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करुणा एवं संवेदनाओं से ही दुनिया में संतुलन संभव

-विश्व दयालुता दिवस -13 नवम्बर, 2025-

आज का मनुष्य जितनी तीव्रता से भौतिक प्रगति कर रहा है, उतनी ही तेजी से मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं से दूर होता जा रहा है। विज्ञान ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, परंतु उसने मनुष्य को आत्मकेंद्रित भी कर दिया है। प्रतिस्पर्धा, उपभोगवाद, स्वार्थ और सत्ता की भूख ने मनुष्य के भीतर की दयालुता को जैसे कुंद कर दिया है। ऐसे समय में जब विश्व हिंसा, आतंक, युद्ध, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और वैमनस्य के दौर से गुजर रहा है, तब “विश्व दयालुता दिवस” मनाने का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सभ्यता के विकास की असली पहचान तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की करुणा, सहानुभूति और प्रेम से होती है। दयालुता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है।

करुणा एवं संवेदनाओं से ही दुनिया में संतुलन संभव

यह मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर देवत्व की ओर ले जाती है। इतिहास साक्षी है कि जिन समाजों ने दया, करुणा और प्रेम को अपनाया, वहीं शांति और समृद्धि का आधार बने। बुद्ध, महावीर, यीशु और गांधी जैसे महापुरुषों ने दया को जीवन की सबसे बड़ी साधना माना। महात्मा गांधी ने कहा था, “अहिंसा कोई निष्क्रिय वस्तु नहीं, यह सबसे सक्रिय और जीवंत शक्ति है।” दयालुता उसी अहिंसा की आत्मा है, जो मनुष्य को दूसरों के सुख-दुःख से जोड़ती है।

आज जब दुनिया में युद्ध की विभीषिका मंडरा रही है, जब समाज हिंसा, कट्टरता और असहिष्णुता से आक्रांत है, तब दया और करुणा का महत्त्व केवल नैतिकता का विषय नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। यूक्रेन-रूस युद्ध, गाजा और इस्राइल का संघर्ष, आतंकवाद की विभीषिका और भीतर तक उतर चुकी नफरत की राजनीति-ये सब इस बात के संकेत हैं कि हमने दयालुता को अपने जीवन से बाहर कर दिया है। मनुष्य ने मशीनों की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया है। संवेदना की जगह संदेह ने ले ली है, और करुणा की जगह क्रूरता ने। ऐसे में विश्व दयालुता दिवस केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है कि क्या हम अब भी मनुष्य बचे हैं या केवल उपभोग की दौड़ में शामिल यांत्रिक प्राणी बन गए हैं।
विश्व दयालुता दिवस मनाने की पहल सबसे पहले 1998 में “वर्ल्ड काइंडनेस मूवमेंट” नामक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने की थी, जिसका उद्देश्य था-मानवता में करुणा, सहानुभूति और प्रेम के बीजों को फिर से सींचना।

इस दिन का मकसद यह स्मरण कराना है कि दया कोई एक दिन की बात नहीं, बल्कि जीवन का स्थायी संस्कार होना चाहिए। दयालुता एक ऐसी भाषा है जो सभी सीमाओं, धर्मों, भाषाओं और विचारधाराओं से परे है। यह वह सूत्र है जो मनुष्यता को जोड़ता है, जो टूटे हुए रिश्तों में प्राण फूंकता है। आज की दुनिया में भौतिक विकास ने व्यक्ति को आराम तो दिया है, लेकिन आत्मिक शांति छीन ली है। हर कोई सफलता की होड़ में है, पर किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। परिवारों में संवाद घट गया है, समाज में सहयोग की भावना कम हुई है, और राजनीति में विरोध ने वैमनस्य का रूप ले लिया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस युग में हम जुड़ते तो बहुत हैं, पर वास्तव में अलग-थलग पड़ गए हैं। दया और करुणा की कमी के कारण मानसिक तनाव, अवसाद, आत्महत्या और असंतोष जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। इस स्थिति से उबरने का एकमात्र उपाय है-दयालुता की भावना को जीवन का आधार बनाना।

दयालुता केवल दूसरों के प्रति व्यवहार नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का माध्यम है। जब हम किसी की सहायता करते हैं, किसी के दुःख को समझते हैं, किसी की भूल को माफ करते हैं, तब हम अपने भीतर की नकारात्मकता को भी दूर करते हैं। दयालु व्यक्ति न केवल समाज को सुंदर बनाता है, बल्कि स्वयं के भीतर भी शांति का अनुभव करता है। करुणा से मनुष्य का हृदय विस्तृत होता है, दृष्टि उदार होती है, और जीवन में संतुलन आता है। आज की जटिल दुनिया में संतुलन खोना बहुत आसान है। मनुष्य अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं में उलझकर आत्मविनाश की ओर बढ़ रहा है। पर्यावरण का संकट, सामाजिक विषमता, नैतिक पतन-ये सब उसी असंतुलन के परिणाम हैं, जहाँ दयालुता और करुणा का स्थान स्वार्थ और लोभ ने ले लिया है। यदि मनुष्य में करुणा का भाव जाग जाए, तो न युद्ध रहेगा, न आतंकवाद, न हिंसा।

दुनिया में जितनी भी क्रूरताएं हुई हैं, वे दया के अभाव से हुई हैं। अतः दया केवल नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि विश्व शांति का आधार है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-“जब तक एक भी जीव भूखा या दुखी है, तब तक तुम्हारी उपासना अधूरी है।” यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि सच्चा धर्म केवल पूजा या प्रार्थना नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति करुणा का भाव है। यदि दयालुता जीवन का हिस्सा बन जाए, तो धर्म अपने वास्तविक रूप में प्रकट होता है। चाहे वह जैन धर्म का “अहिंसा परमो धर्मः” का संदेश हो या बौद्ध धर्म की “मैत्री भावना”, सभी ने दया को ही मानवता की सर्वाेच्च साधना माना है।

वास्तव में दया का अर्थ केवल किसी पर कृपा करना नहीं है, बल्कि दूसरों के दुख को अपना समझना है। दया एक ऐसी ऊर्जा है जो न केवल संबंधों को मजबूत बनाती है, बल्कि समाज में सह-अस्तित्व की भावना को भी जन्म देती है। आज जब मनुष्य अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष कर रहा है, तो दया ही वह सूत्र है जो जीवन में संतुलन और अर्थ दोनों ला सकती है। हम देख रहे हैं कि दुनिया में तकनीकी शक्ति बढ़ रही है, परंतु नैतिक और भावनात्मक शक्ति घट रही है। युद्ध और हिंसा से किसी का भला नहीं होता। दया और करुणा से ही समाज टिकता है, सभ्यता बचती है, और मनुष्य अपने भीतर के अंधकार को पहचान पाता है। विश्व दयालुता दिवस इसलिए हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हमारे जीवन में दयालुता का स्थान बचा है? क्या हम अपने व्यवहार में दूसरों के सुख-दुःख के प्रति संवेदनशील हैं?

दयालुता की शुरुआत बहुत छोटे-छोटे कार्यों से होती है-किसी की सहायता करना, किसी के प्रति मधुर बोल कहना, किसी की गलती को क्षमा करना, या किसी जरूरतमंद की मदद करना। इन छोटे प्रयासों से बड़े बदलाव संभव हैं। यही छोटे कदम मिलकर समाज में बड़ी करुणा की लहर पैदा करते हैं। जैसे एक दीपक अंधकार को मिटा देता है, वैसे ही एक दयालु कर्म हजारों हृदयों में प्रकाश फैला सकता है। आज जब दुनिया को हथियारों से नहीं, दिलों से जीतने की जरूरत है, तब दयालुता को जीवन का आधार बनाना सबसे बड़ी मानव सेवा है। करुणा वह सेतु है जो टूटे हुए संबंधों को जोड़ती है, घृणा को प्रेम में बदलती है और संघर्ष को सहयोग में परिवर्तित करती है। यही संतुलित, शांत और सुंदर जीवन की दिशा है। इसलिए विश्व दयालुता दिवस कोरा आयोजनात्मक न होकर प्रयोजनात्मक होना चाहिए, यह दिवस एक प्रेरणा है कि हम फिर से मनुष्य बनें, अपने भीतर की करुणा को जगाएं और दुनिया को प्रेम व सहानुभूति से भर दें। जब हम दूसरों के प्रति दयालु बनते हैं, तो हम न केवल समाज में शांति फैलाते हैं, बल्कि अपने भीतर भी दिव्यता का अनुभव करते हैं। यही दया का वास्तविक चमत्कार है-जो जीवन को संतुलित बनाता है और दुनिया को फिर से मानव बनाता है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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