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बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन की वैचारिक क्रांति

बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर इतिहास के मोड़ पर खड़ी है। लगभग दो दशकों के लंबे अंतराल के बाद यदि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में लौटती है और तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद की दावेदारी तक पहुंचते हैं, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा परिवर्तन का संकेत होगा। 299 सीटों में से 212 पर विजय का दावा इस बात का प्रमाण है कि मतदाता लंबे समय से चली आ रही अस्थिरता, अंतरिम व्यवस्थाओं और वैचारिक ध्रुवीकरण से बाहर निकलकर एक निर्णायक जनादेश देना चाहता है। छात्र आंदोलन से उपजी नेशनल सिटीजन पार्टी का मात्र छह सीटों पर सिमटना भी इस तथ्य को पुष्ट करता है कि जनभावना प्रयोगधर्मिता से आगे बढ़कर स्थायित्व की ओर झुक रही है। लगभग अठारह महीने से चल रही अंतरिम व्यवस्था के अवसान के साथ बांग्लादेश एक नए अध्याय में प्रवेश करने जा रहा है, पर प्रश्न यह है कि यह अध्याय उदार लोकतंत्र का होगा या किसी नए प्रकार के वैचारिक वर्चस्व का?

बांग्लादेश का इतिहास संघर्ष, त्याग और पहचान की जिजीविषा से निर्मित हुआ है। 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत की निर्णायक भूमिका केवल सैन्य सहायता तक सीमित नहीं थी, वह सांस्कृतिक और मानवीय सहयोग का भी प्रतीक थी। परंतु पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक धु्रवीकरण, कट्टरवादी विमर्श और बाहरी प्रभावों ने उस ऐतिहासिक आत्मीयता पर धुंध डालने का प्रयास किया। अंतरिम सरकार के दौरान जिस प्रकार वैचारिक कठोरता और प्रशासनिक असमंजस दिखा, उसने अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने दोनों को प्रभावित किया। ऐसे समय में स्पष्ट जनादेश को स्थिरता का अवसर माना जा सकता है, बशर्ते सत्ता इसे प्रतिशोध का माध्यम न बनाए, बल्कि पुनर्निर्माण का औजार बनाए।

तारिक रहमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती सांप्रदायिक सौहार्द की पुनस्र्थापना होगी। बांग्लादेश का सामाजिक ढांचा बहुलतावादी है, वहां अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और सम्मान केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वसनीयता की कसौटी है। यदि नई सरकार कट्टरवाद से दूरी बनाकर विकासोन्मुखी एजेंडा अपनाती है, तो वह न केवल आंतरिक स्थिरता ला सकती है, बल्कि दक्षिण एशिया में एक सकारात्मक उदाहरण भी प्रस्तुत कर सकती है। पर यदि चुनावी विजय को वैचारिक वर्चस्व के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो यह जनादेश अवसर से अधिक संकट में बदल सकता है।

आर्थिक मोर्चे पर बांग्लादेश ने पिछले दशक में उल्लेखनीय प्रगति की थी। वस्त्र उद्योग, निर्यात वृद्धि और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में उसने मिसाल कायम की। किंतु राजनीतिक अस्थिरता और नीतिगत अनिश्चितता ने निवेशकों के विश्वास को झटका दिया। अब नई सरकार के लिए यह अनिवार्य है कि वह आर्थिक सुधारों को गति दे, रोजगार सृजन पर ध्यान केंद्रित करे और विदेशी निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनाए। विकास की “नई गंगा” तभी बहेगी जब शासन पारदर्शी, जवाबदेह और समावेशी होगा। केवल नारे या राष्ट्रवाद की तीखी ध्वनियां आर्थिक संकट का समाधान नहीं बन सकतीं।

भारत-बांग्लादेश संबंध इस चुनाव के सबसे महत्वपूर्ण आयामों में से एक हैं। दोनों देशों के बीच साझा इतिहास, सांस्कृतिक निकटता और आर्थिक परस्परता है। सीमा प्रबंधन, जल बंटवारा, व्यापार और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दे परस्पर विश्वास से ही सुलझ सकते हैं। हाल के वर्षों में पाकिस्तान के साथ बढ़ती निकटता और भारत के प्रति संदेहपूर्ण बयानबाजी ने संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा किया। यदि नई सरकार क्षेत्रीय संतुलन की नीति अपनाते हुए भारत के साथ सौहार्दपूर्ण संवाद पुनः स्थापित करती है, तो यह दोनों देशों के हित में होगा। भारत ने बांग्लादेश के निर्माण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उस ऐतिहासिक साझेदारी को भावनात्मक नहीं, व्यावहारिक आधार पर पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

यह भी ध्यान रखना होगा कि दक्षिण एशिया की राजनीति अब केवल द्विपक्षीय समीकरणों तक सीमित नहीं है। चीन की बढ़ती उपस्थिति, अमेरिका की रणनीतिक रुचि और पाकिस्तान की पारंपरिक भूमिका-इन सबके बीच बांग्लादेश को संतुलित कूटनीति अपनानी होगी। यदि नई सरकार वैचारिक आग्रहों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखती है, तो वह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में एक परिपक्व भूमिका निभा सकती है। परंतु यदि विदेश नीति घरेलू राजनीति का विस्तार बन गई, तो अस्थिरता का चक्र फिर दोहराया जा सकता है।

इस चुनाव का एक और महत्वपूर्ण संकेत यह है कि बांग्लादेश का मतदाता अब निर्णायकता चाहता है। लंबे समय तक आंदोलन, विरोध और अंतरिम प्रयोगों से थका समाज स्थिर शासन की आकांक्षा रखता है। किंतु स्थिरता केवल बहुमत से नहीं आतीय वह संस्थाओं की मजबूती, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और मीडिया की स्वायत्तता से आती है। नई सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं, बल्कि असहमति को सम्मान देने की संस्कृति का नाम है। यदि विपक्ष को हाशिये पर धकेला गया या आलोचना को देशविरोध का रूप दिया गया, तो लोकतांत्रिक ऊर्जा क्षीण हो जाएगी।
बांग्लादेश के लिए यह क्षण आत्ममंथन का भी है। क्या वह अपनी पहचान को केवल धार्मिक राष्ट्रवाद तक सीमित करेगा, या भाषा, संस्कृति और बहुलता की उस विरासत को आगे बढ़ाएगा जिसने उसे जन्म दिया? मुक्ति संग्राम की मूल भावना सामाजिक न्याय और समान अवसर की थी। यदि नई सत्ता उस भावना को पुनर्जीवित करती है, तो यह जनादेश ऐतिहासिक सिद्ध होगा। अन्यथा यह अवसर भी इतिहास की एक और चूकी हुई संभावना बन सकता है।

भारत की दृष्टि से भी यह चुनाव महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली को प्रतिक्रिया में उतावलापन नहीं, बल्कि धैर्य और कूटनीतिक परिपक्वता दिखानी होगी। पड़ोसी देश की संप्रभुता और जनादेश का सम्मान करते हुए सहयोग का हाथ बढ़ाना ही दीर्घकालिक हित में है। सीमा पार आतंकवाद, अवैध घुसपैठ और तस्करी जैसे मुद्दों पर सख्ती के साथ-साथ आर्थिक और सांस्कृतिक संवाद को भी सुदृढ़ करना होगा। संबंधों में भावनात्मकता के बजाय व्यावहारिकता और पारस्परिक सम्मान की नींव आवश्यक है।
अंततः यह चुनाव बांग्लादेश के लिए निर्णायक इसलिए है क्योंकि यह केवल सरकार बदलने का अवसर नहीं, बल्कि शासन की शैली और राष्ट्रीय दिशा तय करने का क्षण है। यदि नई सरकार कट्टरवाद से मुक्त, समावेशी और विकासोन्मुखी नीति अपनाती है, तो वह बांग्लादेश को स्थिरता और समृद्धि के पथ पर अग्रसर कर सकती है। परंतु यदि वह अतीत की कटु स्मृतियों और वैचारिक आग्रहों में उलझी रही, तो जनादेश की सार्थकता संदिग्ध हो जाएगी। बांग्लादेश को अब नई संभावनाओं, नई सोच और नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ना है। यही इस चुनाव का संदेश है और यही उसकी वास्तविक परीक्षा भी।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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