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धर्मक्रांति का विलक्षण प्रयोग है योगक्षेम वर्ष

आज का युग विज्ञान, तकनीक और भौतिक प्रगति का युग माना जाता है, लेकिन इसी के साथ यह युग तनाव, असंतोष, हिंसा, युद्ध और मानसिक अशांति का भी युग बन गया है। मनुष्य ने बाहर की दुनिया को जीत लिया, लेकिन अपने भीतर की दुनिया को जीत नहीं पाया। उसने साधन बना लिये, लेकिन साधना भूल गया; उसने सुविधा पा ली, लेकिन शांति खो दी। ऐसे समय में यदि कोई आध्यात्मिक आंदोलन मनुष्य को अपने भीतर की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है, तो वह केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि धर्म क्रांति का आधार बन जाता है। इसी संदर्भ में जैन धर्म एवं दर्शन की तप, त्याग, साधना और अहिंसा की महान परंपरा में एवं महान् संत आचार्य श्री महाश्रमण के सान्निध्य में मनाया जा रहा योगक्षेम वर्ष वास्तव में धर्म क्रांति के नए अध्याय का आधार बनता दिखाई देता है। भारत की धरती पर यह एक ऐसा वर्ष मनाया जा रहा है, जो न संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा घोषित है न किसी राजनीतिक संगठन द्वारा प्रेरित है और न किसी महान पुरुष की स्मृति से जुड़ा हुआ है, इस वर्ष को मनाने का उद्देश्य है सर्वांगीण व्यक्तित्व-निर्माण।

मेरी दो दिन की लाडनूं यात्रा एवं योगक्षेम वर्ष में सहभागिता का सार है कि योगक्षेम वर्ष एक बार फिर धर्मसंघ के अभ्युदय का स्वर्णिम अवसर बन रहा है। जिसका उद्देश्य है अप्राप्त की प्राप्ति एवं प्राप्त का संरक्षण। यह अवसर दृष्टि एवं सोच में बदलाव का माध्यम होगा। जो ज्ञान, दर्शन और चारित्र की साधना में गति प्रदान करेगा। अनेक नवीन एवं पुरातन विषयों का तलस्पर्शी ज्ञान, जिससे वक्तृत्व में गंभीरता आएगी। आधुनिक दुनिया में धर्म को विशेषतः जैन धर्म को युगानुरूप प्रस्तुति देने का यह माध्यम बनेगा। योगक्षेम वर्ष के साथ विकास के तीन अर्थ हैं- आगे बढ़ना, रूकना और पीछे मुड़कर देखना। आगे बढ़ना यानी दुनिया के नवीनतम धर्म दर्शनों को आत्मसात करना। रूकना यानी अपनी विरासत को खगोलना। पीछे मुड़कर देखना यानी अपनी परम्परा और दर्शन को जीवंत करना। निश्चित तौर पर जैन धर्म के महान तपस्वी, अनुशासनप्रिय, दूरदर्शी और तेजस्वी आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में आध्यात्मिकता और आधुनिकता का अद्भुत संगम बनी जैन विश्व भारती में आज एक नया आध्यात्मिक इतिहास रचा जा रहा है, आध्यात्मिक प्रशिक्षण की एक नई परंपरा विकसित की जा रही है। यह वास्तव में जैन धर्म का एक अनूठा और संभवतः पहला ऐसा व्यापक प्रयोग है, जिसमें वर्षभर तक  साधु-साध्वियों के साथ-साथ श्रावक समाज को भी गहन एवं व्यवस्थित रूप से जैन एवं तेरापंथ दर्शन, अध्यात्म, योग, ध्यान, स्वाध्याय, संयम और जीवन मूल्यों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

जैन, बौद्ध और वैदिक तीनों ही परंपराओं में योगक्षेम शब्द प्रयुक्त हुआ है। यह विशेष अर्थवत्ता का संवाहक है। तेरापंथ धर्मसंघ ने इसे नया संदर्भ दिया है। प्रज्ञा या अन्तर्दृष्टि के जागरण से अनुबंधित किया है। योगक्षेम वर्ष का अर्थ भी अत्यंत गहरा और व्यापक है। योग का अर्थ केवल योगासन या शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मसंयम, ध्यान, साधना, तप, स्वाध्याय, अनुशासन और आत्मजागरण है। क्षेम का अर्थ है आत्मकल्याण, मानसिक शांति, संतुलन, सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति। इस प्रकार योगक्षेम वर्ष का उद्देश्य है-व्यक्ति के भीतर योग अर्थात् आत्मसंयम और साधना का विकास हो तथा उसके जीवन में क्षेम अर्थात् शांति, संतोष और आध्यात्मिक कल्याण स्थापित हो। जब व्यक्ति का जीवन संतुलित और शांत होगा, तभी समाज में शांति आएगी और जब समाज शांत होगा, तभी विश्व में शांति संभव होगी। आचार्य तुलसी के समय में भी साधना, योग और आध्यात्मिक जागरण से जुड़े इस योगक्षेम वर्ष की विशेष आयोजना हुई थी। उस समय के प्रयोगों की सफलता और सार्थकता को देखते हुए अब उसी परंपरा को नए स्वरूप में पुनः प्रारंभ किया गया है। यह परंपरा और नवाचार का सुंदर समन्वय है, जहाँ पुरानी साधना परंपरा आधुनिक धर्म-समाज की आवश्यकताओं के अनुसार नए रूप में सामने आ रही है। यही जीवंत धर्म की पहचान है कि वह समय के साथ अपने स्वरूप को समाज के हित में विकसित करता रहे।

आज विश्व जिस दौर से गुजर रहा है, वह अत्यंत चिंताजनक है। दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध, आतंकवाद, हिंसा, असहिष्णुता, मानसिक तनाव, अवसाद, पारिवारिक विघटन और पर्यावरण संकट जैसी समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। विज्ञान और तकनीक इन समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं दे सकते, क्योंकि ये समस्याएँ बाहरी नहीं, बल्कि मनुष्य के मन से जुड़ी हुई हैं। जब तक मनुष्य के भीतर शांति नहीं होगी, तब तक बाहर शांति संभव नहीं है। इसलिए आज दुनिया को हथियारों से ज्यादा ध्यान की जरूरत है, प्रतिस्पर्धा से ज्यादा करुणा की जरूरत है, और भौतिकता से ज्यादा आध्यात्मिकता की जरूरत है। योगक्षेम वर्ष इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो मनुष्य को अपने भीतर की यात्रा करने के लिए प्रेरित करता है। योगक्षेम वर्ष के माध्यम से संदेश दिया जा रहा है कि धर्म केवल सुनने की चीज नहीं, बल्कि जीवन में धारण करने एवं जीवन को बदलने की चीज है; धर्म केवल मानने की चीज नहीं, बल्कि जीने की चीज है। यदि व्यक्ति अपने जीवन में थोड़ा संयम, थोड़ा ध्यान, थोड़ा स्वाध्याय, थोड़ा त्याग और थोड़ा प्रेम जोड़ ले, तो उसका जीवन स्वयं बदल सकता है। यही छोटा परिवर्तन आगे चलकर समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। इसलिए योगक्षेम वर्ष वास्तव में व्यक्ति परिवर्तन से समाज परिवर्तन और समाज परिवर्तन से राष्ट्र एवं विश्व परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
योगक्षेम वर्ष के कार्यक्रमों को ‘प्रज्ञापर्व’ नाम से अभिहित किया गया क्योंकि प्रज्ञा का जागरण इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य था। ‘पण्णा समिक्खए’ इस आगम सूक्त को प्रतीक के रूप में रखा गया। इस विलक्षण प्रयोग एवं प्रशिक्षण के पीछे पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण का लक्ष्य या संकल्प है-‘चतुर्विध धर्मसंघ के व्यक्तित्व का निर्माण करना, उनकी बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना, भावनात्मक विकास करना, स्वभाव-परिवर्तन की कला सिखाना और प्रायोगिक जीवन जीना सिखाना, एक वाक्य में कहा जाए तो आध्यात्मिक वैज्ञानिक व्यक्तित्व का निर्माण करना।’ पूरे वर्ष प्रशिक्षणार्थी को अनेक विषयों के ज्ञान के साथ योगासन, ध्यान, कायोत्सर्ग, जप, अनुप्रेक्षा, मंत्र साधना आदि के प्रयोग भी कराए जा रहे हैं। यदि मनुष्य अहिंसा को अपनाए, तो युद्ध समाप्त हो सकते हैं; यदि अनेकांत को अपनाए, तो विवाद समाप्त हो सकते हैं; यदि अपरिग्रह को अपनाए, तो आर्थिक और पर्यावरण संकट कम हो सकते हैं। इस प्रकार जैन धर्म का दर्शन केवल धार्मिक दर्शन नहीं, बल्कि विश्व शांति का दर्शन है, और योगक्षेम वर्ष उसी दर्शन को व्यवहार में उतारने का प्रयास है।

आचार्य श्री महाश्रमण की दूरदर्शी सोच, उनका अनुशासन, उनका साधना-प्रधान जीवन और समाज को आध्यात्मिक दिशा देने का उनका प्रयास वास्तव में अद्वितीय है। उन्होंने धर्म को केवल परंपरा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जीवन और समाज से जोड़ा। समय को बांधने की अद्भुत खूबी है उनमें। कम समय में अधिक काम। वह भी इतनी सहजता और निर्भरता से सम्पादित कर लेने की सामर्थ्य, उनकी कार्य व्यस्तता कभी व्यग्रता में नहीं बदलती। यह सब इसीलिए हो सकता है कि उनकी प्रत्येक प्रवृत्ति निवृत्ति से निथर कर आती है। उनकी क्रियाशीलता आंतरिक स्थिरता स्थितप्रज्ञता से अभिनिःसृत होती है। उन्होंने साधना को केवल साधु-साध्वियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि श्रावक समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया। योगक्षेम वर्ष उसी दूरदृष्टि और आध्यात्मिक सोच का परिणाम है, जो आने वाले समय में जैन धर्म ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है। वास्तव में योगक्षेम वर्ष को जैन धर्म के इतिहास में एक स्वर्णिम दौर की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है। यह वर्ष साधना का वर्ष है, आत्मजागरण का वर्ष है, संयम का वर्ष है, चरित्र निर्माण का वर्ष है, और सबसे बढ़कर यह धर्म क्रांति का वर्ष है। यदि इस वर्ष का संदेश जन-जन तक पहुँचे, लोग योग, ध्यान, संयम, अहिंसा, शांति और प्रेम को अपने जीवन में अपनाएँ, तो समाज में एक नया परिवर्तन आ सकता है। तब धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देगा।

साररूप में यही कहा जा सकता है कि योगक्षेम वर्ष केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक विचार है; केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक आंदोलन है; केवल एक वर्ष नहीं, बल्कि एक युग परिवर्तन की शुरुआत है। यह वास्तव में धर्म क्रांति के नए अध्याय का आधार है, जो मनुष्य को बाहर से भीतर की यात्रा की ओर ले जाने का प्रयास कर रहा है। आचार्य श्री महाश्रमण एवं साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा के संचेतन पुरुषार्थ की सार्थकता इसी में है कि इनके मार्गदर्शन में हम प्रगति की महती मंजिलें तय करते हुए चैतन्य जागरण के नये आयाम में प्रवेश करें। यदि यह प्रयास सफल होता है, तो निश्चित रूप से आने वाला समय आध्यात्मिक जागरण, अहिंसा, शांति और प्रेम का समय होगा, और यही इस योगक्षेम वर्ष की सबसे बड़ी सार्थकता और सफलता होगी।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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