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भ्रष्टाचार पर शिकंजा: आंकड़ों की सच्चाई और सिस्टम की चुनौतियाँ

छत्तीसगढ़ में बीते सवा दो वर्षों के भीतर 128 अधिकारियों-कर्मचारियों की गिरफ्तारी – यह आंकड़ा केवल एक समाचार नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की उस जटिल वास्तविकता का आईना है, जिसमें भ्रष्टाचार एक गहरी जड़ें जमा चुका रोग बन चुका है। इस खबर (शासन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार) में प्रस्तुत आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि राज्य सरकार द्वारा अपनाई गई “जीरो टॉलरेंस” नीति अब केवल कागजों तक सीमित नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी प्रभाव दिखाने लगी है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इन गिरफ्तारियों में राजस्व विभाग के अधिकारी-कर्मचारी सर्वाधिक संख्या में शामिल हैं। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि राजस्व विभाग सीधे आम जनता से जुड़ा होता है। भूमि, पट्टा, नामांतरण, सीमांकन जैसे मामलों में नागरिकों का पहला संपर्क यहीं होता है। ऐसे में यदि यही विभाग भ्रष्टाचार का केंद्र बन जाए, तो आमजन का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है।

गवर्नमेंट के अधिमान्य एजेंसी द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 से लेकर 2026 तक लगातार कार्रवाई हुई है, जिसमें हर वर्ष भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तारी का सिलसिला जारी रहा। वर्ष 2024 और 2025 में तो यह संख्या विशेष रूप से बढ़ी, जो यह दर्शाता है कि या तो भ्रष्टाचार बढ़ा है या फिर उस पर लगाम कसने की कोशिशें तेज हुई हैं। दोनों ही स्थितियाँ अपने आप में गंभीर हैं।

पहली इसलिए कि व्यवस्था में खामियाँ हैं, और दूसरी इसलिए कि अब तक ये खामियाँ लंबे समय से अनदेखी होती रही हैं।यह भी उल्लेखनीय है कि केवल छोटे कर्मचारी ही नहीं, बल्कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारी भी इस कार्रवाई की जद में आए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार केवल निचले स्तर की समस्या नहीं, बल्कि यह एक संरचनात्मक विकृति है, जो शीर्ष से लेकर निम्न स्तर तक फैली हुई है। शिक्षा और तकनीकी विभागों में कमीशनखोरी के जाल का खुलासा इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्टाचार अब सीमित क्षेत्रों तक नहीं रहा। शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में भी यदि रिश्वत और कमीशन की संस्कृति पनप रही है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ है।

इस पूरी कार्रवाई में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) और एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की भूमिका सराहनीय रही है। इन एजेंसियों ने न केवल मामलों की जांच की, बल्कि बड़े घोटालों का पर्दाफाश कर दोषियों को कानून के शिकंजे में लाया। भारतमाला परियोजना, शराब घोटाला, कोयला लेवी और ऑनलाइन महादेव एप जैसे मामलों में की गई कार्रवाई यह दर्शाती है कि अब भ्रष्टाचार के बड़े नेटवर्क भी अछूते नहीं रह गए हैं।परंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल गिरफ्तारी ही समाधान है? क्या इससे भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त हो जाएगा? इसका उत्तर शायद ‘नहीं’ में है। गिरफ्तारी एक दंडात्मक कदम है, परंतु भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए नीतिगत और संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं।

पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी सुधार—ये तीन स्तंभ हैं, जिन पर भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का निर्माण संभव है। ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देकर, प्रक्रियाओं को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाकर तथा अधिकारियों की जवाबदेही तय कर इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।इसके साथ ही, समाज की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। जब तक नागरिक स्वयं भ्रष्टाचार को स्वीकार करते रहेंगे- “काम जल्दी हो जाए” की मानसिकता से रिश्वत देते रहेंगे- तब तक यह समस्या समाप्त नहीं होगी।     

भ्रष्टाचार केवल लेने वाले की नहीं, देने वाले की भी जिम्मेदारी है। इनके आंकड़े हमें एक चेतावनी देते हैं कि यदि अब भी सुधार की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। लेकिन साथ ही यह आशा भी जगाते हैं कि सरकार और जांच एजेंसियां अब सक्रिय हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को गंभीरता से ले रही हैं। और यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई लंबी है, परंतु असंभव नहीं। आवश्यकता है निरंतरता, दृढ़ इच्छाशक्ति और सामूहिक प्रयास की। तभी हम एक ऐसी व्यवस्था की कल्पना कर सकते हैं, जहां ईमानदारी अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य नियम हो।

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