जीवन ही संघर्ष (मेरी आपबीती सूर्यभान सिंह – किसान / पेंटर ,प्रतापगढ़ जसमेंढ़ा )
दोस्तों, जीवन में संघर्ष तो हर किसी के हिस्से में आता है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि कोई परिस्थितियों के सामने हार मान लेता है और कोई उन्हें चुनौती देकर आगे बढ़ता रहता है। हमने अपने जीवन में देखा है कि जब किसी व्यक्ति पर अचानक कोई बड़ा संकट आ जाता है, तो वह कुछ समय तक उससे संघर्ष करता है। लेकिन कई बार परिस्थितियों की मार से टूटकर वह निराशा, अवसाद और हताशा का शिकार हो जाता है। कोई रोने लगता है तो कोई जीवन समाप्त करने जैसे विचारों तक पहुंच जाता है।

लेकिन मेरा मानना है कि आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें संघर्ष का रास्ता कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यदि इंसान सच्चे मन से प्रयास करता रहे और हिम्मत बनाए रखे, तो एक न एक दिन परिस्थितियां अवश्य बदलती हैं। शायद तभी कहा गया है कि जब मनुष्य अपने संघर्ष की अंतिम सीमा तक पहुंचता है, तब ईश्वर भी उसकी सहायता के लिए कोई न कोई मार्ग खोल देता है। यह केवल मेरा विचार नहीं, बल्कि मेरे अपने जीवन का अनुभव है।
पंजाब से फरीदाबाद तक का सफर
बात वर्ष 1991 की है। मैं रोजगार की तलाश में पंजाब में अपने बहनोई के पास गया था। वहां एक प्लाईवुड फैक्ट्री में काम करने लगा, लेकिन कुछ समय बाद मुझे वह काम और वातावरण अनुकूल नहीं लगा।
अंततः मैंने वहां से निकलने का निर्णय लिया और बिना किसी को बताए फरीदाबाद चला आया। मैं पहले भी लगभग एक वर्ष फरीदाबाद में रह चुका था, इसलिए वहां कुछ लोग मुझे जानते-पहचानते थे। फरीदाबाद पहुंचने के बाद असली संघर्ष शुरू हुआ। लगातार तीन दिनों तक नौकरी की तलाश करता रहा, लेकिन कोई काम नहीं मिला। उन दिनों मेरे परिचितों ने ही मुझे भोजन कराया। चौथे दिन आखिरकार मुझे एक गत्ते की कंपनी में नौकरी मिल गई। नौकरी तो मिल गई, लेकिन अब जीवन की दूसरी और अधिक कठिन परीक्षा शुरू होने वाली थी।
जेब में सिर्फ चालीस रुपये
उस समय मेरे पास कुल चालीस रुपये बचे थे। इन्हीं चालीस रुपयों में मुझे लगभग एक माह और सात दिन तक अपना जीवन चलाना था। मेरे पास न रहने के लिए अपना कमरा था, न खाना बनाने के लिए बर्तन, न राशन और न ही कोई अन्य सुविधा। ऊपर से दिसंबर का महीना था और कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। मेरे पास न बिस्तर था और न ही ठंड से बचने के लिए पर्याप्त कपड़े। शाम को मैं बाजार गया और वहां खाने की कोई सस्ती व्यवस्था तलाशने लगा। उस समय गाजर मात्र दो रुपये किलो मिल रही थी। मैंने एक किलो गाजर खरीदी और वापस आ गया। रहने की समस्या भी सामने थी। मैंने एक परिचित युवक से अनुरोध किया कि वह मुझे कुछ दिनों के लिए अपने कमरे में रहने दे। वह तैयार हो गया, लेकिन उसकी एक शर्त थी। उसने कहा,“चारपाई पर मैं सोऊंगा और आपको जमीन पर सोना होगा।” मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। मैंने तुरंत उसकी शर्त स्वीकार कर ली।

गीली जमीन और कड़ाके की ठंड
कमरे की जमीन इतनी गीली थी कि उंगली दबाने पर मिट्टी में धंस जाती थी। मेरे पास केवल एक बहुत हल्का कंबल था। किसी ने बिछाने के लिए मुझे एक लूंगी दे दी थी। रात को मैं चारपाई के नीचे जमीन पर लूंगी बिछाकर लेट गया। भोजन के नाम पर कुछ गाजर खाई और सोने का प्रयास किया। मुश्किल से दो घंटे की नींद आई होगी। उसके बाद पूरी रात दिसंबर की कड़ाके की ठंड में कांपते हुए गुजारी। सुबह होते ही नहा-धोकर गाजर खाते हुए कंपनी के लिए निकल जाता। यह सिलसिला एक-दो दिन नहीं, बल्कि लगभग बीस से पच्चीस दिनों तक चलता रहा। उन दिनों गाजर के अलावा अन्न का एक दाना भी मेरे मुंह में नहीं गया था। रात में मुश्किल से दो घंटे सो पाता और शेष समय ठंड से कांपते हुए बीतता था।
लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी।
जब एक दुकानदार ने भरोसा किया
लगभग पच्चीस दिन बीतने के बाद मैं एक राशन की दुकान पर गया। मैंने दुकानदार को अपनी पूरी स्थिति बताई और उससे उधार राशन देने का अनुरोध किया।
शायद मेरी बातों में सच्चाई थी और आंखों में संघर्ष।
उस दुकानदार ने मुझ पर विश्वास किया और मुझे पांच किलो आटा उधार दे दिया। आटा तो मिल गया, लेकिन अब एक नई समस्या सामने खड़ी थी, रोटी बनाने के लिए मेरे पास न तवा था और न ही स्टोव। मैंने फिर उसी युवक से अनुरोध किया कि वह मुझे अपने तवे और स्टोव का उपयोग करने दे। उसने इस बार भी मेरी मदद की। अब मैं अपने लिए रोटियां बनाने लगा। खाने के लिए कुछ नहीं होता था, इसलिए अक्सर सूखी रोटियां ही खा लेता था।
सूखी रोटी और पड़ोसी की संवेदना
एक दिन पड़ोस में रहने वाले एक युवक ने मुझे सूखी रोटी खाते हुए देख लिया। शायद उसे मेरी स्थिति का अंदाजा हो गया। उसने अपने घर से मेरे लिए टमाटर और नमक लाकर दिया। उस दिन मेरे लिए वह टमाटर और नमक किसी स्वादिष्ट भोजन से कम नहीं था। मैं रोटी के साथ टमाटर और नमक खाकर संतुष्ट होने लगा। जीवन का वह समय कठिन अवश्य था, लेकिन उसने मुझे सिखाया कि इंसानियत आज भी जीवित है। संकट की घड़ी में कई बार अपने नहीं, बल्कि अनजान लोग भी देवदूत बनकर सामने आ जाते हैं।
आखिरकार संघर्ष का वह दौर बीता
धीरे-धीरे वह दिन भी आ गया, जिसका मैं बेसब्री से इंतजार कर रहा था, वेतन मिलने का दिन। लगभग एक माह और सात दिन तक अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताने के बाद आखिरकार शाम को मुझे कंपनी से अपना वेतन मिला। वह वेतन मेरे लिए केवल कुछ रुपये नहीं था, बल्कि मेरे संघर्ष की पहली जीत थी। अगले दिन मैंने कंपनी से छुट्टी ली और अपने लिए आवश्यक बर्तन, एक स्टोव तथा ओढ़ने-बिछाने के लिए कुछ कपड़ों की व्यवस्था की। संघर्ष का वह दौर समाप्त हो गया, लेकिन उसने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया।
मैंने हार नहीं मानी
उस कठिन दौर में मैंने कभी रोकर परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। मैंने कभी अपने जीवन को समाप्त करने का विचार नहीं किया। मेरे मन में केवल एक ही बात थी –
“जीवन ही संघर्ष है और संघर्ष करते रहना ही जीवन है।”
आज जब पीछे मुड़कर उस दौर को देखता हूं तो लगता है कि यदि उस समय मैंने हिम्मत हार दी होती, तो शायद जीवन की आगे की यात्रा पूरी नहीं कर पाता। जीवन में दुख आते हैं, परेशानियां आती हैं और कभी-कभी परिस्थितियां हमारी परीक्षा लेने लगती हैं। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि कोई भी समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। हिम्मत मत हारिए, धैर्य मत छोड़िए और संघर्ष का रास्ता कभी मत छोड़िए। कहा भी गया है – “हिम्मत न हारिए, बिसारिए न राम, विपदा में भी संघर्ष ही देता है जीवन को नया मुकाम।”जो व्यक्ति दुखों से लड़ना सीख जाता है, वह एक दिन सुख का वास्तविक मूल्य भी समझ जाता है। कठिनाइयां हमें तोड़ने नहीं, बल्कि मजबूत बनाने आती हैं। यह मेरे जीवन के संघर्षों की केवल एक छोटी-सी कहानी है। इसके आगे भी जीवन में अनेक कठिन दौर आए, जिन्हें मैंने अपने परिवार के साथ मिलकर जिया और पार किया।
शायद यही जीवन है, संघर्षों से भरा हुआ, लेकिन हर संघर्ष के बाद एक नई सुबह और एक नई उम्मीद देने वाला। संघर्ष करते रहिए, क्योंकि अंधेरी रात कितनी भी लंबी हो, उसके बाद सुबह अवश्य होती है।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस