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फिर आए राम अयोध्या में

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प्रकाश मनु साहित्य की दुनिया में एक ऐसा नाम है जिनसे हर कोई बखूबी वाकिफ है खासतौर पर ये बच्चों के खासे प्रिये हैं। हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक हैं। उन्होंने बच्चों और बड़ों दोनों के लिए महत्वपूर्ण साहित्य रचा है। विशेष रूप से बाल साहित्य में उनका योगदान उल्लेखनीय है। प्रकाश मनु ने कहानियाँ, कविताएँ, उपन्यास लिखे हैं, और वे साहित्य की विभिन्न विधाओं में भी पारंगत हैं। उनकी रचनाएँ सरल भाषा में होती हैं, जिससे सभी उम्र के पाठक उन्हें बड़ी ही आसानी से समझ सकते हैं। उनके कार्यों में समाज, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का गहरा चित्रण मिलता है।

बाल साहित्य में उनकी भूमिका को देखते हुए उन्हें कई पुरस्कार और सम्मानित किया गया है जैसे कि  बाल उपन्यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर साहित्य अकादेमी का पहला बाल साहित्य पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के ‘बाल साहित्य भारती’ पुरस्कार और हिंदी अकादेमी के ‘साहित्यकार सम्मान’ से सम्मानित। कविता संग्रह ‘छूटता हुआ घर’ पर प्रथम गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार।

प्रकाश मनु जी से कई वर्षों से आग्रह था कि वे अपनी सुंदर लेखनी से आज के तरुणों के लिए भगवान राम के गौरवमय चरित्र की गाथा लिखें, जिसे पढ़कर वे आनंद विभोर होकर बहुत कुछ सीखें भी। प्रभु रामचंद्र जी का चरित्र अगाध है। बहुत समय होने के साथ ही उनमें बहुत कुछ है, जिससे पग-पग पर हम सीख ले सकते हैं। इसीलिए रामचंद्र जी भारतीय संस्कृति के महानायक हैं, जिनके थोड़ा-सा भी निकट जाते ही हमारे दिलों में उजाला हो जाता है, और हम बाहर-भीतर से बदलने लगते हैं।

मुझे प्रसन्नता है कि प्रकाश मनु जी ने अपनी व्यस्तताओं के बावजूद मेरे आग्रह का मान रखा और जब लिखना शुरू किया, तो रामचंद्र जी की ऐसी रसमय कथा लिखी, जिसे पाठक एक बार पढ़ना शुरू करें, तो फिर पूरा किए बिना छोड़ नहीं पाएँगे। फिर प्रकाश मनु जी ने ‘फिर आए राम अयोध्या में’ (रामकथा) पुस्तक लिखी जो कि डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है।

पुस्तक में उन्होंने रामकथा के माध्यम से ऐसे प्रभु राम की अनुपम झाँकी उपस्थित की है, जो दिव्य हैं, मनोहर हैं, बहुत बड़ी आस्था और प्रेरणा के केंद्र हैं। मन को मुग्ध करते हैं और पल में कुछ का कुछ कर देते हैं। प्रकाश मनु जी की इस सुंदर रामकथा को पढ़कर पाठक जानेंगे कि राम का व्यक्तित्व कितना बड़ा, कितना महान है। जीवन में कितने कष्ट उठाए उन्होंने, पर न तो सच्चाई की लीक छोड़ी और न अपनी मर्यादा। इसीलिए तो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहा गया है।

मुझे विश्वास है कि बड़े ही भावपूर्ण शब्दों में लिखी हुई इस मनोरम रामकथा को पढ़ते हुए उनका पूरा जीवन पाठकों के आगे साकार हो उठेगा। साथ ही वे रामकथा के जरिए भारतीय संस्कृति के महान आदर्शों से भी परिचित हो सकेंगे, जो हजारों वर्षों से मानवता को प्रेरित करते रहे हैं। आज उनकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, ताकि यह दुनिया सुंदर हो, प्रेममय हो, और नई आस्था से जगमगाए।

आज की भौतिकता से उकताई दुनिया के लिए रामकथा शीतल मरहम की तरह है। इसलिए उम्मीद है कि पाठक इसे पढ़कर आनंदमग्न होंगे, बहुत कुछ सीखेंगे और अपने जीवन को निखारेंगे, ताकि वे एक सुंदर और सार्थक जीवन जिएँ और श्री रामचंद्र जी की तरह जीवन में बड़े-बड़े काम कर दिखाएँ।

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