भी है। लोकमान्यता है कि इसी समय धान की बालियों में दूध भरना प्रारंभ होता है और अन्नमाता गर्भ धारण करती हैं। किसान के लिए यह आने वाली फसल और समृद्धि की आशा का अवसर होता है। इसलिए पोला वास्तव में प्रकृति, कृषि, पशुधन और किसान इन चारों के बीच स्थापित उस जीवनचक्र का उत्सव है, जिसके आधार पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था सदियों से आगे बढ़ती रही है।

पोला की सबसे सुंदर विशेषताओं में बच्चों की भागीदारी भी है। ग्रामीण अंचलों में मिट्टी अथवा लकड़ी से बने छोटे-छोटे बैल, चूल्हा, चक्की, चुकिया और अन्य खिलौने तैयार किए जाते हैं। बच्चे उन्हें सजाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। यह परंपरा केवल मनोरंजन नहीं है। इसके माध्यम से नई पीढ़ी को बचपन से ही यह सीख मिलती है कि पशु हमारे जीवन और कृषि व्यवस्था के महत्वपूर्ण साथी हैं। लोकपर्व इस प्रकार बिना किसी औपचारिक पाठशाला के बच्चों को अपनी मिट्टी, संस्कृति और परंपरा का पाठ पढ़ाता है।

पोला केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि पारिवारिक उल्लास और सामुदायिक मेल-मिलाप का अवसर भी है। घरों में पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। छत्तीसगढ़ी खान-पान की समृद्ध परंपरा के अनुरूप ठेठरी, खुरमी सहित अनेक व्यंजन इस अवसर पर तैयार किए जाते हैं।बहन-बेटियों के मायके आने, परिवार के साथ समय बिताने और रिश्तों में स्नेह बढ़ाने की परंपरा भी इस पर्व को सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।

भाद्रपद अमावस्या भारतीय धार्मिक परंपरा में भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस अवसर पर स्नान, दान, पितरों का स्मरण और तर्पण जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं। अलग – अलग क्षेत्रों में इस अमावस्या के अलग नाम और अलग लोकाचार दिखाई देते हैं। छत्तीसगढ़ में इसी अमावस्या का लोकजीवन से जुड़ा रूप पोला के रूप में सामने आता है। यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि एक ही तिथि धार्मिक आस्था, कृषि जीवन और लोकसंस्कृति के अनेक रंगों को अपने भीतर समेट लेती है।

आज खेती के तौर-तरीके बदल रहे हैं। ट्रैक्टर और आधुनिक कृषि उपकरणों ने बैलों पर निर्भरता काफी कम कर दी है। शहरों में रहने वाली नई पीढ़ी के लिए बैल अब कृषि जीवन के प्रत्यक्ष सहभागी के बजाय स्मृति और लोकसंस्कृति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। लेकिन इससे पोला का महत्व समाप्त नहीं होता। बल्कि आज इस पर्व का संदेश और अधिक व्यापक हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य अकेले विकास नहीं कर सकता। उसके जीवन और सभ्यता के निर्माण में प्रकृति, पशु-पक्षियों और असंख्य जीवों का योगदान रहा है। इसलिए पशुओं के प्रति करुणा, संवेदना और सम्मान हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग होना चाहिए।

पोला हमें यह भी सिखाता है कि जिसके श्रम से हमारा जीवन चलता है, उसके प्रति कृतज्ञ होना मनुष्य का नैतिक दायित्व है। आज जब तेजी से बदलती जीवनशैली हमारी अनेक लोकपरंपराओं को पीछे छोड़ रही है, तब पोला जैसे पर्वों को केवल छुट्टी या उत्सव के रूप में देखने के बजाय उनके सांस्कृतिक अर्थ को समझना आवश्यक है।

इन पर्वों में हमारे पूर्वजों का जीवन-दर्शन छिपा है। इनमें प्रकृति के प्रति सम्मान है, पशुओं के प्रति करुणा है, किसान के श्रम का सम्मान है और परिवार तथा समाज को जोड़ने वाली आत्मीयता है।इसलिए आवश्यकता है कि आधुनिकता के साथ आगे बढ़ते हुए हम अपनी लोकपरंपराओं की जड़ों को न भूलें। बच्चों को पोला की कथा और परंपरा से परिचित कराएं, मिट्टी के खिलौनों को प्रोत्साहित करें और पशुधन के प्रति संवेदनशीलता का भाव विकसित करें। पोला अंततः उस किसान की मुस्कान का पर्व है, जिसने मिट्टी में पसीना बहाकर अन्न उगाया और उस बैल के सम्मान का दिन है, जिसने उसके साथ खेत में कदम से कदम मिलाकर श्रम किया।यह पर्व हमें बताता है कि सभ्यता केवल मनुष्य के परिश्रम से नहीं बनती; उसके पीछे प्रकृति और जीव-जगत का भी उतना ही योगदान है।

भाद्रपद अमावस्या की इस पावन बेला में जब सजे-धजे बैलों के गले की घंटियां बजती हैं, मिट्टी के खिलौनों से बच्चों का आंगन सजता है और घरों में पारंपरिक पकवानों की सुगंध फैलती है, तब छत्तीसगढ़ की माटी मानो यही संदेश देती है – जिसने हमारे जीवन को समृद्ध किया, उसका सम्मान करना ही सच्ची संस्कृति है। यही पोला का सार है, यही इसकी आत्मा है और यही इसे छत्तीसगढ़ के लोकजीवन का एक अमूल्य पर्व बनाता है।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
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