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​ वासंती काव्य संध्या का आयोजन

दिल्ली : देश की अग्रणी साहित्यिक संस्था हिंदी की गूंज के तत्वाधान में #वासंती काव्य संध्या #का आयोजन प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी आभासी पटल पर आयोजित किया गया । सर्वप्रथम कार्यक्रम में बसंत ऋतु का परिचय संस्था की नन्ही कलम रामकुमार पांडेय के द्वारा दिया गया तत्पश्चात मां सरस्वती की वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। देश के ख्यातिलब्ध संचालक खेमेन्द्र सिंह ने कार्यक्रम का शानदार संचालन किया। मुख्य अतिथि के रूप में पधारे डॉक्टर नीलकंठ कुमार ने सभी का उत्साहवर्धन करते हुए हिन्दी की गूंज संस्था की सराहना की । डॉ वर्षा सिंह ने -“तुमको पाने के लिए सब शर्तें मंजूर” कहकर एक पत्नी के पति के प्रति समर्पण के भाव को प्रस्तुत किया तो वहीं हाथरस से पधारी कोकिल कंठी मंजू शर्मा ने-” ऋतु बसंत की आई देखो प्रकृति भी हर्षाई है” गीत सुनकर पूरे वातावरण को संगीतमय बना दिया। अलका सोनी ने -“ठिठुरती सर्दियों का अब अंत आ रहा है खोलो द्वार अपने बसंत आ रहा है” सुना कर बसंत ऋतु का स्वागत किया, तो वही सुरों के प्रसिद्ध कवि श्याम सुंदर कोमल  ने-” ले फूलों की पालकी द्वार खड़ा मधुमास” सुना कर बसंत का स्वागत किया।

देश के जाने-माने शिक्षाविद् एवं कवि डॉ विनोद चौहान प्रसून ने अपनी कविता -“सोना थे दिन चांदी रातें याद बहुत आती हैं” डॉ ममता श्रीवास्तव ने अपनी कविता क्यों करते हो द्वेष पिया मोबाइल भी है तेरा स्वरूप पिया सुना कर मोबाइल और पति के बीच के दूरी को कम करने की बात कही, तो वहीं तरुणा पुंडीर तरुनिल ने-” चुनर पीली धार ओढ़े मुदित मधुमास आया है” सुनाया। ममता राठौर ने-“मेरे दिल के बगीचे में तुम्हारा ही बसेरा है” सुना कर सभी का मन मोह लिया। संस्था के संयोजक नरेंद्र सिंह नीहार ने – दूर कहीं ले जाता है,मन्द पवन का पहला झोका रचना से सभी का मन मोह लिया। लगभग ढाई घंटे चले कार्यक्रम में सभी कवियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और पूरे हर्षोल्लास के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के डॉ नीलकंठ कुमार ने कहा कि- राजा – रानी के प्रेम की अद्भुत कविता सुनाकर सबकी वाहवाही बटोरी। कार्यक्रम को सफल बनाने में रमेश कुमार गंगेले,डॉ वर्षा महेश,विमला रस्तोगी,विद्यासागर,कामता प्रसाद,दीपा शर्मा,रोचिका शर्मा,संजय कुमार सिंह,राकेश जाखेटिया,गिरीश कुमार जोशी,निर्मला जोशी,सुनीता, शैली रस्तोगी(लंदन) आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही।​

भावना अरोड़ा ‘मिलन’

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