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बकरी बाई : जीवन की अनपढ़ लेकिन सबसे बड़ी शिक्षिका

बकरी बाई : अभावों में संतोष और जीवन का अनकहा दर्शन

हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी बड़े पद, प्रसिद्धि या किताबों के ज्ञान से नहीं, बल्कि अपने साधारण जीवन और असाधारण सोच से याद रह जाते हैं। वे बिना किसी मंच, पुरस्कार या पहचान के भी जीवन का ऐसा दर्शन दे जाते हैं, जिसे पढ़े-लिखे लोग भी शायद ही समझ पाते हों। ऐसी ही एक महिला थी — “बकरी बाई”। शायद उसका असली नाम किसी को याद नहीं था। वर्षों से बकरियाँ चराने के कारण पूरे इलाके में वह इसी नाम से जानी जाती थी। आश्चर्य की बात यह थी कि उसे अपने इस नाम से कोई शिकायत भी नहीं थी। उसने जैसे जीवन का यह सत्य बहुत पहले ही स्वीकार कर लिया था कि नाम से अधिक महत्व इंसान के कर्म का होता है।

हर सुबह वह बीस-पच्चीस बकरियों का झुंड लेकर हमारे घर के सामने से गुजरती थी और शाम ढलते-ढलते वापस लौट आती थी। बकरियों को हांकने का उसका अंदाज़ भी अलग था। वह “हुर्र-हुर्र” की आवाज़ों में उनसे जैसे बातचीत करती थी और सारी बकरियाँ उसका कहना मानती थीं। दूर-दूर तक फैले मैदान, रेल की पटरी, पहाड़ियाँ और जंगल पार करते हुए वह रोज अपनी बकरियों को चराने जाती थी। देखने वालों को लगता था जैसे वह एक क्षितिज से निकलकर दूसरे क्षितिज में विलीन हो जाती हो।

एक दिन मोहल्ले के बच्चों ने उत्साह से खबर दी कि “आज बकरी बाई जीन्स पहनकर बकरी चराने गई है।” पहले तो किसी को विश्वास नहीं हुआ। उम्र के छठे-सातवें दशक में पहुँच चुकी वह महिला और जीन्स! लेकिन शाम को जब वह लौटी तो सचमुच उसने टाइट फिटिंग जीन्स, ऊपर कुरती और कंधे पर फटी साड़ी का दुपट्टा ले रखा था। लोग हँस रहे थे, पर वह भी खुलकर हँस रही थी। उसने बड़ी सहजता से कहा, “जंगल में बकरियों के पीछे दौड़ते समय साड़ी झाड़ियों में फट जाती है। बेटे ने कहा कि मेरी जीन्स पहन जाओ, साड़ी भी बचेगी और पैरों में ठंड भी नहीं लगेगी।”

किसी ने पूछा, “लोग रास्ते में हँसते नहीं होंगे?”

वह मुस्कराकर बोली, “हाँ, खूब हँस रहे थे। पर हम भी उनको देखकर हँसने लगे। मन में बोले — हँस लो बेटा, क्योंकि तुम हमारी परेशानी ना समझ सकते हो, ना दूर कर सकते हो।”

उसके इस जवाब में जीवन का कितना बड़ा दर्शन छिपा था। वह दूसरों की हँसी से दुखी नहीं होती थी, क्योंकि उसने जीवन को परिस्थितियों के अनुसार जीना सीख लिया था। उसमें दिखावे का अहंकार नहीं था, केवल व्यवहारिक बुद्धि थी।

शाम को लौटते समय वह अक्सर मेरे बरामदे में थोड़ी देर बैठ जाती थी। मैं उसे खूब मीठी चाय पिलाती थी। एक दिन उसने चाय की जगह अचार माँगा, क्योंकि वह अपना खाना लाना भूल गई थी। उसकी पोटली में केवल दो मोटी-सूखी रोटियाँ थीं। मुझे लगा कि शायद रात को अच्छा खाना खाती होगी, लेकिन उसने बताया कि रात का भोजन भी लगभग ऐसा ही होता है। आश्चर्य होता था कि इतनी कम खुराक पर वह दिनभर जंगलों में बकरियों के पीछे कैसे दौड़ती रहती है। शायद कठिन जीवन ही सबसे बड़ी ऊर्जा बन जाता है।

बातों-बातों में उसने अपने जीवन की कहानी भी बताई। पति कई वर्ष पहले दूसरी औरत के साथ चला गया था। उसने न कोई झगड़ा किया, न पंचायत बैठाई। बहुत शांति से बोली, “रिश्ता प्यार का होता है। प्यार ना जबरदस्ती किया जा सकता है, ना माँगा जा सकता है। जब मेरी किस्मत में नहीं था, तो नहीं था। हमने उसे जाने दिया और खुद बच्चों को पाल लिया।”

यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गई। जिस बात पर बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग टूट जाते हैं, उस बात को उसने कितनी सहजता से स्वीकार कर लिया था। उसमें शिकायत नहीं थी, केवल जीवन को स्वीकार करने की शक्ति थी।

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उसका जीवन भी संघर्षों से भरा था। बस्ती के गरीब लोग उसे अपनी बकरियाँ चराने के बदले कोई आटा, कोई नमक-तेल, पुराने कपड़े या कभी-कभार कुछ रुपये दे देते थे। बेटे ने पाँचवीं तक पढ़ाई की और फिर खदान में काम करने लगा। उसकी कमाई से बेटी की शादी के लिए लिया गया कर्ज चुकाया जा रहा था। फिर भी उसके चेहरे पर कभी निराशा दिखाई नहीं देती थी।

एक दिन मैंने देखा कि उसके पैरों में केवल एक ही चप्पल थी। पूछने पर हँसते हुए बोली, “दूसरी टूट गई। सोचा एक पैर तो काँटों से बचा रहे।” यह वाक्य सुनकर लगा कि यह महिला अभाव में भी संतोष ढूँढ़ लेना जानती है।

सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि वह बिना घड़ी के समय पहचान लेती थी। उसने बताया कि परछाइयों को देखकर समय का अंदाज़ा लगा लेती है। वह कभी स्कूल नहीं गई, किसी मोटिवेशनल स्पीकर को नहीं सुना, न किसी बड़े धार्मिक गुरु का प्रवचन। लेकिन जीवन ने उसे जो सिखाया था, वह किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं था।

आज जब लोग छोटी-छोटी असफलताओं से टूट जाते हैं, रिश्तों में स्वार्थ बढ़ता जा रहा है और सुख का अर्थ केवल भौतिक वस्तुओं तक सीमित हो गया है, तब बकरी बाई जैसी महिलाएँ याद दिलाती हैं कि जीवन का असली सुख संतोष, कर्म और आत्मस्वीकृति में छिपा होता है। उसने कभी किसी से अपेक्षा नहीं की, इसलिए उसे निराशा भी नहीं मिली। वह जीवन को बोझ नहीं, एक यात्रा की तरह जीती रही।

वास्तव में बकरी बाई अनपढ़ होकर भी जीवन की सबसे बड़ी ज्ञानी थी। उसने वह किताब पढ़ ली थी जिसे अक्सर डिग्रियों वाले लोग भी नहीं पढ़ पाते। उसके जीवन को देखकर यही लगता है कि मुक्त होकर जीना शायद इसी को कहते हैं।

उस कर्मयोगिनी महिला को समर्पित ये पंक्तियाँ बिल्कुल सार्थक लगती हैं —
कुमकुम सिंह
कुमकुम सिंह
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