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कश्मीर में आतंक नहीं, शांति का उजाला हो

कश्मीर

कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। यहां के बर्फ से ढके पहाड़ और खूबसूरत झीलें पर्यटकों आकर्षित करती हैं। कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता की वजह से इसे भारत का स्विटजरलैंड भी कहा जाता है। इसी कारण यहां हर साल हजारों की संख्या में भारतीय और विदेशी पर्यटक आते हैं। हर किसी का सपना होता है कि वह चारों तरफ से खूबसूरत वादियों से घिरा हुआ जम्मू-कश्मीर की सुंदरता को एक बार तो जरूर देखें। यहां की बर्फीली पहाड़ियां, शांत वातावरण और खूबसूरत नजारे इस वादी की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं, यहां का मौसम साल भर सुहावना बना रहता है। यहां का शांत वातावरण, हरा-भरा पहाड़ी परिदृश्य, वनस्पतियां, झील और नदी इस वैली को जन्नत बनाने का काम करती हैं। प्रकृति की असल खूबसूरती आप यहां आकर देख सकते हैं। प्रदूषण रहित यह स्थल आपको आत्मिक और मानसिक शांति का अनुभव कराएगा। लेकिन इन शांत एवं खूबसूरत वादियों में पडोसी देश पाकिस्तान एवं तथाकथित उन्मादी तत्व आतंक की घटनाओं को अंजाम देकर अशांति फैलाते रहते हैं।
ऐसे ही जम्मू-कश्मीर के पुंछ इलाके में एक आतंकी हमले के बाद सेना के वाहन में आग लगने से पांच जवान शहीद हो गए, जबकि एक अन्य गंभीर रूप से घायल हो गया। नागरोटा में तैनात सेना की 16वीं कोर ने शहीद हुए सैनिकों की पहचान हवलदार मंदीप सिंह, लांसनायक देबाशीश बस्वाल, लांसनायक कुलवंत सिंह, सिपाही हरकृष्ण सिंह और सिपाही सेवक सिंह के रूप में बताई है। शहीद हुए पांच सैनिकों में से चार पंजाब के और एक ओडिशा का रहने वाला था। देबाशीश बस्वाल ओडिशा के अलगुम सामिल खंडायत के निवासी थे, जबकि मंदीप सिंह पंजाब के चानकोईयां काकन गांव के, हरकृष्ण सिंह तलवंडी बारथ गांव के, कुलवंत सिंह चारिक के और सेवक सिंह वाघा के रहने वाले थे। सूत्रों ने बताया कि अधिकारियों ने वाहन पर गोलियों के निशान देखे हैं और वहां से ग्रेनेड के टुकड़े बरामद हुए हैं, जिससे इसके आतंकी हमला होने की पुष्टि हुई है।
लम्बे समय की शांति, अमन-चैन एवं खुशहाली के बाद एक बार फिर कश्मीर में अशांति एवं आतंक के बादल मंडराये हैं। धरती के स्वर्ग की आभा पर लगे ग्रहण के बादल छंटने लगे थे कि एक बार फिर कश्मीर के पुंछ इलाके में हुए इस आतंकी हमले की जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि इसे जम्मू-कश्मीर में जी-20 सम्मेलन से पहले एक सुनियोजित हमला बताया जा रहा है। यह हमला ऐसे समय में किया गया, जब भारत इस साल जी-20 समिट की अध्यक्षता कर रहा है। इसके तहत लेह में 26 से 28  अप्रैल को और श्रीनगर में 22 से 24 मई को बैठक होनी है। जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में सेना के ट्रक पर हुआ आतंकी हमला इसी माह लेह में और अगले महीने श्रीनगर में होने वाली जी-20 समिट की बैठकों को रद्द कराने की साजिश के तहत किया गया था। मैंने हाल ही अपनी एक सप्ताह की कश्मीर यात्रा में देखा कि केन्द्र सरकार ने कश्मीर में विकास कार्यों को तीव्रता से साकार करने में जुटी है, न केवल विकास की बहुआयामी योजनाएं वहां चल रही है, बल्कि पिछले 8 सालों में कश्मीर में आतंकमुक्त करने में भी बड़ी सफलता मिली है। बीते साढ़े तीन दशक के दौरान कश्मीर का लोकतंत्र कुछ तथाकथित नेताओं का बंधुआ बनकर गया था, जिन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिये जो कश्मीर देश के माथे का ऐसा मुकुट था, जिसे सभी प्यार करते थे, उसे डर, हिंसा, आतंक एवं दहशत का मैदान बना दिया।
तीन दशकों से कश्मीर घाटी दोषी और निर्दाेषी लोगों के खून की हल्दीघाटी बनी रही है। लेकिन वर्ष 2014 के बाद से, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से वहां शांति एवं विकास का अपूर्व वातावरण बना है। केन्द्र सरकार के सामने अब बड़ा लक्ष्य है वहाँ लोगों को बन्दूक से सन्दूक तक एवं आतंक से अमन-चैन तक लाने का, बेशक यह कठिन और पेचीदा काम है लेकिन राष्ट्रीय एकता और निर्माण संबंधी कौन-सा कार्य पेचीदा और कठिन नहीं रहा है? इन कठिन एवं पेचीदा कामों को आसान करना ही तो नरेन्द्र मोदी एवं उनकी सरकार का जादू रहा है। मोदी कश्मीर को जी-20 की बैठक के लिये चुनकर दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि नेतृत्व चाहे तो दुनिया से आतंकवाद को समाप्त किया जा सकता है। इस बैठक में जी-20 सदस्य देशों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में भाग लेंगे।
कश्मीर सहित समूची दुनिया से आतंकवाद को समाप्त करने का नेतृत्व करके मोदी एक और करिश्मा घटित करने को तत्पर है, पंूछ जैसी घटनाएं उनके इरादों को कमजोर नहीं, बल्कि बलशाली ही बनाती है। जिस जगह पर हमला हुआ वहां पर सीमा सड़क संगठन द्वारा एक बोर्ड लगाया गया है जिसमें लिखा है कि हेलमेट लगाकर दोपहिया वाहन चलाए, इस बोर्ड के ऊपर भी गोलियों के निशान बने हुए है। जहां पर हमला हुआ वहां पर एक बहुत बड़ा पत्थर है इस पत्थर की आड़ लेकर भी आतंकियों ने सैन्य वाहन पर गोलीबारी की। आतंकियों ने जिस जगह पर सैन्य वाहन पर हमला किया उस जगह पर सड़क के नीचे से एक पुलियां गुजरती है जिसमें एक नहीं कई लोग आराम से छीप कर बैठ सकते है और यह पुलिस किसी को नजर भी नहीं आती है। सड़क के किनारे पर अभी भी सामान बिखरा हुआ पड़ा है। जबकि सड़क के दोनों तरफ काफी घना जंगल है जिसके अंदर आतंकी सुरक्षित शरण लेकर अपने ठिकानों तक पहुंच सकते हैं।
15 अगस्त 47 के दिन से ही पड़ोसी देश पाकिस्तान एक दिन भी चुप नहीं बैठा, लगातार आतंक की आंधी को पोषित करता रहा, अपनी इन कुचेष्ठाओं के चलते वह कंगाल हो चुका है, आर्थिक बदहाली में कटोरा लेकर दुनिया घूम आया, अब कोई मदद को तैयार नहीं, फिर भी उसकी घरेलू व विदेश नीति ‘कश्मीर’ पर ही आधारित है। कश्मीर सदैव उनकी प्राथमिक सूची में रहा। पाकिस्तान जानता है कि सही क्या है पर उसकी उसमें वृत्ति नहीं है, पाकिस्तान जानता है कि गलत क्या है पर उससे उसकी निवृत्ति नहीं है। कश्मीर को अशांत करने का कोई मौका वह खोना नहीं चाहता। आज के दौर में उठने वाले सवालों में ज्यादातर का जवाब केंद्र सरकार को ही देना है, उसने सटीक जबाव देकर आतंकियों के मनसूंबों को ढे़र किया है, पडोसी देश की गर्दन को मरोड़ा भी है। यह बात भी सही है कि इस मसले को दलगत राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। ऐसे वक्त में जब कश्मीर में लोकतांत्रिक तरीके से सरकार बनाने की तैयारियां चल रही हों, वहां शांति स्थापित करना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए।
अब कश्मीर में आतंक का अंधेरा नहीं, शांति का उजाला होना ही चाहिए। आए दिन की हिंसक घटनाएं आम नागरिकों में भय का माहौल ही बनाती हैं। माना कि रोग पुराना है, लेकिन ठोस प्रयासों के जरिए इसकी जड़ का इलाज होना ही चाहिए। इनमें अपनी सुरक्षा के प्रति भरोसा जगाना सरकार की पहली जिम्मेदारी है। घाटी में सक्रिय आतंकियों के खात्मे में सुरक्षा तंत्र ने काफी कामयाबियां हासिल की हैं। अब जरूरत है खुफिया तंत्र को दूसरी तरह की चुनौतियों का सामना करने को तैयार एवं सक्षम किया जाये। आतंकी संगठनों में नए भर्ती हुए युवाओं और उनके मददगारों की शिनाख्त जरूरी है, ताकि लक्षित हत्याओं के उनके इरादों को पहले ही नाकाम किया जा सके। घाटी में हालात सुधरने के केंद्र सरकार के दावों की सत्यता इसी से परखी जाएगी कि घाटी में अल्पसंख्यक पंडित और प्रवासी कामगार खुद को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं। वास्तव में देखा जाये तो असली लड़ाई कश्मीर में बन्दूक और सन्दूक की है, आतंकवाद और लोकतंत्र की है, अलगाववाद और एकता की है, पाकिस्तान और भारत की है। शांति का अग्रदूत बन रहा भारत एक बार फिर युद्ध के जंग की बजाय शांति प्रयासों एवं कूटनीति से पाकिस्तान को उसकी औकात दिखाये, यह अपेक्षित है।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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