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शांति का मुखौटा, सत्ता की रणनीतिः ट्रंप का वैश्विक विरोधाभास

नोबेल शांति पुरस्कार की उत्कट अभिलाषा में डूबे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का व्यक्तित्व और कार्यशैली वैश्विक राजनीति के लिए एक गहरी विडंबना एवं विरोधाभास बनकर उभरी है। शांति का मसीहा बनने का उनका दावा जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही विरोधाभासी उनके कदमों का यथार्थ है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में वे जहां शांति स्थापित करने का श्रेय लेना चाहते हैं, वहीं उनके निर्णय, वक्तव्य और नीतियां अक्सर युद्ध, अशांति, भय और अस्थिरता को जन्म देती दिखाई देती हैं। यह कैसी शांति है, जो बमों की गूंज, प्रतिबंधों की मार और नफरत की भाषा के साथ चलती है? यह कैसा शांति-दूत होने का नाटक है, जिसमें मानवता का रक्त बहता रहे और सत्ता अपने हित साधती रहे? गाजा में शांति स्थापना के लिए ट्रंप की प्रस्तावित योजना इसी विरोधाभास का नवीन उदाहरण है।

शांति का मुखौटा, सत्ता की रणनीतिः ट्रंप का वैश्विक विरोधाभास

इसे शांति से अधिक व्यापारिक सौदे की तरह प्रस्तुत किया गया, मानो दशकों से हिंसा, विस्थापन और अस्मिता के संकट से जूझ रहे लोगों का भविष्य किसी रियल एस्टेट या आर्थिक पैकेज से तय किया जा सकता हो। अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, स्थानीय जनता की सहमति और जवाबदेही-इन सबको दरकिनार कर शांति थोपने की यह कोशिश बताती है कि ट्रंप की दृष्टि में शांति कोई नैतिक या मानवीय मूल्य नहीं, बल्कि शक्ति-प्रदर्शन और राजनीतिक लाभ का औजार है।  इस तरह बमों के साये में शांति का दावा डकोसला ही है, जिसमें शांति का सौदा एवं सत्ता की भूख ही दिखती है। ट्रंप की कथित शांति योजना, शांति के नाम पर वर्चस्व की राजनीति ही है। ऐसा  लगता है शब्द अहिंसा के और कर्म हिंसा के है। ट्रंप संयुक्त राष्ट्र को अक्षम, पक्षपाती और नौकरशाही से ग्रस्त बताकर उसकी अवहेलना करते रहे हैं, जबकि सच यह है कि वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए बहुपक्षीय संस्थाओं का ढांचा अनिवार्य है। शक्तिशाली देशों को जब यह ढांचा अपने अनुकूल नहीं लगता, तो वे उसे कमजोर करने लगते हैं-ट्रंप इसी प्रवृत्ति का मुखर चेहरा हैं।

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित नए वैश्विक शांति संस्थान का विचार अपने आप में जितना आकर्षक शब्दों से सुसज्जित है, उतना ही अपने अंतर्विरोधों में उलझा हुआ भी है। शांति स्थापना के नाम पर एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय संस्था खड़ी करने की कोशिश, जो संयुक्त राष्ट्र जैसे स्वीकृत बहुपक्षीय ढांचे को दरकिनार करती हो, वस्तुतः शांति से अधिक सत्ता-केंद्रित वर्चस्व की आकांक्षा को उजागर करती है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जिस नेतृत्व की नीतियों का आधार हथियारों के निर्माण और बिक्री, सैन्य गठबंधनों के विस्तार, युद्ध की धमकियों और आर्थिक दंड के जरिये दुनिया पर दबाव बनाना रहा हो, वह अचानक शांति का नया ठेकेदार कैसे बन सकता है? ट्रंप की राजनीतिक सोच में शांति किसी मानवीय प्रतिबद्धता का नहीं, बल्कि सौदेबाजी, नियंत्रण और लाभ का साधन प्रतीत होती है। इसलिए उनके प्रस्तावित शांति संस्थान की उपयोगिता पर गंभीर संदेह खड़ा होता है। बिना वैधता, जवाबदेही और वैश्विक सहमति के खड़ी की गई कोई भी संस्था शांति का वाहक नहीं बन सकती; वह केवल शक्तिशाली देशों की इच्छाओं को थोपने का उपकरण या जरिया ही बनती है। इस संदर्भ में ट्रंप का यह प्रयास शांति की दिशा में एक ठोस पहल नहीं, बल्कि हिंसा-प्रधान नीतियों पर पर्दा डालने और वैश्विक शासन व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत करने का एक और षडयंत्र एवं कुचेष्टा ही दिखाई देता है।

ट्रंप की सोच में शांति का अर्थ संघर्षों का समाधान नहीं, बल्कि उन्हें अपने पक्ष में मोड़ना है। कभी वे संयुक्त राष्ट्र के समानांतर इस तरह की एक कथित शांति-व्यवस्था खड़ी करने की बात करते हैं, तो कभी ईरान पर युद्ध की धमकी देते हैं। एक ओर वे यूरोपीय देशों की तारीफ कर अपना प्रभाव जमाने का प्रयास करते हैं, दूसरी ओर उन्हीं देशों पर व्यापारिक प्रतिबंधों और सैन्य खर्च का दबाव डालते हैं। यह दोहरा आचरण और कथनी और करनी का भेद वैश्विक अस्थिरता को बढ़ाता है। शांति की भाषा बोलते हुए हथियारों की बिक्री, सैन्य गठबंधनों का विस्तार और आर्थिक दंड-ये सब उनकी नीतियों के अभिन्न अंग रहे हैं। परिणामस्वरूप दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां युद्ध की आहटें तेज हैं और मानवता अस्तित्व के मुहाने पर पहुंचती प्रतीत होती है।

गाजा संकट के संदर्भ में यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि बिना वैधता, सहमति और जवाबदेही के थोपी गई शांति कभी स्थायी नहीं होती। यदि नागरिकों की सुरक्षा, जीवन की गरिमा और राजनीतिक अधिकारों को नजरअंदाज किया जाए, तो कोई भी समझौता खोखला साबित होगा। ट्रंप का दृष्टिकोण इन मूलभूत सच्चाइयों को अक्सर अनदेखा करता है। आर्थिक वादों को राजनीतिक अधिकारों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना एक खतरनाक भ्रम है, जो जमीनी वास्तविकताओं के बोझ से ढह जाता है। शांति तभी टिकाऊ हो सकती है जब उसमें स्थानीय लोगों की वास्तविक आवाज शामिल हो, उनके दुख-दर्द को समझा जाए और न्यायपूर्ण समाधान की दिशा में ईमानदार पहल हो।

भारत को गाजा में शांति प्रयासों में शामिल करने का प्रस्ताव भी इसी जटिलता को उजागर करता है। भारत का कूटनीतिक इतिहास बहुपक्षवाद, संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका और द्विराष्ट्र सिद्धांत के समर्थन से जुड़ा रहा है। भारत के इस्राइल से अच्छे संबंध हैं, तो अरब देशों में भी उसकी विश्वसनीयता बनी हुई है। लेकिन यदि शांति प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार करती है, तो यह भारत की स्थापित कूटनीतिक परंपरा के अनुकूल नहीं होगा। भारत ने हमेशा प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बजाय स्थिरता और संवाद को प्राथमिकता दी है। ऐसे में ट्रंप-प्रेरित पहल में शामिल होना भारत के लिए भी एक नैतिक और रणनीतिक चुनौती बन सकता है। वास्तव में ट्रंप की नीतियां एक ऐसे विश्व-दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती हैं, जहां शक्ति ही सत्य है और नैतिकता केवल भाषणों तक सीमित है।

उनकी बयानबाजी में नफरत और विभाजन की छाया साफ दिखती है। आप्रवासन, नस्ल, धर्म और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर उनकी भाषा ने वैश्विक स्तर पर असहिष्णुता को बढ़ावा दिया। जब विश्व का सबसे शक्तिशाली देश इस तरह का संदेश देता है, तो उसका असर सीमाओं से परे जाता है। युद्ध केवल गोलियों और मिसाइलों से नहीं लड़ा जाता, वह विचारों और शब्दों से भी लड़ा जाता हैकृऔर ट्रंप के शब्द अक्सर आग में घी डालने का काम करते रहे हैं। आज दुनिया जिन संकटों से जूझ रही है-यूक्रेन से लेकर मध्य पूर्व तक, एशिया से अफ्रीका तक, उनमें कहीं-न-कहीं महाशक्तियों की स्वार्थपूर्ण नीतियों की छाया है। ट्रंप का दौर इस प्रवृत्ति को और उग्र बनाता दिखाई दिया, जहां वैश्विक सहयोग के बजाय ‘मैं पहले’ की मानसिकता हावी रही। शांति के नाम पर दबाव, सौदेबाजी और धमकी-यह त्रयी मानवता के लिए घातक है।

जो नेता स्वयं को शांति का प्रतीक बताता है, उससे अपेक्षा होती है कि वह पुल बनाए, दीवारें नहीं; संवाद बढ़ाए, युद्ध नहीं; भरोसा पैदा करे, भय नहीं। इस तरह प्रश्न यही है कि क्या शांति पुरस्कार की आकांक्षा मात्र से कोई शांति-दूत बन सकता है? यदि जवाबदेही, सहमति और मानवीय मूल्यों के बिना शांति थोपने की कोशिश की जाए, तो वह शांति नहीं, एक नया संघर्ष जन्म देती है। ट्रंप की कार्यशैली इसी सच्चाई की गवाही देती है। आज जब मानवता युद्धों में अपने जीवन को खो रही है, तब शांति का ढोंग और भी क्रूर प्रतीत होता है। दुनिया को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो शक्ति के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि करुणा, न्याय और बहुपक्षीय सहयोग से शांति की राह प्रशस्त करे। अन्यथा शांति मसीहा होने का यह नाटक इतिहास में एक विफल और खतरनाक प्रयोग के रूप में ही दर्ज होगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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