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अवैध कब्जे और बेघर होता भारतः एक अंतहीन राष्ट्रीय संकट

सरकारी भूमि पर अवैध अतिक्रमण की समस्या भारत में न तो नई है और न ही किसी एक क्षेत्र तक सीमित। यह एक ऐसी जटिल और बहुआयामी चुनौती है, जो शहरीकरण, पलायन, राजनीतिक स्वार्थ, प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक मजबूरियों के सम्मिलित परिणाम के रूप में सामने आती है। देश के लगभग हर राज्य, हर बड़े शहर और अनेक कस्बों में सरकारी जमीन पर मकान, दुकानें, झुग्गियां, गोदाम, यहां तक कि बड़े-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान और संस्थान खड़े मिल जाते हैं। वर्षों तक यह सब कुछ खुलेआम होता रहता है, लेकिन जिम्मेदार तंत्र या तो आंखें मूंदे रहता है या जानबूझकर चुप्पी साधे रहता है। जब अचानक विकास परियोजनाओं, सड़क चौड़ीकरण, रेलवे, मेट्रो, औद्योगिक गलियारों या स्मार्ट सिटी योजनाओं की जरूरत सामने आती है, तब सरकार की नींद खुलती है और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू होती है।

अवैध कब्जे और बेघर होता भारतः एक अंतहीन राष्ट्रीय संकट

इस प्रक्रिया में सबसे बड़ा संकट उन लोगों पर टूटता है, जो वर्षों से वहां रह रहे होते हैं और जिनका जीवन, आजीविका, शिक्षा और स्वास्थ्य उसी जमीन से जुड़ चुका होता है। हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क जैसे संगठनों के आंकड़े इस समस्या की भयावहता को उजागर करते हैं। वर्ष 2017 से 2023 के बीच साढ़े तीन लाख से अधिक मकानों पर बुलडोजर चलाए गए और करीब सोलह लाख लोग बेघर हुए। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि आने वाले समय में लगभग 1.7 करोड़ लोग ऐसे दायरे में हैं, जिनके घर विकास परियोजनाओं या अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के कारण टूट सकते हैं। इनमें से बड़ी संख्या उन लोगों की है, जिन्होंने अपनी जीवनभर की पूंजी लगाकर घर बनाए, बच्चों को स्कूल में डाला, आसपास रोजगार तलाशा और एक स्थायी जीवन की कल्पना की। जब ये घर टूटते हैं तो केवल दीवारें नहीं गिरतीं, बल्कि पूरे परिवार की सामाजिक और आर्थिक संरचना ढह जाती है।

अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को प्रायः एक आवश्यक प्रशासनिक कदम के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन इसके मानवीय पक्ष को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। बेघर होना केवल सिर से छत छिनने की समस्या नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की संभावनाओं पर सीधा प्रहार है। बच्चों की पढ़ाई बीच में छूट जाती है, महिलाएं असुरक्षा और अस्थिरता के भय में जीने लगती हैं, बुजुर्ग इलाज और सहारे से वंचित हो जाते हैं और पुरुष वर्ग बेरोजगारी तथा मानसिक तनाव से जूझने लगता है। पुनर्वास योजनाएं कागजों पर तो आकर्षक लगती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में वे या तो अधूरी होती हैं या इतनी दूरस्थ जगहों पर लागू की जाती हैं कि वहां रोजगार और बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहता है। इस पूरी समस्या का एक कड़वा सच यह भी है कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण एक दिन या एक रात में नहीं हो जाता।

यह एक लंबी प्रक्रिया होती है, जिसमें प्रशासनिक उदासीनता, स्थानीय स्तर पर मिलीभगत और राजनीतिक संरक्षण की बड़ी भूमिका होती है। जब गांवों से पलायन कर गरीब परिवार शहरों की ओर आते हैं, तो उन्हें सबसे पहले सस्ती या खाली जमीन की तलाश होती है। सरकारी जमीन इस दृष्टि से सबसे आसान निशाना बनती है। पहले अस्थायी झोपड़ियां खड़ी होती हैं, फिर धीरे-धीरे पक्के मकान, दुकानें और अन्य निर्माण होने लगते हैं। सरकारी एजेंसियां एवं जिम्मेदार तो तब ही हरकत में आते हैं जब या तो कोई हादसा होता है या फिर विकास कार्यों के दौर में इन्हें हटाने की जरूरत पड़ती है। महज सात साल में 16 लाख लोगों के बेघर होने का आंकड़ा छोटा नहीं है। इनमें भी 58 प्रतिशत से ज्यादा के बेघर होने की वजह अतिक्रमण ही है। सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के मामलों की मिलीभगत से अनदेखी होती है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। बिजली, पानी, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसी सुविधाएं भी किसी न किसी रास्ते से मिल जाती हैं, जिससे यह अतिक्रमण धीरे-धीरे ‘वैधता’ का भ्रम पैदा करने लगता है।

इस पूरी प्रक्रिया में भू-माफिया की भूमिका भी बेहद खतरनाक है। वे सरकारी जमीनों की पहचान कर गरीबों को वहां बसाते हैं, उनसे पैसे वसूलते हैं और बाद में राजनीतिक संरक्षण के जरिए उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखते हैं। चुनाव आते ही ये बस्तियां वोट बैंक में बदल जाती हैं। इस राजनीतिक खेल में न तो कानून की प्रतिष्ठा बचती है और न ही आम नागरिकों का भविष्य सुरक्षित रहता है। अतिक्रमण हटाने के बाद होने वाले नुकसान को यदि समग्र रूप से देखा जाए तो यह केवल प्रभावित परिवारों का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे देश का नुकसान है। एक ओर लोग अपने सीमित संसाधनों से घर बनाते हैं, दूसरी ओर सरकार अतिक्रमण हटाने पर भारी खर्च करती है। यदि शुरुआत में ही सरकारी भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, समय पर निगरानी हो और अवैध कब्जे को बढ़ने से रोका जाए, तो यह दोहरा नुकसान टाला जा सकता है। दुर्भाग्य से हमारे यहां किसी परियोजना की घोषणा और उसके क्रियान्वयन के बीच लंबा अंतराल रहता है, जिसका फायदा अतिक्रमणकारी उठाते हैं। वर्षों तक जमीन खाली पड़ी रहती है और देखते ही देखते वहां एक पूरी बस्ती खड़ी हो जाती है।

विकास के लिए कई बार राह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए विध्वंस की कार्रवाई जरूरी हो जाती है। लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए केवल बुलडोजर चलाना पर्याप्त नहीं है। जरूरत एक ऐसी दूरदर्शी नीति की है, जिसमें अतिक्रमण रोकने की व्यवस्था शुरुआत से ही सख्त और प्रभावी हो। सरकारी जमीनों का डिजिटल रिकॉर्ड, नियमित सर्वेक्षण, स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही और दोषी अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई इस दिशा में जरूरी कदम हो सकते हैं। साथ ही शहरी गरीबों के लिए सस्ती आवास योजनाओं को वास्तविक जरूरतों के अनुरूप और रोजगार के करीब लागू करना भी उतना ही जरूरी है, ताकि वे मजबूरी में अवैध कब्जे की ओर न जाएं। राजनीतिक दलों को भी इस मुद्दे पर ईमानदार आत्ममंथन करना होगा। वोट बैंक की राजनीति के लिए अवैध अतिक्रमण को संरक्षण देना अंततः समाज और शासन दोनों के लिए घातक सिद्ध होता है।

यदि कानून का पालन सभी के लिए समान रूप से हो और अवैध कब्जे को किसी भी स्तर पर समर्थन न मिले, तो ऐसी स्थितियां स्वतः कम होंगी। सरकारी भूमि जनता की साझा संपत्ति है और इसका उपयोग योजनाबद्ध विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए होना चाहिए, न कि अव्यवस्था और अवैध कब्जों के लिए। अंततः सवाल यही है कि क्या हम समस्या के मूल कारणों पर गंभीरता से विचार करेंगे या हर बार बुलडोजर के बाद कुछ दिनों की संवेदना दिखाकर आगे बढ़ जाएंगे। यदि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे की प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया, तो आने वाले वर्षों में बेघर होने वालों की संख्या और बढ़ेगी, सामाजिक असंतोष गहराएगा और विकास का दावा खोखला साबित होगा। जरूरत इस बात की है कि सरकार, प्रशासन, राजनीतिक दल और समाज मिलकर इस जटिल समस्या का मानवीय, न्यायपूर्ण और दूरगामी समाधान तलाशें, ताकि विकास भी हो और किसी का जीवन उजड़ने से भी बच सके।

समुचित देश एवं विभिन्न प्रांतो में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके लोगों ने न केवल अपने मकान बने कुछ भी खड़े कर लिए हैं कुछ व्यापारिक संस्थान और कुछ संस्थाएं भी संचालित हो रही है जब सरकार की नींद खुलती है तो इन सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण करके बनाए गए मकान में रहने वाले लोगों को बेघर किया जाता है या उन्हें अन्यत्र बसाने की योजनाएं लागू की जाती है जिससे इन परिवारों और उनके सदस्यों की न केवल बेघर होने की समस्या खड़ी होती है बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएं भी खड़ी होती है इन गतिविधियों को संचालित करने में विभिन्न राजनीतिक दलों को अपना वोट वोट बैंक दिखाई देता है और यह राजनीतिक दल ही ऐसी सरकारी भूमि पर लोगों को बचाने के षड्यंत्र करते हैं फिर उन्हें विस्थापित होने पर आंदोलन खड़े किए जाते हैं और अन्यत्र बसाने की मांग की जाती है यह भारत की एक जटिल समस्या है। क्यों नहीं सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा होने की स्थितियों को सरकार पहले से ही गंभीरता से लेती?

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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