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छत्तीसगढ़ी लोककला, लोकचेतना और मंदराजी के संघर्ष का नाम“नाचा”

छत्तीसगढ़ की धरती अपनी सहजता, संवेदनशीलता और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए जानी जाती है। यहाँ की लोककलाएँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जनजीवन की आत्मा हैं। इन्हीं लोककलाओं में “नाचा” एक ऐसी जीवंत विधा है, जिसने सदियों से समाज को हँसाया भी है, जगाया भी है और सोचने के लिए विवश भी किया है।“नाचा” की इस सशक्त परंपरा को पुनर्जीवित करने, उसे संगठित स्वरूप देने और जन-जन तक पहुँचाने का श्रेय जिस महान लोकनायक को जाता है, वे हैं दाऊ दुलार सिंह मंदराजी। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और सांस्कृतिक साधना का अद्भुत उदाहरण है।

1 अप्रैल 1911 को राजनांदगांव जिले के एक साधारण से गाँव रवेली में जन्मे मंदराजी ने अपने जीवन की दिशा बहुत जल्दी तय कर ली थी। वे भले ही औपचारिक शिक्षा में बहुत आगे न बढ़ पाए हों, लेकिन लोकजीवन की गहरी समझ और कला के प्रति अगाध प्रेम ने उन्हें असाधारण बना दिया। उस समय “नाचा” बिखरा हुआ, असंगठित और सीमित दायरे में सिमटा हुआ था। ग्रामीण परिवेश तक सीमित इस लोकनाट्य शैली में अपार संभावनाएँ थीं, पर उसे दिशा देने वाला कोई सशक्त व्यक्तित्व नहीं था। मंदराजी ने इस रिक्तता को पहचाना और अपने जीवन को इसी कार्य में समर्पित कर दिया।

 “नाचा” की मूल प्रकृति ही ऐसी है कि यह सीधे जनता से संवाद करती है। इसमें मंच की औपचारिकता नहीं होती, बल्कि गाँव का चौपाल, खुला मैदान या कोई भी सार्वजनिक स्थल ही इसका रंगमंच बन जाता है। कलाकार आम जन की भाषा में, उनकी समस्याओं को, उनके ही अंदाज़ में प्रस्तुत करते हैं। इसमें हास्य-व्यंग्य का अद्भुत मिश्रण होता है जिसे “गम्मत” कहा जाता है। यह गम्मत केवल हँसी के लिए नहीं होती, बल्कि उसके भीतर समाज की विसंगतियों पर तीखा प्रहार छिपा होता है। दहेज प्रथा, नशाखोरी, अंधविश्वास, सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों को नाचा के माध्यम से जिस सहजता और प्रभावशीलता से प्रस्तुत किया जाता है, वह किसी औपचारिक मंच से संभव नहीं।

दाऊ मंदराजी ने नाचा को केवल एक कला के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। उन्होंने विभिन्न गाँवों के कलाकारों को एकत्रित किया, उन्हें प्रशिक्षण दिया और नाचा को एक संगठित स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने प्रस्तुति में अनुशासन, संवाद में धार और विषयों में प्रासंगिकता जोड़ी। उनके नेतृत्व में नाचा मंडलियों ने न केवल छत्तीसगढ़ के गाँव-गाँव में, बल्कि प्रदेश के बाहर भी अपनी पहचान बनाई। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि उन्होंने नाचा को लोकमंच से उठाकर एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप दे दिया।

छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी लोककलाओं में यदि किसी विधा ने जनजीवन को सबसे अधिक जीवंत, संवादात्मक और प्रभावशाली बनाया है, तो वह है “नाचा”। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का दर्पण, जनचेतना का मंच और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। इस लोककला को नई पहचान देने वाले, उसे पुनर्जीवित करने वाले और जन-जन तक पहुँचाने वाले महान लोकनायक थे।”दाऊ दुलार सिंह मंदराजी”।

दाऊ दुलार सिंह मंदराजी का वास्तविक नाम दुलार सिंह था, परंतु लोक में वे “मंदराजी” के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे साधारण ग्रामीण परिवेश से थे, पर उनकी दृष्टि असाधारण थी। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण लोककला “नाचा” के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने गांव-गांव के कलाकारों को संगठित किया। नाचा को मंचीय रूप देकर उसे नई ऊंचाई दी।लोकभाषा और लोक संस्कृति को पहचान दिलाई।उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा कलाकार केवल प्रस्तुति नहीं करता, बल्कि समाज को दिशा देता है।

 “नाचा” छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकनाट्य शैली है, जिसमें गीत, नृत्य, हास्य, व्यंग्य और संवाद का अद्भुत संगम होता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ: खुले मंच (मंचहीन प्रस्तुति)- गांव के चौपाल या मैदान में। गम्मत (हास्य-व्यंग्य)- समाज की विसंगतियों पर तीखा प्रहार लोकभाषा का प्रयोग- छत्तीसगढ़ी बोली की मिठास,संगीत और नृत्य का समन्वय,सामाजिक संदेश- दहेज, नशा, अंधविश्वास आदि पर प्रहार नाचा का मूल उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ समाज को शिक्षित करना रहा है।

दाऊ मंदराजी के पहले “नाचा” सीमित दायरे में था, पर उन्होंने इसे नई दिशा दी।उन्होंने नाचा को पुनर्जीवित किया और उसे विलुप्त होने से बचाया लोक कलाकारों को संगठित कर इसे व्यवस्थित मंच दिया।नाचा को सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ हथियार बनाया।इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में भूमिका निभाई उनके प्रयासों से “नाचा” केवल कला नहीं, बल्कि लोक आंदोलन बन गया।दाऊ मंदराजी ने यह सिद्ध किया कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि परिवर्तन का सशक्त साधन है।उनके नाचा में उठने वाले प्रमुख मुद्दे थे- सामाजिक असमानता,अंधविश्वास,दहेज प्रथा,शराब और नशाखोरी उन्होंने मंच को “लोक संसद” बना दिया, जहाँ समाज अपनी समस्याओं को देखता और समझता था।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में “नाचा” की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।यह लोकजीवन की भावनाओं को अभिव्यक्त करता है।यह पीढ़ियों को जोड़ता है।यह भाषा, परंपरा और संस्कृति का संरक्षण करता है।दाऊ मंदराजी ने इस पहचाना को न केवल बचाया, बल्कि उसे गौरव का विषय बना दिया।

मंदराजी का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने लोकभाषा और लोकसंस्कृति को सम्मान दिलाया। उस दौर में जब शहरी संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा था और लोककलाएँ उपेक्षित हो रही थीं, तब उन्होंने यह साबित किया कि अपनी जड़ों में ही असली ताकत होती है। उन्होंने नाचा के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा की मिठास, उसकी अभिव्यक्ति और उसकी शक्ति को स्थापित किया। उनके नाचा में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन, समाज की सच्चाई और परिवर्तन की प्रेरणा समाहित रहती थी।

समय के साथ नाचा ने अनेक रूप बदले, लेकिन उसकी आत्मा आज भी वही है, जो मंदराजी ने उसे दी थी। आज भी जब किसी गाँव में नाचा होता है, तो वह केवल एक कार्यक्रम नहीं होता, बल्कि एक सामूहिक अनुभव होता है जिसमें पूरा समाज शामिल होता है। यह लोककला पीढ़ियों को जोड़ने का काम करती है और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखती है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा दिया जाने वाला “दाऊ दुलार सिंह मंदराजी सम्मान” इस बात का प्रमाण है कि उनके योगदान को आधिकारिक स्तर पर भी स्वीकार किया गया है और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

हालाँकि वर्तमान समय में नाचा कई चुनौतियों से जूझ रहा है। आधुनिक मनोरंजन के साधनों ने पारंपरिक कलाओं के सामने प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी है। युवा पीढ़ी का झुकाव डिजिटल माध्यमों की ओर बढ़ रहा है, जिससे लोककलाओं में उनकी भागीदारी कम हो रही है। आर्थिक असुरक्षा भी एक बड़ी समस्या है, जिसके कारण कई प्रतिभाशाली कलाकार इस क्षेत्र को छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। ऐसे समय में आवश्यकता है कि नाचा को नए मंचों से जोड़ा जाए, उसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुत किया जाए और शिक्षा के माध्यम से नई पीढ़ी को इससे जोड़ा जाए।

नाचा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की संभावनाओं का भी आधार है। यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और यह सिखाता है कि समाज को बदलने के लिए बड़े मंचों की नहीं, बल्कि सच्ची अभिव्यक्ति और जनसरोकार की जरूरत होती है। दाऊ मंदराजी का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि यदि समर्पण सच्चा हो तो एक व्यक्ति भी पूरी संस्कृति को नई दिशा दे सकता है।आज जब हम तेजी से बदलते समय में अपनी पहचान को बचाने की चुनौती से जूझ रहे हैं, तब “नाचा” और मंदराजी की विरासत हमें यह संदेश देती है कि अपनी मिट्टी, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति से जुड़कर ही हम सशक्त और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण कर सकते हैं। यह केवल कला नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की आवाज है, जिसे सुनना और सहेजना हम सभी की जिम्मेदारी है।

माटी की खुशबू में बसता, जनमन का हर साज,
नाचा बोले सच्चाई, हँसी में छिपा अंदाज़।
मंदराजी की अमर धरोहर, संस्कृति की पहचान,
जब तक धरती-गगन रहेगा, जीवित रहेगा गान।।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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