NEW English Version

विरोधाभासी चरित्र से अमेरिका पर भरोसा कठघरे में

दुनिया की महाशक्ति होने का अर्थ यह नहीं कि कोई राष्ट्र अपनी ताकत के मद में चूर होकर पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाने लगे। शक्ति का वास्तविक मूल्य उसकी जिम्मेदारी, न्यायप्रियता और विश्वसनीयता से निर्धारित होता है, न कि इस बात से कि वह कितने देशों को धमका सकता है। दुर्भाग्य से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों में शक्ति के साथ-साथ मनमानी का जो प्रदर्शन दिखाई दे रहा है, उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है-क्या विश्व व्यवस्था नियमों और सिद्धांतों से चलेगी अथवा शक्तिशाली राष्ट्रों की, मनमानी, सुविधाओं और स्वार्थों से? रूस से डीजल खरीदने के ट्रंप के ताजा फैसले ने इस प्रश्न को और प्रासंगिक बना दिया है। 9 अक्टूबर 2026 को ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत के बाद घोषणा की कि रूस अमेरिकी और वैश्विक बाजारों के लिए तत्काल तीन लाख टन से अधिक डीजल उपलब्ध कराएगा। इसके बाद नवंबर में पांच लाख टन और आगे दस लाख टन की आपूर्ति की भी घोषणा की गई। अमेरिकी प्रशासन ने रूसी डीजल के आयात पर प्रतिबंधों में अस्थायी छूट भी दी। इस घटनाक्रम की पुष्टि अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों ने की है।

विडंबना देखिए कि यही अमेरिका कुछ समय पहले रूस से तेल खरीदने वाले देशों को कठघरे में खड़ा कर रहा था। भारत पर रूसी तेल खरीदने के कारण 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने का निर्णय लिया गया था और रूस के ऊर्जा व्यापार से जुड़े देशों पर और कठोर शुल्क लगाने की व्यवस्था भी सामने आई। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित लिंडसे ओ. ग्राहम सैनसिटोनिंग रसिया एण्ड ईरान ऐक्ट ऑफ 2026 ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की संभावनाओं को कानूनी आधार दिया। अब वही अमेरिका अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों और बढ़ती कीमतों के दबाव में रूसी डीजल के लिए रास्ता खोल रहा है। प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका को अपनी जनता के हित में ईंधन खरीदना चाहिए या नहीं। प्रत्येक संप्रभु राष्ट्र को अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने का अधिकार है। प्रश्न यह है कि जिस निर्णय को भारत जैसे देशों के लिए नैतिक अपराध और रूस की युद्ध मशीनरी को आर्थिक सहायता देने वाला कदम बताया गया, वही निर्णय अमेरिका के लिए राष्ट्रीय आवश्यकता कैसे बन गया? क्या नैतिकता की परिभाषा राष्ट्र की सीमा बदलते ही बदल जाती है? क्या अंतरराष्ट्रीय नियम केवल कमजोर और कम शक्तिशाली देशों के लिए हैं?

अमेरिका की इस नीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि वह रूस से होने वाली ऊर्जा खरीद को यूक्रेन युद्ध के वित्तपोषण से जोड़कर देखता रहा है, लेकिन जब अपने देश में डीजल की कीमतें बढ़ीं और किसानों, ट्रक चालकों तथा उपभोक्ताओं पर आर्थिक दबाव बढ़ा, तो उसी रूस से आपूर्ति लेने का निर्णय कर लिया। रॉयटर्स के अनुसार, अमेरिका में डीजल की कीमत 8 अक्टूबर को लगभग 6.28 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई थी। तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले बढ़ती कीमतें ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती बन गई हैं। यहां अमेरिकी राष्ट्रपति की प्राथमिकताओं का अंतर साफ दिखाई देता है। जब भारत अपनी अर्थव्यवस्था, करोड़ों उपभोक्ताओं और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर रूसी तेल खरीदता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है। लेकिन जब अमेरिकी मतदाता महंगे ईंधन से परेशान होते हैं, तब वही नैतिकता पीछे छूट जाती है और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हो जाता है। यह कैसी नीति है, जिसमें दूसरों के लिए सिद्धांत और अपने लिए सुविधानुसार अपवाद निर्धारित किए जाते हैं? दूसरों को उपदेश देना आसान है, लेकिन अपने आचरण को उन्हीं कसौटियों पर कसना कठिन।

हिंदी की एक लोकोक्ति है-‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे।’ अमेरिका की मौजूदा नीति पर यह कहावत सटीक बैठती है। जो देश पूरी दुनिया को नियमों के पालन की सीख देता है, उसे सबसे पहले अपने व्यवहार में निरंतरता और पारदर्शिता दिखानी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोहरे मापदंड केवल विरोधियों को मजबूत नहीं करते, बल्कि मित्र देशों के विश्वास को भी कमजोर कर देते हैं। भारत के संदर्भ में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित पेट्रोलियम पर निर्भर रहकर पूरा करता है। ऐसे में तेल की खरीद केवल व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, महंगाई, परिवहन, कृषि, उद्योग और आम नागरिक के जीवन से जुड़ा प्रश्न है। वैश्विक बाजार में तेल महंगा होता है तो उसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों से लेकर खाद्य पदार्थों और माल ढुलाई तक दिखाई देता है। इसलिए भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ है कि उसे उपलब्धता, कीमत, आपूर्ति की स्थिरता और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले।

किसी महाशक्ति के दबाव में आकर अपने आर्थिक हितों की अनदेखी करना न तो व्यावहारिक होगा और न ही दूरदर्शितापूर्ण। यह भी समझना जरूरी है कि रूस से तेल खरीदने का समर्थन करने का अर्थ यूक्रेन में जारी युद्ध का समर्थन करना नहीं है। इसी प्रकार ऊर्जा व्यापार पर प्रतिबंध लगाने की आलोचना का अर्थ किसी देश की सैन्य कार्रवाई का बचाव करना भी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इन दोनों प्रश्नों को अलग-अलग समझना चाहिए। युद्ध को समाप्त करने, संप्रभुता की रक्षा करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास आवश्यक हैं, लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों की प्रभावशीलता और उनके मानदंडों पर भी निष्पक्ष विचार होना चाहिए। यदि किसी देश की ऊर्जा खरीद को युद्ध के वित्तपोषण से जोड़कर देखा जाता है, तो यही कसौटी सभी देशों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। केवल विरोधी या कमजोर देश पर प्रतिबंध लगाना और अपने संकट के समय उसी स्रोत से आपूर्ति लेना उस नैतिक आधार को कमजोर करता है, जिस पर प्रतिबंधों को उचित ठहराया जाता है।

ट्रंप के फैसले ने यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की नाराजगी भी बढ़ाई है। जेलेंस्की ने इस कदम को रूस के लिए लाभकारी बताते हुए चिंता जताई कि इससे पुतिन को युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक संसाधन मिल सकते हैं। अमेरिकी सांसदों में भी इस निर्णय की आलोचना हुई है। ट्रंप का इसके बाद जेलेंस्की को यूक्रेन का नेतृत्व बदलने की सलाह देना मामले को और गंभीर बनाता है। किसी संप्रभु देश का राष्ट्रपति कौन होगा, यह निर्णय उस देश के नागरिकों और उसकी संवैधानिक व्यवस्था का विषय है। यदि अमेरिका स्वयं को लोकतंत्र और स्वतंत्रता का समर्थक बताता है, तो उसे दूसरे देश की राजनीतिक संप्रभुता का सम्मान भी करना चाहिए। शांति की पहल का स्वागत होना चाहिए, लेकिन शांति के नाम पर युद्ध से पीड़ित देश पर ही असंगत दबाव डालना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

वास्तव में इस घटनाक्रम से दुनिया के सामने एक बड़ा सबक उभरता है। महाशक्ति होना और विश्वसनीय शक्ति होना दो अलग-अलग बातें हैं। पहली ताकत आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक संसाधनों से मिलती है, दूसरी निष्पक्षता, वचनबद्धता और जिम्मेदार आचरण से अर्जित होती है। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे प्रभावशाली अर्थव्यवस्थाओं और शक्तिशाली संस्थाओं में से एक होने का गौरव है, लेकिन उसकी नीतियों में बार-बार होने वाले असंगत बदलाव उसके नेतृत्व की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ की कहावत यहां केवल किसी व्यक्ति पर लागू नहीं होती, बल्कि राष्ट्रों की नीतियों पर भी लागू होती है। यदि अमेरिका अपने आर्थिक हितों के लिए प्रतिबंधों में छूट दे सकता है, तो उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि दूसरे देशों को भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार है। यदि उसे रूसी डीजल खरीदने की छूट उचित लगती है, तो भारत जैसे देशों की जरूरतों को भी उसी निष्पक्ष दृष्टि से देखने की अपेक्षा स्वाभाविक है।

भारत को भी इस घटनाक्रम से सबक लेते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता को और मजबूत करना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में न अंधविरोध उचित है, न अंधसमर्थन, आवश्यक है कि प्रत्येक निर्णय का मूल्यांकन राष्ट्रीय हित, वैश्विक शांति और समान मानदंडों के आधार पर किया जाए। सच यही है कि ताकत से दुनिया को कुछ समय के लिए झुकाया जा सकता है, लेकिन भरोसा केवल न्यायपूर्ण आचरण से जीता जा सकता है। अमेरिका के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि अपनी विश्वसनीयता को बचाना है। क्योंकि इतिहास में राष्ट्रों की पहचान केवल उनकी ताकत से नहीं, बल्कि इस बात से भी होती है कि उन्होंने अपनी ताकत का इस्तेमाल कितनी ईमानदारी और जिम्मेदारी से किया।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »