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प्यार और इंसानियत रूपी दीयों की कतारे लगायें

दीपावली एक लौकिक पर्व है। यह आत्मज्योति जगाने एवं भीतर की दुनिया को उज्ज्वल बनाने का पर्व है, इसलिये दीपों की कतारे लगाकर केवल बाहरी अंधकार को ही नहीं, बल्कि भीतरी अंधकार को मिटाने के जतन करने होंगे। हम भीतर में धर्म का दीप जलाकर मोह और मूर्च्छा के अंधकार को दूर कर सकते हैं। भीतर की शुद्धि के अपने मायने हैं। लव ऑर एबव की संस्थापक और हीलर क्रिस्टी मैरी शेल्डन कहती हैं, ‘जितना हम अपनी बुरी आदतों की सफाई करते हैं, उतना ही अच्छा महसूस करते हैं। भीतर की अच्छी ऊर्जा का प्रवाह हमारे आसपास पर भी अच्छा असर डालता है।’ इसी सोच के साथ हमें दीपावली को कोरा भौतिक ही नहीं, आध्यात्मिक स्वरूप देना होगा। झोपड़ियों के अंधकार को मिटाने श्रीराम आयेंगे-गीत की पंक्तियों के अनुरूप घर-घर में श्रीराम की प्रतिष्ठा कर दीपावली को अर्थपूर्ण बनाये।

जीवन को अध्यात्म के दीपों से रोशनीमय बनाने के लिये जरूरी है कि हम सबसे अधिक स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार करें। जबकि अक्सर हम अपनी ही अनदेखी करते हैं। ऐसे में कभी-कभी खुद का हाल-चाल पूछना, फालतू विचारों और गिले-शिकवों की रद्दी को हटाकर दिल और दिमाग को हल्का और शांत करना खुद को नई शक्ति से भरपूर करना है। भीतर की शुद्धि का एक मतलब यह भी है कि हम दूसरों को गलत ठहराने की जगह अपनी गलती ढूंढ़ें। उसमें सुधार करें। लेखक एडमंड एमबाइका मानते हैं कि अपनी सफलता और खुशी के लिए केवल हम जिम्मेदार हैं, कोई और नहीं। अपने रोज के सही कामों से हम खुद को ही खुश करते हैं।’ इसलिये दीपावली एक शुरुआत है अच्छे बनने, अच्छा करने एवं अच्छा सोचने की।
दीपावली के मौके पर सभी आमतौर से अपने घरों की साफ-सफाई, साज-सज्जा और उसे संवारने-निखारने का प्रयास करते हैं। उसी प्रकार अगर भीतर चेतना के आँगन पर जमे कर्म के कचरे को बुहारकर साफ किया जाए, उसे संयम से सजाने-संवारने का प्रयास किया जाए और उसमें आत्मा रूपी दीपक की अखंड ज्योति को प्रज्वलित कर दिया जाए तो मनुष्य शाश्वत सुख, शांति एवं आनंद को प्राप्त हो सकता है।

केवल बाहर की साफ-सफाई से काम नहीं चलता। भीतर के कोनों में जमी गंदगी और जालों को भी हटाना होता है। कारण कि गंदगी जितनी भी तहों के बीच क्यों ना दबी हो, देर-सवेर बाहर आती ही है। दीपावली जैसे शक्ति का असली उत्सव, अपने भीतर की बगिया में उग आई कंटीली झाड़ियों को हटाकर ही मनाया जा सकता है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप पूजा-पाठ करते हैं या नहीं। मंदिर जाते हैं या नहीं। मायने इस बात के हैं कि आप खुद को और दूसरों को क्या समझते हैं। इंसानियत के दर्शन को कितनी तवज्जो देते हैं। बौद्ध गुरु दलाई लामा कहते हैं, ‘मंदिर की जरूरत नहीं है, ना ही भारी-भरकम जटिल दर्शन की। मेरा दिल और दिमाग ही मेरे मंदिर हैं और करुणा मेरा दर्शन।’

दीपों की कतारें दीपावली का शाब्दिक अर्थ ही नहीं, वास्तविक अर्थ है। कतारों के लिए निरंतरता जरूरी है। और निरंतरता के लिए नपा-तुला क्रम। दीप जब कतार में होते हैं, तो आनंद का सूचक बन जाते हैं। जैसे कोई मूक उत्सव हो- जगर-मगर उजाले का। उजालों की पंक्तियां उल्लास का द्योतक हैं। दीप होते ही प्रेरक हैं। एक बाती, अंजुरी-भर तेल और राह-भर प्रकाश। जितना सादा दीपावली का दीपक होता है, उससे सादा कुछ नहीं हो सकता। माटी ने ज्यों पक-जमकर, बाती के बीज से ज्योत पल्लवित की हो। यह विजय पताका कार्तिक अमावस्या के अंधेरे की पूरी रात दूर रखती है। दीपावली की रात को हर दीप रोशनी की लहर बनाता है, उजालों के समन्दर में अपना योगदान देता है। ठीक ऐसा ही उजाला भीतर भी हो।  

शेक्सपियर की चर्चित पंक्ति है- ‘अगर रोशनी पवित्रता का जीवन रक्त है तो विश्व को रोशनीमय कर दो/ जगमगा दो और इसे जी-भरकर बाहुल्यता से प्राप्त करो।’ शेक्सपियर ने यह पंक्ति चाहे जिस संदर्भ में कही हो, पर इसका उद्देश्य निश्चित ही पवित्र था और अनेक अर्थों को लिए हुए यह उक्ति सचमुच मंे जीवन व्यवहार की स्पष्टता के अधिक नजदीक है। दीपावली का पर्व और उससे जुड़े रोशनी के दर्शन का भी यह उद्घोष है। रोशनी! उत्सव का प्रतीक, खुशी के इज़हार करने का प्रतीक है, आत्मा को उजालने का द्योतक है, सफलता की प्रतीति है। अगर हम इस सोच को गहराई में डुबो लें तो ये सूक्तियां हमारे जीवन की रक्त धमनियां बन सकती हैं और उससे उत्तम व्यवहार की रश्मियां प्रस्फुटित हो सकती है। उन रश्मियों की निष्पत्तियां के स्वर होंगे-  ”सदा दीपावली संत की आठों पहर आनन्द“, ”घट-घट दीप जले“, ”दीये की लौ सूरज से मिल जाये“।

दीपावली का सम्पूर्ण पर्व एक ऊर्जा है, एक शक्ति है, एक आत्मज्योति है,  एक प्रकार की गति है। एक सत्य से दूसरे सत्य की ओर अनवरत, अनिरुद्ध गति ही दीपावली की जीवंतता है। जीवन के अनेक अनुभवों का समवाय है दीपावली। एक अनुभूति से दूसरी अनुभूति तक की यात्रा में जो दीपावली के विलक्षण एवं अद्भुत क्षणों की गति है, वही जीवन की वास्तविकता है। जीवन एक यात्रा है, सतत यात्रा। ठीक इसी तरह दीपावली भी एक यात्रा है, एक प्रस्थान है, कुछ नया पाने की,  अनूठा करने की, भीतर संसार को समृद्ध बनाने की। उजालों का स्वागत करें। दीपावली की रात भारत भूमि पर आसमान उतर आता है। ज्यों आकाश में तारे टिमटिमाते हैं, सो उस रात धरा पर दिए टिमटिमाते हैं। दीपावली पर रोशनी का परचम बुलंद किए हौसलेमंद दिए ज्यों तम के सामने डट जाते हैं, वह एक कालजयी ऐलान है विजय का।

इस विजय को पाने एवं मोह का अंधकार भगाने के लिए धर्म का दीप जलाना होगा। जहाँ धर्म का सूर्य उदित हो गया, वहाँ का अंधकार टिक नहीं सकता। एक बार अंधकार ने ब्रह्माजी से शिकायत की कि सूरज मेरा पीछा करता है। वह मुझे मिटा देना चाहता है। ब्रह्माजी ने इस बारे में सूरज को बोला तो सूरज ने कहा-मैं अंधकार को जानता तक नहीं, मिटाने की बात तो दूर, आप पहले उसे मेरे सामने उपस्थित करें। मैं उसकी शक्ल-सूरत देखना चाहता हूँ। ब्रह्माजी ने उसे सूरज के सामने आने के लिए कहा तो अंधकार बोला-मैं उसके पास कैसे आ सकता हूँ? अगर आ गया तो मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। समाज में उजाला फैलाने के लिये इंसान के अंदर इंसानियत होना जरूरी है। जिस तरह दीप से दीप जलता है, वैसे ही प्यार देने से प्यार बढ़ता है और समाज में प्यार और इंसानियत रूपी उजालों की आज बहुत जरूरत है।

जीवन के हृास और विकास के संवादी सूत्र हैं- अंधकार और प्रकाश। अंधकार स्वभाव नहीं, विभाव है। वह प्रतीक है हमारी वैयक्तिक दुर्बलताओं का, अपाहिज सपनों और संकल्पों का। निराश, निष्क्रिय, निरुद्देश्य जीवन शैली का। स्वीकृत अर्थशून्य सोच का। जीवन मूल्यों के प्रति टूटती निष्ठा का। विधायक चिन्तन, कर्म और आचरण के अभाव का। अब तक उजालों ने ही मनुष्य को अंधेरों से मुक्ति दी है, इन्हीं उजालों के बल पर उसने ज्ञान को अनुभूत किया अर्थात सिद्धांत को व्यावहारिक जीवन में उतारा। यही कारण है कि उसकी हस्ति आजतक नहीं मिटी। उसकी दृष्टि में गुण कोरा ज्ञान नहीं है, गुण कोरा आचरण नहीं है। दोनों का समन्वय है। जिसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं होता वही समाज मंे आदर के योग बनता है।

हम उजालों की वास्तविक पहचान करें, अपने आप को टटोलें, अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि कषायों को दूर करंे और उसी मार्ग पर चलें जो मानवता का मार्ग है। हमंे समझ लेना चाहिए कि मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ है, वह बार-बार नहीं मिलता। समाज उसी को पूजता है जो अपने लिए नहीं दूसरों के लिए जीता है। इसी से गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है-‘परहित सरिस धरम नहीं भाई’। स्मरण रहे कि यही उजालों को नमन है और यही उजाला हमारी जीवन की सार्थकता है। जो सच है, जो सही है उसे सिर्फ आंख मूंदकर मान नहीं लेना चाहिए। खुली आंखों से देखना एवं परखना भी चाहिए। प्रमाद टूटता है तब व्यक्ति में प्रतिरोधात्मक शक्ति जागती है। वह बुराइयों को विराम देता है।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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