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‘योग ही क्यों’ : आधुनिक जीवन की चुनौतियों का प्रामाणिक समाधान प्रस्तुत करती एक सारगर्भित कृति

आज का मानव अभूतपूर्व तकनीकी विकास, भौतिक सुविधाओं और तेज़ रफ्तार जीवनशैली के बीच जी रहा है। आधुनिकता ने जहां जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं तनाव, अवसाद, अनिद्रा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी समस्याओं को भी जन्म दिया है। ऐसे समय में वरिष्ठ चिंतक, शोधकर्ता और योग-दर्शन के विद्वान डॉ. मुकुल चतुर्वेदी की पुस्तक ‘योग ही क्यों’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि स्वस्थ, संतुलित और सार्थक जीवन की दिशा में एक वैचारिक मार्गदर्शक के रूप में सामने आती है।

डॉ. मुकुल चतुर्वेदी
डॉ. मुकुल चतुर्वेदी

डॉ. मुकुल चतुर्वेदी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र और वित्त प्रबंधन की पृष्ठभूमि रखने वाले लेखक ने योग को केवल शारीरिक अभ्यास के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन और आत्म-विकास की संपूर्ण प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी पूर्व चर्चित कृतियाँ ‘योग है योगा नहीं’ तथा ‘सुर्ख चिनार’ पाठकों के बीच लोकप्रिय रही हैं और यह नवीन पुस्तक उसी वैचारिक यात्रा का विस्तृत एवं परिष्कृत स्वरूप प्रतीत होती है। डॉ. मुकुल चतुर्वेदी का कहना है कि मेरी पहली किताब योग है योगा नहीं में एक वर्तमान में दृष्टिगत पीड़ा है,वह योग को योगा कहने वालों के विरुद्ध आवाज है कि उन्हें योगा कहने से बचना है। हम योग को योगा कह कर उसके मूल रूप को नष्ट कर रहे हैं, यह इस वर्तमान पीढ़ी के द्वारा किया जा रहा है, वही यहीं पर उसे सुधार कर लेगी तो योग का मूल रूप बना रह पाएगा नहीं तो उनसे आगे जो पीढ़ी अभी अपने बचपन से गुजर रही है वह योगा को जानेगी।

डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक योग ही क्यों का सबसे बड़ा गुण इसकी सरल, सहज और जनसामान्य के लिए सुबोध भाषा है। लेखक ने योग के गूढ़ और दार्शनिक विषयों को अत्यंत सरल शैली में प्रस्तुत किया है, जिससे सामान्य पाठक भी योग के मूल स्वरूप को समझ सकता है। पुस्तक की शुरुआत आधुनिक जीवनशैली की समस्याओं के विश्लेषण से होती है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि तकनीकी सुविधाओं की अंधी दौड़ ने मनुष्य को शारीरिक रूप से निष्क्रिय और मानसिक रूप से तनावग्रस्त बना दिया है। जंक फूड, अनियमित दिनचर्या, सोशल मीडिया की लत और नींद की कमी जैसी समस्याओं को लेखक ने आधुनिक रोगों की जड़ बताया है।

‘योग ही क्यों’ का केंद्रीय प्रश्न भी यही है कि जब आधुनिक चिकित्सा और तकनीक उपलब्ध हैं, तब योग की आवश्यकता क्यों है? लेखक इसका उत्तर वैज्ञानिक, दार्शनिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देते हैं। वे बताते हैं कि योग केवल रोगों के उपचार का माध्यम नहीं, बल्कि रोगों की रोकथाम और संपूर्ण जीवन-प्रबंधन की कला है।

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष योग के अष्टांग स्वरूप का विस्तृत वर्णन है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि को लेखक ने केवल सैद्धांतिक रूप से नहीं, बल्कि जीवन में उनकी उपयोगिता के साथ समझाया है। विशेष रूप से यम और नियम के अंतर्गत नैतिक मूल्यों और आत्म-अनुशासन पर दिया गया बल पुस्तक को केवल स्वास्थ्य-साहित्य तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि इसे जीवन-मूल्यों की पुस्तक बना देता है।

आसन और प्राणायाम संबंधी अध्याय पुस्तक की व्यावहारिक उपयोगिता को बढ़ाते हैं। सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन, भुजंगासन, सर्वांगासन, सूर्य नमस्कार सहित अनेक योगासनों का समावेश पाठकों को अभ्यास की दिशा में प्रेरित करता है। वहीं प्राणायाम के विभिन्न स्वरूपों का सरल वर्णन मानसिक शांति और शारीरिक संतुलन के महत्व को रेखांकित करता है।

योग ही क्यों

लेखक ने योग की परिभाषा को विभिन्न शास्त्रीय संदर्भों के माध्यम से भी स्पष्ट किया है। महर्षि पतंजलि के ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’ से लेकर भगवद्गीता के ‘समत्वं योग उच्यते’ और ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ जैसे सूत्रों को उद्धृत करते हुए वे योग के व्यापक स्वरूप को सामने रखते हैं। यह पुस्तक पाठक को यह समझाने में सफल होती है कि योग केवल शरीर को मोड़ने की क्रिया नहीं, बल्कि मन, बुद्धि, आत्मा और परमात्मा के बीच सामंजस्य स्थापित करने की प्रक्रिया है।

पुस्तक की एक अन्य विशेषता यह है कि लेखक ने योग को भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ते हुए उसकी वैज्ञानिकता पर भी प्रकाश डाला है। आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा जगत द्वारा योग की स्वीकार्यता का उल्लेख पुस्तक की विश्वसनीयता को बढ़ाता है। साथ ही लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि योग आधुनिक चिकित्सा का विरोधी नहीं, बल्कि उसका पूरक है।

हालाँकि पुस्तक का कुछ भाग पारंपरिक योग-दर्शन और आध्यात्मिक अवधारणाओं पर आधारित है, जो आधुनिक युवा पाठकों के लिए थोड़ा गंभीर या दार्शनिक प्रतीत हो सकता है। फिर भी लेखक की सरल प्रस्तुति और विषय के प्रति उनकी गहरी समझ इसे पठनीय बनाए रखती है।

समग्र रूप से ‘योग ही क्यों’ एक ऐसी पुस्तक है, जो केवल योग सीखने के इच्छुक लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन, स्वास्थ्य और मानसिक शांति की तलाश कर रहे प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयोगी है। यह पुस्तक आधुनिक जीवनशैली की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए भारतीय योग परंपरा की गहराई और व्यापकता को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है।

डॉ. मुकुल चतुर्वेदी की यह कृति योग को व्यायाम से आगे बढ़ाकर जीवन के संपूर्ण दर्शन के रूप में स्थापित करती है। वर्तमान समय में जब मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों गंभीर चुनौती बने हुए हैं, तब ‘योग ही क्यों’ एक प्रासंगिक, उपयोगी और प्रेरणादायी पुस्तक सिद्ध होती है। यह पुस्तक योग के वास्तविक स्वरूप, उसके वैज्ञानिक आधार और जीवन में उसकी उपयोगिता को समझने के इच्छुक पाठकों के लिए एक उत्कृष्ट मार्गदर्शिका है। योग को केवल अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग बनाने की प्रेरणा देने वाली यह कृति निश्चित रूप से अध्ययन योग्य है।

पुस्तक : योग ही क्यों

लेखक : डॉ. मुकुल चतुर्वेदी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स

उमेश कुमार सिंह

समीक्षक : उमेश कुमार सिंह

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