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अक्षय तृतीया पर्व है लोक से लोकोत्तर की दिव्य यात्रा

अक्षय तृतीया- 19 अप्रैल, 2026

अक्षय तृतीया महापर्व का न केवल सनातन परम्परा में बल्कि जैन परम्परा में विशेष महत्व है। इसका लौकिक और लोकोत्तर-दोनों ही दृष्टियों में महत्व है। अक्षय शब्द का अर्थ है कभी न खत्म होने वाला। संस्कृत में, अक्षय शब्द का अर्थ है ‘समृद्धि, आशा, खुशी, सफलता’, जबकि तृतीया का अर्थ है ‘चंद्रमा का तीसरा चरण’। इस त्यौहार के साथ-साथ एक अबूझा मांगलिक एवं शुभ दिन भी है, जब बिना किसी मुहूर्त के विवाह एवं मांगलिक कार्य किये जा सकते हैं। विभिन्न सांस्कृतिक एवं मांगलिक ढांचांे में ढले अक्षय तृतीया पर्व में हिन्दू-जैन धर्म, संस्कृति एवं परम्पराओं का अनूठा संगम है। इस प्रकार अक्षय तृतीया पर किए गए कार्यों जैसे जप-तप, यज्ञ, पितृ-तर्पण, दान-पुण्य आदि का साधक को अक्षय फल प्राप्त होता है। भगवान आदिनाथ ने ही सबसे पहले समाज में दान का महत्व समझाया था, इसलिए इस दिन पर जैन धर्म के लोग आहार दान, ज्ञान दान, औषधि दान करते हैं। रास्ते चाहे कितने ही भिन्न हों पर इस पर्व त्यौहार के प्रति सभी जाति, वर्ग, वर्ण, सम्प्रदाय और धर्मों का आदर-भाव अभिन्नता में एकता का प्रिय संदेश दे रहा है। आज के युद्ध, आतंक, आर्थिक प्रतिस्पर्धा एवं अशांति के समय में संयम एवं तप की, भौतिकता एवं आध्यात्मिकता की अक्षय परम्परा को जन-जन की जीवनशैली बनाने की जरूरत है।

अक्षय तृतीया यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना की उस अखंड धारा का प्रतीक है, जो जीवन को क्षणभंगुरता से उठाकर ‘अक्षयता’ की ओर ले जाती है। ‘अक्षय’ अर्थात् जो कभी क्षीण न हो, जो निरंतर प्रवहमान रहे, ऐसी ही भावना का यह पर्व है, जो हमारे लौकिक व्यवहार से लेकर लोकोत्तर साधना तक, हर स्तर पर गहन अर्थ रखता है। यह दिन केवल शुभारंभ का नहीं, बल्कि आत्मारंभ का भी दिन है। भारतीय परंपरा में अक्षय तृतीया को ‘अबूझ मुहूर्त’ कहा गया है-अर्थात् ऐसा समय, जिसमें किसी विशेष गणना या ज्योतिषीय विचार की आवश्यकता नहीं होती। यह स्वयं ही शुभता का पर्याय है। यही कारण है कि इस दिन विवाह, गृहप्रवेश, व्यापारारंभ जैसे अनेक मांगलिक कार्य बिना किसी संकोच के सम्पन्न किए जाते हैं। यह विश्वास केवल आस्था नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक अनुभव का परिणाम है, जिसने इस दिन को ‘सर्वसिद्धिदायक’ मान्यता प्रदान की है।

लौकिक दृष्टि से देखें तो अक्षय तृतीया भारतीय अर्थव्यवस्था और श्रम-संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है। यह दिन किसानों के लिए नई आशा का संदेश लेकर आता है। प्राचीन काल में राजाओं द्वारा श्रेष्ठ किसानों को बीज भेंट करने की परंपरा केवल सम्मान का प्रतीक नहीं थी, बल्कि कृषि को राष्ट्र की आत्मा मानने का सजीव प्रमाण थी। यह विश्वास कि इन बीजों से उत्पन्न अन्न कभी समाप्त नहीं होगा, दरअसल उस श्रम और प्रकृति के समन्वय पर आस्था थी, जो भारतीय जीवन का आधार है। कुम्हारों, शिल्पकारों, पशुपालकों-विशेषकर बैलों के लिए भी यह दिन विशेष महत्व रखता है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि सृजन, श्रम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ही समृद्धि का वास्तविक आधार है। किन्तु अक्षय तृतीया का वास्तविक सौंदर्य उसके लोकोत्तर आयाम में प्रकट होता है, जहाँ यह पर्व आत्मशुद्धि, तप और साधना का महापर्व बन जाता है। जैन परंपरा में यह दिन विशेष रूप से पूज्य है, क्योंकि इसका संबंध प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के जीवन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा हुआ है। यह वह दिन है, जब दीर्घकालीन तपस्या के उपरांत उनका पारणा हुआ, एक ऐसा क्षण, जिसने तप को तृप्ति और साधना को पूर्णता प्रदान की।

कथा के अनुसार, जब भगवान ऋषभदेव ने राजपाट त्यागकर संन्यास धारण किया, तब एक वर्ष से अधिक समय तक उन्हें उचित आहार नहीं मिला। यह केवल भौतिक अभाव नहीं था, बल्कि उस युग की सामाजिक अपरिपक्वता का द्योतक था, जहाँ लोग ‘अहिंसक आहार’ और ‘संयमित जीवन’ की अवधारणा से अनभिज्ञ थे। अंततः हस्तिनापुर में राजकुमार श्रेयांस ने उन्हें इक्षुरस अर्पित कर उनकी तपस्या का पारणा कराया। उस क्षण ‘अहोदानम्, अहोदानम्’ की ध्वनि गूंजी, यह केवल एक आह्लाद नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक चेतना का उद्घोष था, जिसने दान, संयम और साधना को एक नई दिशा दी। यही कारण है कि अक्षय तृतीया जैन साधकों के लिए ‘वर्षीतप’ जैसे महान तप-अनुष्ठानों का पूर्णाहुति दिवस है। एक वर्ष तक एकान्तर उपवास करने वाले साधक इस दिन पारणा करते हैं। यह तप केवल शरीर को कष्ट देने का साधन नहीं, बल्कि आत्मा को निर्मल करने की प्रक्रिया है। यह हमें सिखाता है कि भोग से नहीं, त्याग से जीवन अक्षय बनता है।

अक्षय तृतीया का आध्यात्मिक संदेश अत्यंत गहन है। यह हमें बताता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल संसाधनों का संचय नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि है। भारतीय संस्कृति में ‘आत्मा’ को सर्वोपरि सत्य माना गया है, और उसकी खोज को जीवन की सर्वोच्च साधना। यह पर्व उसी खोज का निमंत्रण है, एक ऐसा निमंत्रण, जो हमें बाह्य जगत से भीतर की यात्रा पर ले जाता है। ऋषभदेव का जीवन इस संदर्भ में अत्यंत प्रेरणादायक है। ‘ऋषभ’ शब्द का एक अर्थ बैल भी है-जो श्रम, धैर्य और स्थिरता का प्रतीक है और दूसरा अर्थ है तीर्थंकर-जो आत्मोद्धार और लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त करता है। इस प्रकार उनका जीवन भौतिक और आध्यात्मिक-दोनों आयामों का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने समाज को कृषि, शिल्प, व्यापार जैसी जीवनोपयोगी विधाएं दीं, और साथ ही आत्मा की मुक्ति का मार्ग भी दिखाया। यही समग्रता अक्षय तृतीया के दर्शन में भी झलकती है।

आज के संदर्भ में यह पर्व और भी प्रासंगिक हो उठता है। जब मानव जीवन भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में उलझा हुआ है, तब अक्षय तृतीया हमें संतुलन का पाठ पढ़ाती है। यह हमें याद दिलाती है कि केवल भौतिक समृद्धि से जीवन पूर्ण नहीं होता। यदि भीतर शांति नहीं, तो बाहरी वैभव भी निरर्थक है। और यदि भीतर संतोष है, तो सीमित साधनों में भी जीवन अक्षय बन सकता है। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि साधना केवल मठों और आश्रमों तक सीमित नहीं है। यह जीवन की प्रत्येक क्रिया में संभव है, यदि उसमें सजगता, संयम और समर्पण का भाव हो। एक किसान जब श्रद्धा से बीज बोता है, एक कुम्हार जब मिट्टी को आकार देता है, एक गृहस्थ जब ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करता हैकृतब वह भी एक प्रकार की साधना ही कर रहा होता है।

अक्षय तृतीया का सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत व्यापक है। यह पर्व भारतीय जीवन की उस समन्वयकारी दृष्टि का प्रतीक है, जिसमें भौतिकता और आध्यात्मिकता विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यहाँ अन्न का भी सम्मान है और आत्मा का भी। यहाँ श्रम का भी महत्व है और ध्यान का भी। यही संतुलन भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। व्यक्तिगत स्तर पर यह दिन आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में झांकें, क्या हमारा जीवन केवल उपभोग में व्यतीत हो रहा है, या उसमें कोई उच्च उद्देश्य भी है? क्या हम केवल संग्रह कर रहे हैं, या कुछ त्याग भी कर पा रहे हैं? क्या हम केवल बाहर की दुनिया को संवार रहे हैं, या भीतर की दुनिया को भी प्रकाशित कर रहे हैं?
अक्षय तृतीया हमें यह संदेश देती है कि यदि हम अपने जीवन में तप, संयम और सेवा को स्थान दें, तो हमारा जीवन भी ‘अक्षय’ बन सकता है। यह अक्षयता केवल धन या वस्तुओं की नहीं, बल्कि पुण्य, शांति और आत्मिक संतोष की होती है, जो कभी समाप्त नहीं होती। आज आवश्यकता है कि हम इस पर्व को केवल औपचारिकता तक सीमित न रखें, बल्कि इसके गूढ़ संदेश को अपने जीवन में उतारें। यदि इस दिन हम एक संकल्प लें, संयम का, सेवा का, साधना का, तो यह दिन वास्तव में हमारे जीवन में परिवर्तन का सूत्रधार बन सकता है। अंततः अक्षय तृतीया एक ऐसी पावन गंगा है, जिसमें तप की धारा, संस्कृति की सुवास, श्रम की गरिमा और आत्मा की पवित्रताकृंसस एक साथ प्रवाहित होती हैं। जो इस धारा में स्नान करता है, वह केवल बाह्य रूप से नहीं, बल्कि भीतर से भी निर्मल हो जाता है। यही इस पर्व की सर्वोच्च उपलब्धि है, और यही इसका सनातन संदेश कि जीवन को अक्षय बनाना है, तो उसे तप, त्याग और आत्मबोध से आलोकित करना होगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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