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कोरियन ड्रामा से भारतीय सीरियल तक : मनोरंजन की दिशा पर पुनर्विचार

विश्व के मनोरंजन जगत में पिछले कुछ वर्षों में यदि किसी देश ने टेलीविजन और वेब सीरीज के माध्यम से पूरी दुनिया को सबसे अधिक प्रभावित किया है तो वह दक्षिण कोरिया है। कोरियन ड्रामा आज केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव, सामाजिक शिक्षा, भावनात्मक परिपक्वता और जीवन मूल्यों के प्रस्तुतीकरण का सशक्त माध्यम बन चुके हैं। भारत सहित दुनिया के करोड़ों लोग कोरियन ड्रामा देख रहे हैं और उनसे प्रभावित हो रहे हैं। यह केवल तकनीक या अभिनय का प्रभाव नहीं है, बल्कि उनकी कहानियों की संवेदनशीलता, जीवन की वास्तविकता और मानवीय रिश्तों की गहराई का प्रभाव है। कोरियन ड्रामा का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे जीवन की वास्तविक समस्याओं को बहुत संवेदनशील और मानवीय तरीके से प्रस्तुत करते हैं।

उनमें परिवार है, प्रेम है, संघर्ष है, बीमारी है, मानसिक तनाव है, करियर की समस्याएं हैं, सामाजिक दबाव है, लेकिन इन सबके साथ समाधान भी है, आशा भी है, सकारात्मकता भी है। वे केवल समस्या नहीं दिखाते, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं। उनके पात्र अतिनाटकीय या अवास्तविक नहीं होते, बल्कि आम आदमी जैसे होते हैं, जिनकी समस्याएं भी वास्तविक होती हैं और संघर्ष भी वास्तविक होता है। कोरियन ड्रामा की एक विशेषता यह भी है कि वे सीमित एपिसोड में एक पूर्ण कहानी प्रस्तुत करते हैं। उनमें अनावश्यक विस्तार, अंतहीन षड्यंत्र और कृत्रिम मोड़ नहीं होते। कहानी का एक उद्देश्य होता है और वह उद्देश्य पूरा होते ही कहानी समाप्त हो जाती है। इस कारण उनमें कसाव, गुणवत्ता और प्रभाव बना रहता है। वे दर्शकों के समय और संवेदना दोनों का सम्मान करते हैं।

यदि हम भारतीय टीवी सीरियल्स की ओर देखें, तो स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। अधिकांश धारावाहिक सास-बहू के अंतहीन संघर्ष, पारिवारिक षड्यंत्र, पुनर्जन्म, चमत्कार, बदला, ईष्र्या और दिखावे के जीवन के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। एक ही कहानी वर्षों तक चलती रहती है और उसमें वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं रह जाता। परिवार, जो प्रेम, सहयोग और संवाद का केंद्र होना चाहिए, उसे षड्यंत्र और राजनीति का केंद्र बना दिया जाता है। इससे समाज में नकारात्मक मानसिकता का निर्माण होता है। भारतीय फिल्मों की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। अधिकांश फिल्में मारधाड़, हीरोगिरी, बदला, अपराध या अवास्तविक प्रेम कहानियों पर आधारित होती हैं। उनमें वास्तविक जीवन की समस्याओं और उनके समाधान पर बहुत कम काम होता है। जबकि आज समाज जिन समस्याओं से जूझ रहा है, वे अलग हैं-मानसिक तनाव, अवसाद, अकेलापन, पारिवारिक विघटन, पीढ़ियों के बीच संवाद की कमी, बेरोजगारी, करियर का दबाव, स्वास्थ्य समस्याएं, नशा, पर्यावरण संकट आदि। इन विषयों पर आधारित मनोरंजन बहुत कम देखने को मिलता है।

कोरियन ड्रामा की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि वे दर्शकों को भावनात्मक रूप से स्वस्थ बनाते हैं। उन्हें देखकर व्यक्ति केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि भावनात्मक रूप से जुड़ता है, जीवन को समझता है, रिश्तों की अहमियत को समझता है, धैर्य और संघर्ष की प्रेरणा पाता है। कई कोरियन ड्रामा मानसिक स्वास्थ्य, अवसाद, ऑटिज्म, अस्पताल जीवन, वकीलों के संघर्ष, शिक्षकों के जीवन, छोटे उद्यमियों के संघर्ष जैसे विषयों पर बने हैं। वे दर्शकों को संवेदनशील बनाते हैं, आक्रामक नहीं। भारत में भी कुछ अच्छे धारावाहिक बने हैं, जैसे “हम लोग”, “बुनियाद”, “संजीवनी”, “बालिका वधू”, “उड़ान”, “तारक मेहता का उल्टा चश्मा” आदि, जिन्होंने समाज को कुछ सकारात्मक संदेश दिए।

लेकिन ऐसे धारावाहिकों की संख्या बहुत कम है। आज जरूरत ऐसे धारावाहिकों और फिल्मों की है जो समाज को मानसिक रूप से स्वस्थ बनाएं, जीवन जीने की कला सिखाएं, तनाव से मुक्ति का मार्ग दिखाएं, परिवार को जोड़ने का संदेश दें और सकारात्मक सोच का निर्माण करें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मनोरंजन का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं होना चाहिए, बल्कि मन का निर्माण होना चाहिए। यदि फिल्म या धारावाहिक देखकर व्यक्ति अधिक आक्रामक, असंतुष्ट, तनावग्रस्त या अवास्तविक जीवन की कल्पनाओं में खो जाए, तो वह मनोरंजन नहीं, मानसिक प्रदूषण है। लेकिन यदि कोई फिल्म या धारावाहिक व्यक्ति को प्रेरित करे, जीवन में आशा जगाए, समस्याओं से लड़ने की शक्ति दे, रिश्तों को समझने की दृष्टि दे, तो वह वास्तविक मनोरंजन है। आज समाज में मानसिक बीमारियां, अवसाद, अकेलापन और तनाव तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में मनोरंजन उद्योग की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है।

उन्हें ऐसे धारावाहिक और फिल्में बनानी चाहिए जो मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को स्वस्थ बनने की प्रेरणा दें, सकारात्मक सोच का निर्माण करें, योग, ध्यान, संवाद, परिवार, मित्रता और जीवन के उद्देश्य के महत्व को दिखाएं। यदि इस दिशा में काम किया जाए, तो मनोरंजन उद्योग समाज के लिए वरदान बन सकता है। यह भी विचारणीय है कि आखिर क्यों हमारे अधिकांश सीरियल सास-बहू के संघर्ष से शुरू होकर षड्यंत्र और बदले पर समाप्त होते हैं, और हमारी फिल्में मारधाड़ और हीरोगिरी पर आधारित होती हैं। इसका एक कारण यह है कि निर्माता यह मानते हैं कि दर्शक यही देखना चाहते हैं। लेकिन यह आधा सच है। वास्तविकता यह है कि दर्शकों को अच्छा, संवेदनशील और सार्थक कंटेंट मिलेगा, तो वे उसे भी उतना ही पसंद करेंगे, जैसा आज वे कोरियन ड्रामा को पसंद कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि समस्या दर्शकों की पसंद में नहीं, बल्कि कंटेंट की दिशा में है। समय आ गया है कि भारतीय मनोरंजन जगत अपनी दिशा पर पुनर्विचार करे। उन्हें यह सोचना होगा कि वे समाज को किस दिशा में ले जा रहे हैं। क्या वे समाज को संवेदनशील, सकारात्मक और स्वस्थ बना रहे हैं, या केवल मनोरंजन के नाम पर नकारात्मकता, हिंसा और षड्यंत्र को बढ़ावा दे रहे हैं? मनोरंजन उद्योग केवल उद्योग नहीं है, वह समाज निर्माण का माध्यम भी है।

कोरियन ड्रामा हमें यह सिखाते हैं कि मनोरंजन भी समाज को शिक्षित कर सकता है, प्रेरित कर सकता है, भावनात्मक रूप से परिपक्व बना सकता है और जीवन को समझने की दृष्टि दे सकता है। भारतीय सिनेमा और टेलीविजन यदि इस दिशा में काम करें, तो वे केवल मनोरंजन नहीं करेंगे, बल्कि समाज को बेहतर बनाएंगे। मनोरंजन का सर्वोच्च रूप वही है जो मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाए, जो निराशा में आशा दे, जो टूटते परिवारों को जोड़ने की प्रेरणा दे, जो तनावग्रस्त व्यक्ति को शांति दे, जो जीवन की समस्याओं का समाधान सिखाए। जब भारतीय धारावाहिक और फिल्में इस दिशा में बननी शुरू होंगी, तब मनोरंजन वास्तव में समाज निर्माण का माध्यम बन सकेगा। यही समय की आवश्यकता है और यही भविष्य की दिशा भी।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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