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दतिया के प्राचीन वैभव से मुलाकात

            प्रमोद दीक्षित मलय

रात 11.30 की ट्रेन लगभग आधे घंटे विलंब से अतर्रा रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म क्रमांक 1 पर पहुँची थी। मैं जल्दी से अपना पिट्ठू बैग उठाकर कोच में चढ़ गया, सीट पर बैग रखा और भीगे बालों को हाथ से झटक कर साफ किया। दरअसल आसमान पर बादल भी यात्री बन साथ हो लिए थे और लगातार बरस रहे थे। कोच में चढ़ते वक्त बारिश की बूँदें यात्रियों को हल्का भिगो दे रही थीं। सीट पर चादर बिछाई और बैग सिरहाने लगा सो गया। सुबह चाय गरम, चाय गरम की आवाज से नींद टूटी।‌ सूरज भी अँगड़ाई लेकर झाँकने लगा था। पूरे कोच में चहल-पहल थी। सामने की सीट पर एक विवाहित जोड़े को बैठा पाया। बात करने पर पता चला कि हमीरपुर से बैठे हैं, रोजी-रोटी की तलाश में परदेश कमाने निकले हैं। मैंने पूछा कि दिल्ली जाओगे। युवक की बजाय  पत्नी बोली, “नहीं बाबू साहब, यहीं झाँसी में काम करेंगे।” घर क्यों छोड़ा ? अबकी बार युवक बोला, “खेती भर से गृहस्थी नहीं चलती, कुछ महीने बाहर कमा लेंगे तो घर में मदद मिल जायेगी, इस साल बहन की शादी-गौना भी करना है।” युवक-युवती बातचीत और पहनावे से पढ़े-लिखे लगे। “बाबू जी! गरम चाय पिएँगे, अदरक वाली मस्त चाय है।” चायवाले वेंडर की आवाज से  युवक से बातचीत का क्रम टूटा, मैंने दस रुपए का सिक्का थमा चाय का कुल्हड़ लिया। मैंने उन दोनों को चाय ऑफर की पर उन्होंने मना कर दिया। यह मऊरानीपुर स्टेशन था, ट्रेन अब पटरियों पर फिसलने लगी थी। कोच में तैरती बातचीत से पता चला कि ट्रेन एक घंटा लेट है। दरअसल मऊरानीपुर से बहुत सारे कर्मचारी और शिक्षक झाँसी के लिए यात्रा करते हैं, वही लोग आपस में बातचीत कर रहे थे। मैंने देखा कि उनमें से चार लोगों  ने सूटकेस को घुटनों के ऊपर रख ताश खेलना शुरू कर दिया था। अरे, मैंने यह तो बताया ही नहीं कि मैं कहाँ की यात्रा पर निकला हूँ। मित्रों! मैं दतिया, मध्यप्रदेश एक साहित्यिक कार्यक्रम में सहभाग करने जा रहा हूँ। आयोजन 5-6 सितम्बर, 2023 को है।

       लगभग चालीस मिनट की देरी से ट्रेन दतिया स्टेशन पहुँची। मैंने ऑटो लिया और होटल पहुँच स्नानादि से निवृत्त होकर जलपान कर सभागार में बैठ गया। पूरे देश से साहित्यकार जुटे थे, बहुत सारे परिचित थे, सभी से आत्मीय भेंट हुई। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक श्री विकास दवे द्वारा मुझे शॉल ओढ़ाकर सम्मान पत्र भेंट किया गया। शाम को कविता पाठ सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में मेरा स्वागत हुआ। भोजन करके अपने कमरे में जाकर सो गया। सुबह दतिया के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को यात्रा का कार्यक्रम था।

         सुबह जल्दी जगने की आदत होने के कारण नींद स्वाभाविक रूप से खुल गयी। दो-एक साथी और जग गये थे जो होटल के बारामदे में टहल रहे थे।  बाहर मार्निंग वॉक करने के मेरे प्रस्ताव पर वे दोनों मेरे साथ हो लिए। खुला शांत माहौल, सड़क  के किनारे हम टहलते दो किमी आगे निकल गये। फेफड़ों में ताजी हवा भरकर वापस हुए।‌ एक गुमटी पर चाय पी और होटल पहुँचे। 

 थोड़ी देर तैयार होकर जलपान किया और बैग लेकर बाहर खड़ी बस में सभी लोग बैठ गये।‌ बस चल पड़ी। पहला पड़ाव माँ पीताम्बरा देवी के द्वार पर। रात की बारिश से सड़क और मंदिर परिसर गीला था। बाहर की दुकान से प्रसाद और एक दोना पुष्प-माला लेकर मुख्य द्वार पर पहुँचे। वहाँ पर मोबाइल जमा कर टोकन लिया, निकट ही जूते उतार दर्शनार्थियों की पंक्ति में लग गये। भीड़ नहीं थी, बहुत सहजता से पीताम्बरा माई का दर्शन कर आगे धूमावती माता का दर्शन कर अन्य मंदिरों में स्थापित भगवान परशुराम मंदिर, सरस्वती मंदिर, काल भैरव मंदिर आदि मंदिरों में स्थापित देव प्रतिमाओं का दर्शन कर पुण्यभागी बने। पीताम्बरा पीठ की स्थापना 1935 में एक सिद्ध संत द्वारा महाराज शत्रुजीत सिंह बुंदेला के सहयोग से की गई थी। यहाँ तांत्रिक तंत्र साधना हेतु आते हैं। 1962 के चीनी आक्रमण के दौरान पं. जवाहर लाल नेहरू को यजमान बनाकर 11 दिवसीय तांत्रिक यज्ञ हुआ, 9वें दिन युद्ध रुक गया था। ये सब जानकारी वहाँ साधनारत एक पंडित जी ने बताई थीं। दर्शन पूरा हुआ, लौटकर द्वार पर टोकन दे अपना मोबाइल वापस पाया और बस में बैठे। बस चल पड़ी राजा वीर सिंह महल की ओर। महल बस्ती के अंदर है तो बस 500 मीटर पहले ही रोक दी गई। सभी लोग पैदल चलकर महल पहुँचे। आयोजकों ने टिकट की व्यवस्था की और सभी महल में दाखिल हुए।‌ गाईड ने बताया कि इस महल का निर्माण 1620 में राजा वीर सिंह जूदेव ने जहांगीर के स्वागत के लिए कराया था। महल 8-9 वर्षों में पूरा हुआ। वीर सिंह ने तब 52 स्मारक बनवाये थे जिनमें महल, तालाब, चौकी, मंदिर आदि थे। यह महल सात मंजिला है पर ऊपर की तीन-चार मंजिलें दर्शकों के लिए बंद कर दी गई हैं। इसके निर्माण में लोहे और लकड़ी का प्रयोग नहीं किया गया, केवल ईट-पत्थर उपयोग किया। उस समय इसके निर्माण में 35 लाख रुपए लागत आई थी। यह मुगल और राजपूत स्थापत्य शैली में निर्मित है। दतिया पधारने के अनुरोध को जहांगीर ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। तबसे यहाँ कोई राजा ठहरा नहीं। स्वास्तिक आकार में बने महल में लगभग दो घंटा रुकने के बाद बस में बैठ आगे बढ़े। रास्ते में एक हनुमान मंदिर में भोजन किया और पहुँच गये जैन तपस्थली सोनागिरि मंदिर पर्वत पर। यहाँ एक टीले पर 108 छोटे-बड़े जैन मंदिर हैं जिनमें क्रमांक 57वाँ मंदिर अति विशाल और दिव्य-भव्य है। जैन तीर्थंकर चंद्रप्रभु की 3 मीटर से अधिक ऊँची प्रतिमा स्थापित है। मंदिर की स्थापना 9वीं शती की बताई जाती है। प्रत्येक वर्ष वर्ष प्रतिपदा से रंगपंचमी तक मेला लगता है और रथयात्रा निकलती है। वार्षिक समारोह के दौरान ध्वजारोहण कार्यक्रम होता है और शिखर पर लगा झंडा बदला जाता है। बहुत ही शांत वातावरण है, यहाँ से जाने का मन नहीं करता पर जाना विवशता थी क्योंकि वापसी ट्रेन शाम की थी। उनाव के सूर्य मंदिर का दर्शन करवा कर बस ने मुझ सहित कुछ साहित्यकारों को स्टेशन के पास उतार कर होटल की ओर बढ़ गई। ट्रेन समय से थी, मैं अपनी सीट पर लेटे हुए कार्यक्रम और भ्रमण की स्मृतियों में खो गया।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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