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फोटोग्राफी : रचनात्मकता की अभिव्यक्ति का कलात्मक माध्यम

    हर व्यक्ति में रचनात्मकता होती है। इनमें जो सूझबूझ भरे, सजग और सक्रिय होते हैं वे अपने कार्यक्षेत्र में रचनात्मकता को नवाचार के विविध रूपों में प्रदर्शित करते हैं, वहीं कुछ व्यक्तियों के अवचेतन मन में यही रचनात्मकता बीज रूप में सुप्तावस्था में रहती है और उचित एवं अनुकूल परिवेश, प्रेरणा, पोषण एवं प्रोत्साहन प्राप्त कर कृति रूप में साकार होती है। मनस्थ रचनात्मकता को लोकजीवन में उद्घाटित-प्रकाशित करने के लिए विविध साधन एवं कला क्षेत्र माध्यम बनते हैं। लेखन, शिल्पकला, स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला, बागवानी, फोटोग्राफी, फिल्म एवं वृत्तचित्र निर्माण, संगीत, समाजोपयोगी कार्य, सेवा-साधना इत्यादिक क्षेत्रों में व्यक्ति की रचनात्मकता नवल आयाम के साथ प्रकट होती रही है। संवेदना, समानुभूति और कल्पना का साहचर्य प्राप्त कर रचनात्मकता जीवंत हो उठती है।फोटोग्राफी भी रचनात्मकता की ऐसी ही एक अनूठी आधुनिक उन्नत कला साधना है जहां एक फोटोग्राफर जगत् के सौंदर्य के साथ जीवन के सामंजस्य-वैमनस्य,, संघर्ष-सह-अस्तित्व, हर्ष-विषाद, आशा-निराशा एवं कटु-माधुर्य दृश्यों को कैमरे के लेंस द्वारा न केवल देखता और सहेजता बल्कि लोक को जीवन दृष्टि का उपहार भी देता है। फोटोग्राफी ग्रीक शब्द फोस और ग्राफे से निकला है जिसका आशय है प्रकाश के माध्यम से चित्रण या लेखन करना।

 फोटोग्राफी का पहला पेटेंट 19 अगस्त, 1839 को हुआ था। इस दिन की स्मृति को संजोने के लिए आस्ट्रेलिया के एक उत्साही फोटोग्राफर ने अन्य 270 फोटोग्राफरों के साथ मिलकर 19 अगस्त, 2010 को एक आयोजन कर फोटो का दुनिया भर में प्रचार-प्रसार तथा साझा करने हेतु वैश्विक आयोजन की आधारशिला रखी। और उस दिन अपने फोटो संग्रह से चयनित कुछ फोटो को आनलाइन फोटो गैलरी में प्रदर्शित किया। दुनिया के 100 से अधिक देशों में फोटो गैलरी को देखा-सराहा एवं पसंद किया गया। नये विषयों और क्षेत्रों के फोटो की मांग भी आई। तब से यह आयोजन अबाधित अद्यावधि गतिमान है। ऐसे आयोजन से फोटोग्राफरों को अपने रचनात्मक कलात्मक फोटो के प्रदर्शन, परस्पर लेन-देन से पहचान मिली और फोटो विक्रय से आर्थिक सुदृढता भी। आज के दिन स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थाओं द्वारा फोटोग्राफी पर कार्यशालाएं, प्रतियोगिताएं, प्रश्नोत्तरी एवं फोटो के प्रदर्शन करने जैसे आयोजन किये जाते हैं। एक फोटो हजार शब्दों की व्याख्या है, अनुभूति है और सहज सम्प्रेषणीयता भी। विश्व फोटोग्राफी दिवस का उद्देश्य पूरी दुनिया के फोटोग्राफरों को अपनी कला एवं रचनात्मकता को प्रदर्शित करने, विश्व भर में साझा करने और फोटोग्राफी के महत्व को बढ़ावा देने के साथ आमजन को जागरूक करने हेतु एक बड़ा मंच और अवसर देता है।

 विश्व का पहला फोटो आज से दो सौ वर्ष पूर्व सन् 1826 में जोसेफ निसेफोर नीप्से ने अपने मकान की खिड़की से लिया था, जिसमें 8 घंटे लगे थे परंतु प्राप्त फोटो धुंधली और अस्पष्ट थी। ‘व्यू फ्रॉम द विंडो एट ले ग्रास’ नामक यह फोटो आज ऐतिहासिक धरोहर है। फ्रांस के विज्ञानी जोसेफ नाइसफोर तथा लुई डॉग्यूरे ने 1837 में फोटोग्राफी की डॉग्यूरेटाईप प्रक्रिया का आविष्कार किया। इसमें तांबे की सीट पर चांदी की पतली परत का लेप लगाते थे, जिस पर कैमरे से व्यक्ति, वस्तु या दृश्य को पकड़ते थे। आगे फ़्रेंच अकादमी ऑफ साइंसेज ने 9 जनवरी, 1839 को इसकी आधिकारिक घोषणा की तथा फ्रेंच सरकार ने 19 अगस्त, 1839 को इसका पेटेंट प्राप्त कर पूरी दुनिया के लिए मुफ्त सुलभ करा दिया। फोटोग्राफी के विकास में विज्ञानी अविराम नित नूतन प्रयोग करते रहे। वर्ष 1861 में स्काटलैंड के भौतिकशास्त्री जेम्स क्लर्क मैक्सवेल की त्रि-रंग विधि से थामस सटन ने लाल, हरा और नीले रंग की तीन प्लेटों का प्रयोग करके कैमरे से दुनिया की पहली रंगीन तस्वीर प्राप्त की। दो दशकों बाद फोटोग्राफी के इतिहास में एक क्रांतिकारी शोध हुआ जिसने न केवल फोटोग्राफरों का बोझ हल्का किया बल्कि फोटो खींचना भी अपेक्षाकृत सहज-सरल बना दिया। सन् 1884 में न्यूयार्क के जार्ज ईस्टमैन ने डाग्यूरे टाईप प्रक्रिया को परिष्कृत कर तांबे की प्लेट की जगह सूखी जेल की एक पतली पट्टी लगा दी, जिसे फिल्म कहा गया। अब फोटोग्राफरों को तांबे की प्लेटें और विषाक्त रसायनों का बोझ ढोने से मुक्ति मिली। इतना ही नहीं, आगे ईस्टमैन ने सन् 1888 में एक कोडक कैमरा भी विकसित किया, जिससे कोई भी व्यक्ति अब फोटो खींच सकता था। डिजिटल कैमरों के आने के पहले तक कोडक कैमरा और फिल्म रीलों का प्रयोग दुनिया भर में हो रहा था। भारत में फोटोग्राफी का आरंभ 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों की पहल से हो गया था। वर्ष 1880 में हैदराबाद निजाम के दरबारी फोटोग्राफर लाला दीनदयाल ने सास-बहू मंदिर का फोटो लिया था, यह किसी भारतीय द्वारा लिया गया पहला फोटो था। हालांकि इसके पूर्व फेलिस बीटो ने 1857 के युद्ध के फोटो लिए थे। सैमुअल बार्न ने 1863 में भारत में बार्न एंड शेफर्ड नामक फोटो स्टूडियो स्थापित किया था, उन्होंने भारत के स्थापत्य और वास्तुकला से सम्बंधित भवनों के फोटो लिए थे।

फोटोग्राफी दिवस पर प्रति वर्ष आयोजन की एक थीम होती है। वर्ष 2025 की थीम है – मेरी पसंदीदा फोटो। वर्ष की थीम पर पूरे विश्व में आयोजित होने वाले कार्यक्रम फोटोग्राफी के प्रति सामान्य जन को उसकी पहुंच से परिचित करा पर्यावरण जागरूकता, वैश्विक एकता, भुखमरी से मुक्ति, मानवीय संवेदना, निर्झर-गिरि-कानन, सर-सिंधु-सरिताओं के संरक्षण, स्वच्छता, अहिंसा, प्रेम, बंधुत्व, जीवन में नवाचारी प्रयासों एवं सांस्कृतिक वैविध्य के साथ ही मानवीय गरिमा को धूमिल-धूसर करते रंग, नस्ल, लिंग, हिंसा, युद्ध, बालश्रम, यौन अपराध, महिला दुर्व्यवहार जैसे ज्वलंत विभेदकारी मुद्दों के प्रति चेतना जगाने का कार्य करता है। यह दिन जीवनोपयोगी वन, डेल्टा, मरुस्थल, दलदल, ऐतिहासिक विरासत के किले, बावड़ी, मंदिर, पुल, बांध सहित लोक के महत्वपूर्ण दृश्यों का अंकन कर भावी पीढ़ी के हाथों में सौंप संरक्षण को प्रेरित करता है।

फोटोग्राफी कला लोक जीवन के इतिहास को न केवल सहेजती है बल्कि रचती भी है।‌ निर्विवाद कह सकते हैं कि एक फोटो की सम्प्रेषणीयता शब्द और काल से परे होती है। उसकी व्यापकता, उपयोगिता एवं संदर्भशीलता दुनिया भर में धारणाओं और भावनाओं को नवल आकार देती है। फोटोग्राफी कला के आधार में धैर्य, संयम, सौंदर्यबोध, सूक्ष्मदृष्टि, कल्पना, संवेदनशीलता एवं साहस के सप्तरंग बिखरे हैं। फोटोग्राफी की राह में सुवासित सुमनों के परिमल पराग का सिंचन नहीं है अपितु चुनौतियों, बाधाओं, जोखिम एवं दुश्वारियों के कंटक बिछे हैं। एक फोटो के पीछे महीनों और कभी-कभी तो वर्षों की साधना छिपी होती है। इसीलिए फोटोग्राफी कला इतिहास, भूगोल, विज्ञान, शिल्प, संस्कृति एवं परम्परा की पहचान है। फोटोग्राफी की दो शताब्दी की यह जीवन यात्रा हमारे लिए प्रमुदित और प्रेरक है।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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