डॉ. घनश्याम सिंह महाविद्यालय में अष्ट दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम का समापन, ‘संस्कृति से सृजन तक’ कवि सम्मेलन ने बांधा समां
वाराणसी। भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संदर्भों से जोड़ते हुए नई पीढ़ी के लिए अधिक प्रासंगिक बनाने की आवश्यकता पर विशेषज्ञों ने जोर दिया। यह विचार डॉ. घनश्याम सिंह महाविद्यालय, सोयेपुर, लालपुर, वाराणसी में आयोजित अष्ट दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम के दौरान सामने आया। “संस्कृति से संवाद : भारतीय प्रज्ञा और वैश्विक भविष्य” विषय पर आयोजित कार्यक्रम का समापन विभिन्न शैक्षिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ हुआ।
कार्यक्रम के दौरान भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध पक्षों के साथ-साथ वर्तमान समय की चुनौतियों पर भी व्यापक विमर्श किया गया। प्रथम दिवस केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ के कुलपति प्रो. वांगचुक दोरजी नेगी ने बौद्ध धर्म की श्रवण परंपरा और भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्संबंधों पर विचार व्यक्त किए। प्रो. सदानंद शाही ने भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक चेतना के विभिन्न आयामों को रेखांकित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. राम सुधार सिंह ने की।

आठ दिवसीय कार्यक्रम में रामायण, महाभारत एवं श्रीमद्भगवद्गीता, वेद-उपनिषद एवं वेदान्त, GEN Z और भारतीय संस्कृति, कौटिल्य से सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था तथा सांस्कृतिक विरासत, पर्यटन और भारतीय भू-दृष्टि जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने व्याख्यान दिए। इस दौरान प्रो. धर्मदत्त चतुर्वेदी, डॉ. मुदित पांडे, डॉ. विपुल कुमार शुक्ला, प्रो. अजय कुमार सिंह, प्रो. आशुतोष गुप्ता, डॉ. सोमू सिंह, प्रो. मीरा सिंह, प्रो. आर. पी. द्विवेदी और डॉ. अनिल कुमार सिंह सहित विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम में भारतीय दर्शन और नैतिकता के साथ कर्तव्य-बोध, युवा पीढ़ी और डिजिटल संस्कृति, सुशासन, सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था, रोजगार एवं उद्यमिता, सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरण संरक्षण तथा सतत विकास जैसे समकालीन विषयों को भी चर्चा के केंद्र में रखा गया। शिक्षाशास्त्र संकायाध्यक्ष डॉ. रचना पांडे ने प्रकृति संरक्षण एवं सतत विकास से जुड़े प्रयासों पर प्रकाश डाला।
समापन अवसर पर महाविद्यालय के वाणिज्य विभागाध्यक्ष डॉ. संदीप राय ने आठों दिनों की गतिविधियों और प्रमुख निष्कर्षों का पुनरावलोकन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को अतीत तक सीमित रखने के बजाय वर्तमान चुनौतियों और वैश्विक भविष्य के संदर्भ में समझना और आगे बढ़ाना रहा।
समापन समारोह में “संस्कृति से सृजन तक” विषयक कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया। इसमें उमेश प्रसाद, रंजीता सिंह, विभा शुक्ला, हरिनाथ शुक्ल, शिवांगी गोयल, पूजा कुमारी, नताशा, मनीष यादव एवं अंकुर विनोद ने काव्य-पाठ किया।
कार्यक्रम के समापन पर यह संदेश प्रमुखता से उभरा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक परिवेश में नई दृष्टि, चिंतन और सृजन की संभावनाओं को विकसित करने वाली जीवंत बौद्धिक परंपरा है। एवीके न्यूज सर्विस