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सोशल मीडिया का बढ़ता वर्चस्व और खोता हुआ बचपन

पिछले एक दशक में जिस सोशल मीडिया को आधुनिकता की उपलब्धि, अभिव्यक्ति की आजादी और वैश्विक संपर्क का सबसे बड़ा माध्यम माना गया था, उसी सोशल मीडिया ने अब अपने छिपे डरावने एवं वीभत्स चेहरे दिखाने शुरू कर दिए हैं। पश्चिमी देश, जो कल तक इसके गुणगान करते नहीं थकते थे, अब उसके दुष्परिणामों से भयभीत होने लगे हैं। यह भय यूं ही नहीं है-अनेक देशों में बच्चों की आत्महत्याओं, हिंसक व्यवहार, मानसिक विकारों, नशे जैसे डिजिटल व्यसनों और सामाजिक विकृतियों के बढ़ते आंकड़ों ने सोशल मीडिया की वास्तविकता का पर्दाफाश किया है। इसी पृष्ठभूमि में आस्ट्रेलिया की सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाकर विश्व-समुदाय को चेताया भी है और झकझोर भी दिया है।

सोशल मीडिया का बढ़ता वर्चस्व और खोता हुआ बचपन

उन्होंने सोशल मीडिया कंपनियों से वह अधिकार वापस ले लिए हैं, जिनके दुरुपयोग ने बच्चों के जीवन और अभिभावकों की मानसिक शांति को संकट में डाल दिया था। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह सुधार बच्चों को ‘बचपन जीने का अधिकार’ लौटाने के लिए है-उन जिंदगियों को नया मोड़ देने के लिए है जो सोशल मीडिया ने समय से पहले वयस्कता, अस्वस्थता, तनाव और विकृतियों में धकेल दी थीं। इतना ही नहीं, 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट नहीं हटाने पर लगभग पाँच करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान देश का रुख साफ करता है कि अब बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इस पहल के बाद पश्चिमी जगत में सुगबुगाहट बढ़ी है। ब्रिटेन से लेकर अमेरिका तक सवाल उठ रहे हैं कि यदि ऑस्ट्रेलिया यह साहस दिखा सकता है तो वे क्यों नहीं? यह सुगबुगाहट केवल सरकारों में ही नहीं है-उन अभिभावकों में भी है जिन्होंने सोशल मीडिया को अपने बच्चों की आत्महत्या, अवसाद और चरित्र-भंग का मूल कारण मानना शुरू कर दिया है। वास्तव में, इस संकट की शुरुआत तब हुई जब सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्मों ने बच्चों को आकर्षित करने के लिए ऐसे एल्गोरिद्म बनाए, जो उनका अधिकतम समय खाएं, उनकी जिज्ञासाओं को उकसाएं और उनके भीतर छिपी संवेदनशीलता का दोहन करके उन्हें सोशल मीडिया निर्भरता की स्थिति तक ले जाएं। इन प्लेटफॉर्मों पर वयस्क सामग्री, द्विअर्थी वीडियोज, हिंसक गेम्स, ‘लाइक-फॉलोअर’ जैसे डिजिटल भ्रमों का ऐसा सैलाब है जिसने बच्चों की मनोवैज्ञानिक संरचना को गहरी चोट पहुंचाई है। नतीजा यह है कि आज बच्चे समय से पहले वयस्क हो रहे हैं-शरीर से नहीं, मानसिकता से।

भारतीय परिवार-व्यवस्था, संस्कार और मूल्य-व्यवस्था इस संकट की चपेट में और तेजी से आए हैं। पहले जहां बच्चे माता-पिता, शिक्षक और संस्कारों से सीखते थे, आज वे ‘रील्स’ और ‘शॉर्ट वीडियोज’ एवं अश्लील सामग्री से सीख रहे हैं। जो सामग्री उनके सामने आ रही है, वह न भारतीय चरित्र से मेल खाती है न जीवन-मूल्यों से। निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा तैयार ये सामग्री बच्चों के मन में गलत आदर्श, गलत नायक और गलत आकांक्षाएं भर रही है। सवाल यह है कि क्या बच्चे स्वयं सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर रहे हैं, या सोशल मीडिया उन्हें एक सुनियोजित तरीके से अपनी गिरफ्त में ले रहा है? सच्चाई का उत्तर दूसरा है। इन प्लेटफॉर्मों पर अमर्यादित सामग्री की भरमार है-जिसे देखकर किशोरों में अपराधी प्रवृत्तियों की ओर उन्मुखता बढ़ रही है। ब्रह्मचर्य, संयम, अनुशासन और चरित्र जैसे भारतीय मूल्य हाशिये पर जा रहे हैं। इसके साथ-साथ एक गंभीर स्वास्थ्य-संकट जन्म ले रहा है। घंटों मोबाइल पकड़े बैठने से बच्चे शारीरिक सक्रियता से दूर हो रहे हैं। मोटापा, नींद की कमी, सिरदर्द, रीढ़ संबंधी विकार और यहां तक कि किशोरावस्था में मधुमेह जैसे रोगों के मामले बढ़ रहे हैं।

मानसिक रूप से स्थिति और भी भयावह है। लगातार स्क्रॉल करने की आदत बच्चों की एकाग्रता को चकनाचूर कर रही है। शिक्षा पर इसका सीधा दुष्प्रभाव दिखाई दे रहा है। जो बच्चे घंटों कल्पना-लोक में विचरण करते हैं, वे वास्तविकताओं से जूझते समय टूटने-बिखरने लगते हैं। उनकी सहनशक्ति कम हो रही है, आत्मविश्वास टूट रहा है, और असफलताओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ रही है-जो कई बार आत्महत्या जैसी भयावह प्रवृत्तियों को जन्म देती है। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। ऑनलाइन बुलिंग, ऑनलाइन ठगी, व्यभिचार से जुड़ी सामग्री, गुमराह करने वाले ‘इन्फ्लुएंसर’, फर्जी पहचान, ऑनलाइन हिंसा और डिजिटल व्यसन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कई बार बच्चे अपराधों में नहीं, बल्कि अपराधों के शिकार के रूप में फंसते हैं-लेकिन उन्हें बचाने वाला कोई नहीं दिखता। सोशल मीडिया कंपनियों का रवैया लापरवाह रहा है, क्योंकि उनका लक्ष्य बच्चों की सुरक्षा नहीं, बच्चों का उपयोग करके मुनाफा कमाना है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत में भी ऑस्ट्रेलिया जैसे कठोर कदम उठाए जाने चाहिए? उत्तर है-बिल्कुल होना चाहिए। और वह भी तुरंत।

भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा किशोरों और युवाओं का है। यदि यह पीढ़ी सोशल मीडिया के अंधाधुंध प्रभाव में ढल गई, तो भविष्य में हमें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। भारत की वह पहचान, जहां दुनिया भर में भारतीय प्रतिभा, अनुशासन और बुद्धिमत्ता की मिसाल दी जाती थी, वह धूमिल पड़ने लगेगी। यह संकट केवल सरकार का नहीं है-यह समाज, विद्यालयों, अभिभावकों और मीडिया-संस्थानों का संयुक्त संकट है। अभिभावकों को बच्चों को मोबाइल देना उनकी ‘मांग’ समझ में आता है, लेकिन उनको दिशा देना उनका कर्तव्य है। विद्यालयों को बच्चों को डिजिटल शिष्टाचार, डिजिटल योग्यता और डिजिटल अनुशासन के बारे में शिक्षित करना चाहिए। सरकार को सामाजिक जिम्मेदारी के साथ ऐसे नियम बनाने चाहिए, जिनमें सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बनाना पड़े।

ऑस्ट्रेलिया ने यह कर दिखाया। और दुनिया सहम गई। अब बारी भारत और अन्य देशों की है। क्योंकि बच्चों का बचपन सिर्फ उनका अधिकार नहीं-पूरे समाज का भविष्य है। यदि यह बचपन सोशल मीडिया के हाथों बर्बाद होता रहा, तो आने वाले दौर में जो विकृतियां जन्म लेंगी, वे केवल सामाजिक नहीं, राष्ट्रीय संकट बन जाएंगी। यह समय निर्णायक है। थोड़ी-सी भी देर-और समाज को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। ऑस्ट्रेलियाई पहल ने दुनिया को एक संदेश दे दिया है कि बच्चों को बचाने का समय अब आ गया है। भारत को भी साहसिक कदम उठाकर यह साबित करना होगा कि वह डिजिटल युग के दुष्परिणामों को समझता है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, स्वस्थ और संस्कारित वातावरण तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है। बचपन को बचाइए-क्योंकि यही वह आधार है जिस पर समाज, संस्कृति और सभ्यता खड़ी होती है। और यदि यह आधार कमजोर पड़ गया, तो भविष्य की कोई भी इमारत स्थायी नहीं रह सकती।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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