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महिला विकास के बन्द दरवाजों को खोलने का समय

-महिला समानता दिवस-26 अगस्त, 2023-

महिला समानता दिवस 26 अगस्त को मनाया जाता है। सन 1920 में इस दिन संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में 19वां संशोधन स्वीकार किया गया था। यह दिन महिलाओं को पुरुषों के समान मानने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। न्यूजीलैंड विश्व का पहला देश है, जिसने 1893 में महिला समानता की शुरुआत की। महिलाओं को समानता का दर्जा दिलाने के लिए लगातार संघर्ष करने वाली एक महिला वकील बेल्ला अब्जुग के प्रयास से 1971 से 26 अगस्त को ‘महिला समानता दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। इस वर्ष महिला समानता दिवस की थीम समानता को गले लगाओ है। यह थीम 2021-26 की रणनीतिक योजना का हिस्सा बनी हुई है। यह थीम लैंगिक समानता हासिल करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है, जो न केवल आर्थिक विकास के लिए बल्कि मौलिक मानवाधिकारों के लिए भी आवश्यक है।

भारत में महिलाओं की उपेक्षा, भेदभाव, अत्याचार एवं असमानता के कारण कई महिला संगठन महिला समानता दिवस को जोर शोर से मनाते हैं। इसके साथ ही वो रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं को समान अधिकार दिलाने की पुरजोर वकालत करते हैं। भारत ने महिलाओं को आजादी के बाद से ही मतदान का अधिकार पुरुषों के बराबर दिया, परन्तु यदि वास्तविक समानता की बात करें तो भारत में आजादी के अमृतकाल में महिलाओं की स्थिति चिन्ताजनक एवं विसंगतिपूर्ण है। ‘आज कई महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं।’ यह एक ऐसा कथन है जिसे इस प्रकार संशोधित किया जाना चाहिए कि ‘अभी भी ऐसी महिलाएं हैं जो आर्थिक रूप से परिवार के पुरुष सदस्यों पर निर्भर हैं।’

जैसाकि भारत के कई हिस्सों में इसे आदर्श माना जाता है कि ‘महिलाओं को घर पर रहना चाहिए और परिवार की देखभाल करनी चाहिए, लेकिन अब कई युवा लड़कियों और महिलाओं पर वित्तीय निर्भरता का बोझ डाला जाने लगा है। लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में काम करते एवं अपने प्रतिभा एवं क्षमता का लोहा मनवाते हुए भी महिलाएं वेतन आदि में भेदभाव की शिकार है, जैसाकि 2019 में ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि काम पर पुरुष समकक्षों की तुलना में महिलाओं को 34 प्रतिशत कम वेतन मिलता है। चूँकि आर्थिक व्यवस्था पुरुषों के प्रति अत्यधिक समर्पित है, हमें इस तथ्य का समर्थन करने के लिए कई उदाहरण मिलते हैं कि महिलाओं का संघर्ष रूढ़िवादिता को तोड़ने के लिए जारी है।

यूं तो महिलाओं की असमानता को लेकर ऐसे कई सवाल हैं, लेकिन कई महिलाओं ने बाधाओं को तोड़कर इतिहास रचा है। जैसा कि हम इतिहास में महिलाओं के बारे में बात करते हैं, रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, कमला नेहरू, बेगम हजरत महल, मातंगिनी हाजरा और कई अन्य महान नाम हैं जिनके योगदान को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भुलाया नहीं जा सकता है। दुनिया भर में कुछ संस्कृतियां हैं जो मातृसत्तात्मक संस्कृति को बल देती हैं। जैसे द मोसुओ, एक चीनी जातीय अल्पसंख्यक समुदाय जिसे ‘महिलाओं का साम्राज्य’ भी कहा जाता है।

निश्चित ही महिलाएं ही समस्त मानव प्रजाति की धुरी हैं। वो न केवल बच्चे को जन्म देती हैं बल्कि उनका भरण-पोषण और उन्हें संस्कार भी देती हैं। महिलाएं अपने जीवन में एक साथ कई भूमिकाएं जैसे- मां, पत्नी, बहन, शिक्षक, दोस्त बहुत ही खूबसूरती के साथ निभाती हैं। बावजूद क्या कारण है कि आज हमें महिला समानता दिवस मनाये जाने की आवश्यकता है। महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये जरूरी है कि अधिक महिलाओं को रोजगार दिलाने के लिए भारत सरकार को जरूरी कदम उठाने होंगे।

सरकार को अपनी लैंगिकवादी सोच को छोड़ना पड़ेगा। भारत सरकार के खुद के कर्मचारियों में केवल 11 प्रतिशत महिलाएं हैं। सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिये अधिक एवं नये अवसर सामने आने जरूरी है। क्योंकि देश में ऐसी महिलाएं नजर आती हैं, जो सभी प्रकार के भेदभाव के बावजूद प्रत्येक क्षेत्र में एक मुकाम हासिल कर चुकी हैं और सभी उन पर गर्व भी महसूस करते हैं। परन्तु इस कतार में उन सभी महिलाओं को भी शामिल करने की जरूरत है, जो हर दिन अपने घर में और समाज में महिला होने के कारण असमानता, अत्याचार एवं उपेक्षा को झेलने के लिए विवश है। चाहे वह घर में बेटी, पत्नी, माँ या बहन होने के नाते हो या समाज में एक लड़की होने के नाते हो। आये दिन समाचार पत्रों में लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी खबरों को पढ़ा जा सकता है, परन्तु इन सभी के बीच वे महिलाएं जो अपने ही घर में सिर्फ इसीलिए प्रताड़ित हो रही हैं, क्योंकि वह एक औरत है।

सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) नाम के थिंक टैंक ने बताया है कि भारत में केवल 7 प्रतिशत शहरी महिलाएं ऐसी हैं, जिनके पास रोजगार है या वे उसकी तलाश कर रही हैं। सीएमआईई के मुताबिक, महिलाओं को रोजगार देने के मामले में हमारा देश इंडोनेशिया और सऊदी अरब से भी पीछे है। रोजगार या नौकरी का जो क्षेत्र स्त्रियों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा जरिया रहा है, उसमें इनकी भागीदारी का अनुपात बेहद चिंताजनक हालात में पहुंच चुका है। यांे जब भी किसी देश या समाज में अचानक या सुनियोेजित उथल-पुथल होती है, कोई आपदा, युद्ध एवं राजनीतिक या मनुष्यजनित समस्या खड़ी होती है तो उसका सबसे ज्यादा नकारात्मक असर स्त्रियों पर पड़ता है और उन्हें ही इसका खामियाजा उठाना पड़ता है।
दावोस में हुए वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम में ऑक्सफैम ने अपनी एक रिपोर्ट ‘टाइम टू केयर’ में घरेलू औरतों की आर्थिक स्थितियों का खुलासा करते हुए दुनिया को चौका दिया था।

वे महिलाएं जो अपने घर को संभालती हैं, परिवार का ख्याल रखती हैं, वह सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक अनगिनत सबसे मुश्किल कामों को करती है। अगर हम यह कहें कि घर संभालना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है तो शायद गलत नहीं होगा। दुनिया में सिर्फ यही एक ऐसा पेशा है, जिसमें 24 घंटे, सातों दिन आप काम पर रहते हैं, हर रोज क्राइसिस झेलते हैं, हर डेडलाइन को पूरा करते हैं और वह भी बिना छुट्टी के। सोचिए, इतने सारे कार्य-संपादन के बदले में वह कोई वेतन नहीं लेती। उसके परिश्रम को सामान्यतः घर का नियमित काम-काज कहकर विशेष महत्व नहीं दिया जाता। साथ ही उसके इस काम को राष्ट्र की उन्नति में योगभूत होने की संज्ञा भी नहीं मिलती। प्रश्न है कि घरेलू कामकाजी महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्यांकन क्यों नहीं किया जाता? घरेलू महिलाओं के  साथ यह दोगला व्यवहार क्यों?

दरअसल, इस तरह के हालात की वजह सामाजिक एवं संकीर्ण सोच रही है। पितृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था में आमतौर पर सत्ता के केंद्र पुरुष रहे और श्रम और संसाधनों के बंटवारे में स्त्रियों को हाशिये पर रखा गया है। सदियों पहले इस तरह की परंपरा विकसित हुई, लेकिन अफसोस इस बात पर है कि आज जब दुनिया अपने आधुनिक और सभ्य होने का दावा कर रही है, भारत में नरेन्द्र मोदी सरकार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने एवं उसके आत्म-सम्मान के लिये तत्पर है। एक बड़ा प्रश्न है कि आखिर कब तक सभी वंचनाओं, महामारियों एवं राष्ट्र-संकटों  की गाज स्त्रियों पर गिरती रहेगी।

जहां देश में राष्ट्रपति के पद पर द्रौपदी मुर्मू विराजित है, पूर्व में प्रधानमंत्री के पद पर इंदिरा गांधी, राष्ट्रपति के पद पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल एवं अनेक दलों में महिला नेतृत्व है। वर्तमान में स्मृति ईरानी एवं निर्मला सीतारमण सहित अनेक महिलाओं ने राजनीति में अपनी छाप छोड़ रही है।  इन कुछ उपलब्धियों के बाद भी देखें तो आज भी महिलाओं की कामयाबी आधी-अधूरी समानता के कारण कम ही है। न्यायालय की पहल से महिलाएं अब सेना में जा सकेगी। युगों से आत्मविस्मृत महिलाओं को अपनी अस्मिता और कर्तृत्वशक्ति का तो अहसास हुआ ही है, साथ ही उसकी व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व चेतना में क्रांति का ऐसा ज्वालामुखी फूटा है, जिससे भेदभाव, असमानता, रूढ़संस्कार जैसे उन्हें कमतर समझने की मानसिकता पर प्रहार हुआ है। महिला समानता दिवस यदि उनकी सक्षमता को पंख दे रहा है तो यह जागरूक एवं समानतामूलक विश्व-समाज की संरचना का अभ्युदय है।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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