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प्रवासी श्रमिकों की मेहनत और परिवारों की जीवनरेखा

16 जून -अंतरराष्ट्रीय पारिवारिक प्रेषण दिवस पर विशेष 

16 जून को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय पारिवारिक प्रेषण दिवस उन करोड़ों प्रवासी श्रमिकों के संघर्ष, त्याग और समर्पण को सम्मान देने का अवसर है, जो अपने घर-परिवार से दूर रहकर मेहनत करते हैं और अपनी कमाई का एक हिस्सा अपने परिवारों तक भेजते हैं। यही धनराशि “पारिवारिक प्रेषण” या रेमिटेंस कहलाती है, जो केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि भावनात्मक संबंधों, जिम्मेदारी और उम्मीदों की डोर भी होती है।

आज दुनिया के करोड़ों लोग रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन की तलाश में अपने घरों से दूर दूसरे राज्यों या देशों में काम कर रहे हैं। निर्माण कार्य, कारखाने, परिवहन, कृषि, घरेलू सेवाएँ और तकनीकी क्षेत्रों में कार्यरत ये प्रवासी श्रमिक अपने श्रम से न केवल अर्थव्यवस्था को गति देते हैं, बल्कि अपने परिवारों के जीवन को भी संभालते हैं। उनके द्वारा भेजी गई धनराशि से बच्चों की शिक्षा, घर का खर्च, इलाज, खेती और सामाजिक आवश्यकताएँ पूरी होती हैं।

भारत विश्व के उन प्रमुख देशों में शामिल है जहाँ सबसे अधिक पारिवारिक प्रेषण प्राप्त होता है। खाड़ी देशों, अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों में कार्यरत भारतीय श्रमिक प्रतिवर्ष अरबों डॉलर अपने परिवारों को भेजते हैं। यह राशि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण योगदान बनती है। ग्रामीण भारत में अनेक परिवारों की आजीविका इसी पर निर्भर है।

लेकिन इन चमकते आँकड़ों के पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी होती है। प्रवासी श्रमिक अक्सर कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। वे परिवार से दूर अकेलापन, असुरक्षा, भाषा की कठिनाई और श्रम शोषण जैसी समस्याओं का सामना करते हैं। कई बार उन्हें उचित वेतन, स्वास्थ्य सुविधा और सम्मानजनक जीवन भी नहीं मिल पाता। फिर भी वे अपने परिवार की खुशियों के लिए हर कठिनाई सहते हैं।

कोविड-19 महामारी ने दुनिया को यह सच्चाई और गहराई से दिखाई। जब लाखों प्रवासी श्रमिक अपने घर लौटने के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे, तब यह स्पष्ट हुआ कि समाज और अर्थव्यवस्था की रीढ़ वास्तव में यही मेहनतकश लोग हैं। उस दौर में पारिवारिक प्रेषण ने अनेक परिवारों को भूख और आर्थिक संकट से बचाए रखा। अंतरराष्ट्रीय पारिवारिक प्रेषण दिवस हमें यह समझने का अवसर देता है कि प्रवासी श्रमिक केवल “कमाने वाले हाथ” नहीं, बल्कि सपनों और जिम्मेदारियों से भरे संवेदनशील इंसान हैं। उनके श्रम का सम्मान करना, उन्हें सामाजिक सुरक्षा देना और सुरक्षित कार्य वातावरण उपलब्ध कराना प्रत्येक राष्ट्र की जिम्मेदारी है। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि प्रेषण की प्रक्रिया सरल, सुरक्षित और कम खर्चीली बनाई जाए, ताकि श्रमिकों की मेहनत की अधिकतम राशि उनके परिवारों तक पहुँच सके। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाकर अनिवार्य पलायन को कम करना भी जरूरी है।

भारतीय संस्कृति में परिवार को सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। प्रवासी श्रमिकों द्वारा भेजा गया धन केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि परिवार के प्रति उनके प्रेम, त्याग और कर्तव्य का प्रतीक है। यह रिश्तों की वह अनमोल डोर है जो हजारों किलोमीटर की दूरी को भी छोटा बना देती है। यह दिवस हमें उन अनदेखे चेहरों को सम्मान देने की प्रेरणा देता है, जिनकी मेहनत से अनेक घरों में चूल्हा जलता है, बच्चों के सपने पूरे होते हैं और परिवारों की उम्मीदें जीवित रहती हैं। वास्तव में पारिवारिक प्रेषण केवल मुद्रा का प्रवाह नहीं, बल्कि संवेदनाओं, जिम्मेदारियों और मानवता का सबसे जीवंत रूप है।

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