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अशांति के कोलाहल में शांति का शंखनाद है मौन

-मौनी अमावस्या- 18 जनवरी, 2026-

मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं है, वह आत्मा की सबसे सघन भाषा है। 18 जनवरी 2026 को आने वाली मौनी अमावस्या इसी मौन की महत्ता को जीवन के केंद्र में प्रतिष्ठित करने का पावन, सिद्ध एवं पवित्र अवसर है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मौन को जितना ऊँचा स्थान दिया गया है, उतना शायद किसी अन्य साधना को नहीं। ऋषियों ने कहा है कि जहाँ शब्द समाप्त होते हैं, वहीं से सत्य आरंभ होता है। मौन वही बिंदु है जहाँ मन की चंचल तरंगें थमती हैं और चेतना का निर्मल सरोवर प्रकट होता है। यह जीवन का सौंदर्य भी है और ऊर्जा का अक्षय भंडार भी। मौन में शक्ति संचित होती है, दिशा मिलती है और अध्यात्म को गति प्राप्त होती है।

अशांति के कोलाहल में शांति का शंखनाद है मौन

मौनी अमावस्या का संबंध केवल कैलेंडर की एक तिथि से नहीं, बल्कि जीवन के गहरे अनुशासन से है। यह दिन मनुष्य को बाहरी कोलाहल से हटाकर अंतर्मुखी होने का निमंत्रण देता है। मौन का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति निष्क्रिय हो जाए, बल्कि यह कि उसकी चेतना जाग्रत हो जाए। जब वाणी विश्राम करती है, तब विवेक बोलने लगता है। मनुष्य का मन, जो सामान्यतः अतीत और भविष्य के बीच भटकता रहता है, मौन में वर्तमान में टिकना सीखता है। यही एकाग्रता आत्मशुद्धि का द्वार खोलती है। मौन साधना है, तप है और जीवन की आध्यात्मिक ऊँचाई है।

मौनी अमावस्या को अमावस्या का भी विशेष महत्व है। अमावस्या का अंधकार बाहरी रूप से भले ही रिक्तता का संकेत दे, परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से यह भीतर की यात्रा का प्रतीक है। जब चंद्रमा अदृश्य होता है, तब मनुष्य के भीतर का चंद्र प्रकट होने की संभावना बनती है। मौन और अमावस्या का यह संयोग आत्मचिंतन को अत्यंत प्रभावशाली बना देता है। इस दिन किया गया मौन-व्रत केवल वाणी का संयम नहीं, बल्कि विचारों का परिष्कार भी है। विचारों की शुद्धि से ही कर्म शुद्ध होते हैं और कर्मों की शुद्धि से जीवन पवित्र बनता है। मौनी अमावस्या का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष पितृ तर्पण और पिंडदान से जुड़ा है। भारतीय संस्कृति में पितरों को केवल अतीत की स्मृति नहीं माना गया, बल्कि वे हमारी चेतना की जड़ें हैं। जिनसे हमें जीवन मिला, जिनके संस्कार हमारे रक्त में प्रवाहित हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना आध्यात्मिक दायित्व है। इस दिन पवित्र नदियों के तट पर या श्रद्धा के साथ घर में किया गया तर्पण और पिंडदान पितरों की आत्मा को शांति प्रदान करता है। ऐसा माना जाता है कि मौनी अमावस्या के दिन किए गए तर्पण से पितृलोक में विशेष संतोष और तृप्ति का संचार होता है।

तर्पण केवल जल अर्पण की क्रिया नहीं है, वह स्मरण की साधना है। जब संतति अपने पूर्वजों को श्रद्धा से याद करती है, तो एक अदृश्य सेतु बनता है जो पीढ़ियों को जोड़ता है। पिंडदान के माध्यम से पितरों की अधूरी कामनाओं को पूर्णता की दिशा मिलती है और उन्हें मोक्ष की ओर अग्रसर होने में सहायता प्राप्त होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि मौनी अमावस्या के दिन किया गया पिंडदान अनेक अमावस्याओं के फल के बराबर होता है, क्योंकि इस दिन मौन की ऊर्जा कर्म को कई गुना प्रभावशाली बना देती है। इस दिन मौन के साथ किया गया तर्पण साधक के भीतर भी गहरा परिवर्तन लाता है। जब व्यक्ति मौन रहकर पितरों का स्मरण करता है, तो उसका अहंकार स्वतः झुक जाता है। उसे यह बोध होता है कि वह अकेला नहीं है, बल्कि एक लंबी परंपरा की कड़ी है। यह बोध जीवन में विनम्रता, करुणा और संतुलन को जन्म देता है। मौन की शांति में किया गया स्मरण केवल पितरों को ही नहीं, स्वयं साधक को भी मुक्त करता है। वह अपने भीतर जमी अनेक ग्रंथियों को खोल पाता है।

मौनी अमावस्या पर मौन धारण करना मन को एकाग्र करने का सशक्त साधन है। मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष अपने ही मन से है। वाणी जब निरंतर सक्रिय रहती है, तो मन भी बाहर की ओर दौड़ता रहता है। मौन उसे भीतर लौटने का अवसर देता है। इस दिन यदि व्यक्ति कुछ समय के लिए पूर्ण मौन रखे, ध्यान करे, जप करे या केवल श्वास के आवागमन को साक्षी भाव से देखे, तो आत्मा पर जमी धूल स्वतः झड़ने लगती है। यही आत्मशुद्धि है, यही साधना का सार है। मौन जीवन को सुंदर बनाता है क्योंकि वह अनावश्यक को हटाता है। जहाँ मौन है, वहाँ क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष स्वतः क्षीण हो जाते हैं। मौन शक्ति का केंद्र इसलिए है क्योंकि वह ऊर्जा को व्यर्थ बिखरने नहीं देता। जो ऊर्जा शब्दों में नष्ट होती है, वही मौन में संचित होकर साधना बन जाती है। इसी संचित ऊर्जा से व्यक्ति अपने जीवन को ऊँचाई देता है। मौन अध्यात्म की गति है क्योंकि यह सीधे आत्मा से जुड़ता है, किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।

वस्तुतः आध्यात्मिक क्षेत्र में मौन का एक विशिष्ट और अपरिहार्य स्थान है। यह कोई साधारण चुप्पी नहीं, बल्कि एक अत्यंत व्यवस्थित और वैज्ञानिक साधना है, जिसे अपनाकर साधक अपनी चित्त-वृत्तियों को विक्षेप से बचा लेता है। मौन के अभ्यास से जीवनी शक्ति और प्राण शक्ति परिपुष्ट होती है। व्यक्ति अपने भीतर एक नई स्फूर्ति, नई ताजगी और आंतरिक ऊर्जा का अनुभव करता है। निरंतर बोलते रहने से न केवल वाणी की प्रभावशीलता क्षीण होती है, बल्कि उससे मस्तिष्क की सूक्ष्म शक्तियों का भी अनावश्यक क्षय होता है। मौन के द्वारा वाणी सुरक्षित होती है, परिष्कृत होती है और उसमें गहन प्रभाव उत्पन्न होता है। अध्यात्म क्षेत्र में जिस वाक्-सिद्धि की चर्चा की जाती है, उसका मूल आधार भी मौन-साधना ही है। कम बोलने वाला व्यक्ति जब बोलता है, तो उसके शब्दों में स्वतः ही वजन और प्रभाव आ जाता है।

महात्मा गांधी अपने जीवन में मौन को विशेष महत्व देते थे। उनकी आत्मकथा से ज्ञात होता है कि वे प्रति सप्ताह एक दिन मौन रखते थे। उनका अनुभव था कि मौन से उन्हें गहरा विश्राम मिलता है और कार्य करने के लिए नई शक्ति का संचार होता है। इसी प्रकार आचार्य तुलसी भी प्रायः प्रतिदिन नियमित रूप से मौन-साधना करते थे। वे कहा करते थे कि मौन से उन्हें अपूर्व आंतरिक आनंद की अनुभूति होती है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि यदि मौन-साधना के साथ मनोवृत्तियों को आत्मचिंतन में लगा दिया जाए, तो आध्यात्मिक आनंद का निर्झर स्वतः प्रवाहित होने लगता है। महान संत महर्षि रमण के विषय में प्रसिद्ध है कि वे प्रायः मौन ही रहते थे, किंतु उस मौन में इतनी गहन संप्रेषण शक्ति थी कि उनके समीप आने वाले जिज्ञासुओं की जटिलतम समस्याओं का समाधान बिना शब्दों के ही हो जाता था। वस्तुतः मौन एक अंतर्भाषा है-ऐसी भाषा जो शब्दों से परे होकर सीधे आत्मा से संवाद करती है। प्राचीन ऋषि-मुनि अपने शिष्यों को मौन के माध्यम से ही उपदेश देते थे। मौन-साधना से वे सभी सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं, जिनकी प्राप्ति के लिए अन्य कठिन योग-साधनाओं का सहारा लेना पड़ता है। मौन, साधना का शिखर भी है और साधना का आधार भी।

मौनी अमावस्या हमें यह सिखाती है कि जीवन की वास्तविक प्रगति बाहरी उपलब्धियों से नहीं, भीतर की शांति से मापी जाती है। इस दिन का संदेश स्पष्ट है कि कुछ क्षण रुकिए, मौन में उतरिए और अपने मूल से जुड़िए। पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर, उनके लिए तर्पण और पिंडदान कर, और स्वयं के लिए मौन साधना अपनाकर मनुष्य अपने जीवन को संतुलित और सार्थक बना सकता है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि मौन कोई रिक्तता नहीं, बल्कि पूर्णता है, कोई कमजोरी नहीं, बल्कि अपार शक्ति है। अंततः मौनी अमावस्या आत्मा का पर्व है। यह न केवल पितरों को मोक्ष की दिशा में ले जाने वाला अवसर है, बल्कि जीवित मनुष्य के लिए भी आंतरिक मुक्ति का द्वार है। मौन के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के शोर से मुक्त होता है, और जब भीतर शांति स्थापित होती है, तभी जीवन में सत्य, करुणा और चेतना का प्रकाश फैलता है। मौनी अमावस्या हमें इसी प्रकाश की ओर अग्रसर होने का मौन आमंत्रण देती है। अशांति के कोलाहल में शांति का शंखनाद है मौन।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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