अधेड़ उम्र की ख्वाहिशों से भरी एक संवेदनशील कविता, जो रिश्तों, उपेक्षा और आत्मसम्मान की पुकार…
Category: कविता
पढ़ना चाहती हूं
पढ़ना चाहती हूं जीवन गढ़ना चाहती हूं। अम्मा! पढ़ना चाहती हूं।। पग-बंधन बेड़ी तोड़कर, हरपल बढ़ना…
फागुन के रंग, पिया संग: भावना ‘मिलन’
फागुन के रंग संग पिया का प्यार! होली के रंगों में भीगी प्रीत भरी पलों की…
महंगाई की पिचकारी से फीकी होली के रंग!
महंगाई की मार में होली के रंग भी फीके! इस कविता में पढ़ें कैसे बढ़ती कीमतों…
प्यासे खेत प्रश्न करें
प्यासे खेत, मौन महारथी, जलती शमा—यह कविता सत्ता, अन्याय और सामाजिक विषमताओं पर करारा प्रहार करती…
बांट रहे समाज को
समाज बंट रहा, संकट में धैर्यवान माताएं, जल-जंगल संकट, गंगा-यमुना मैली, पर स्वच्छता के वीर भी…