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मातृभाषा, अपनी माँ को नहीं भूलने देती है प्रो रामपूजन पाण्डेय

भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल’। मतलब मातृभाषा की उन्नति बिना किसी भी समाज की तरक्की संभव नहीं है तथा अपनी भाषा के ज्ञान के बिना मन की पीड़ा को दूर करना भी मुश्किल है।  उक्त विचार संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में  “निज भाषा उन्नति है- सब उन्नति को मूल” विषय पर आयोजित हिन्दी दिवस समारोह के अंतर्गत न्याय शास्त्र के उद्भट विद्वान एवं अध्यापक परिषद के अध्यक्ष प्रो रामपूजन  पाण्डेय ने बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किया। अपने समाज की सभ्यता और संस्कृति से हमें अपनी भाषा ही जोड़ती है–

प्रो पाण्डेय ने कहा कि निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल – यह भारतेंदु हरिश्चंद्र का कथन है, जो एक सच्चे हिंदी सेवक और और राष्ट्रवादी चिन्तक, लेखक और कवि थे । भारतेंदु जी ने निज भाषा की उन्नति का नारा ही नहीं दिया, उसे सर्वतोमुखी समृद्ध बनाने का भी प्रयास किया।  उन्होंने हिंदी को अंग्रेजी से टक्कर लेने वाली साहित्यिक भाषा की सामर्थ्य प्रदान की।  मातृभाषा सीखना और इसकी उन्नति करना सभी का कर्तव्य है। मातृभाषा, अपनी माँ को नहीं भूलने देती है,जिसे हम जन्मदात्री भूमि या जन्मभूमि कहते हैं, वह उससे बराबर जुड़ा रहता है। अपने समाज की सभ्यता और संस्कृति से हमें अपनी भाषा ही जोड़ती है। मातृभाषा हमें संस्कार देती है।

हिंदी साहित्य के रूप में समृद्ध भाषा मानी जाती है–

आधुनिक भाषा एवं भाषा विज्ञान के पूर्व संकाय अध्यक्ष प्रो कृष्ण चंद्र दुबे ने बतौर विशिष्ट अतिथि कहा कि हिंदी साहित्य के रूप में समृद्ध भाषा मानी जाती है, और अनेकों साहित्यकार एवं साहित्यिक रचनाएं हिंदी में मिलती है। जिसने समय समय पर एक नया उद्घोष किया है, समाज के सारे परिवेश को परिवर्तित करके क्रांति का बिगुल बजा दिया है। शायद आज इसी का परिणाम यह है कि हमारा देश विश्व गुरु बनने की तरफ अग्रसर हो चुका है और हिंदी संस्कृत यह दोनों भाषा मिलकर विश्व पटल पर अपना परचम अवश्य लहराएंगी और विश्व गुरु बनने से हमारे देश को कोई भी नहीं रोक पाएगा।

बतौर सारस्वत अतिथि प्रो हरिप्रसाद अधिकारी ने कहा कि हिंदी समृद्ध भाषा है, सभी संस्थाओं में कार्य हिंदी में होना चाहिए। तभी हिंदी का विकास सम्भव होगा। अध्यक्षता वेदांत के वरिष्ठ आचार्य प्रो रामकिशोर त्रिपाठी ने कहा कि  हिंदी भाषा हमारी राजभाषा के रूप में आज विश्व पटल पर प्रतिष्ठित है। 14 सितंबर सन् 1949 को हिंदी भाषा के रूप में सारे देशवासियों के द्वारा स्वीकार किया गया। हिंदी एक ऐसी भाषा है, जिसने समय पर समाज में क्रांति का आह्वाहन किया चाहे वह आदिकाल हो, वह भक्ति काल हो  या आधुनिक काल हो चाहे आज का परिवेश हो। आधुनिक काल में हिंदी ने समय-समय पर एक अलख जगाया है, और समाज को परिवर्तित करके समाज की एक नई रूपरेखा तैयार की है। हिंदी भाषा ने सदैव जोड़कर आपसी संपर्क को और सशक्त, समृद्ध किया है।  

विज्ञान विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो जितेन्द्र कुमार ने हिंदी की जब तक हिन्दी राष्ट्र भाषा घोषित नहीं होगी तब तक हिन्दी का विकास पूर्णतः सम्भव नहीं।  प्रो राजनाथ ने कहा कि हम संकल्प के साथ हिंदी को स्वीकार कर सम्मान से प्रयोग करें।  

संकाय अध्यक्ष प्रो हीरक कांत चक्रवर्ती ने हिंदी दिवस के महत्व और विकास पर प्रकाश डालते हुए सभी मंच पर आसीन अतिथियों सहित स्वागत किया।  आधुनिक भाषा एवं भाषा विज्ञान की विभागाध्यक्ष डॉ विद्या कुमारी चंद्रा ने हिंदी दिवस समारोह का संचालन/संयोजन किया।  प्रो हरिप्रसाद अधिकारी, जितेन्द्र कुमार सिंह,प्रो राजनाथ, प्रो हीरक कांत चक्रवर्ती, प्रो दिनेश कुमार गर्ग।  डॉ अनिल कुमार चतुर्वेदी, डॉ सोहन कुमार, डॉ अमित थापा, डॉ शैलेश कुमार, मोहम्मद सलीम। डॉ धर्म प्रकाश मिश्र आदि उपस्थित थे।  

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